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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1576

From जैनकोष



पृथग्दृष्ट्वात्मन: कार्य कायादात्मानमात्मवित्।

तथा त्यजत्यशंकोऽंगं यथा वस्त्रं घृणास्पदम्।।1576।।

आत्मा के जानने वाले पुरुष देह को आत्मा से भिन्न देखें और आत्मा को देह से भिन्न देखें तभी वह नि:शंक होकर देह को त्यागता है। देह के त्यागने का अथ्र यह हे कि देह से उपेक्षा बुद्धि हो। देह में आसक्ति न हो, उसमें आत्मीयता न हो, यह देह का त्यागना कहलाता है। यदि ऐसा विरक्त परिणाम है तो देह में रहते हुए भी देह का त्यागी है और जिसके ऐसा ज्ञानतत्त्व का परिणाम नहीं है वह देह को छोड़ता हुआ भी देह का त्यागी नहीं है। जैसे कोई पुरुष जब कभी किसी से ग्लानि होती है तो वह उसे नि:शंक होकर त्याग देता है, इसी प्रकार ज्ञानी जीव इस देह को भी ग्लानि का स्थान समझकर इसको त्याग देता है, आशंका नहीं रहती। जैसे घर में रहते हुए भी घर वालों से मन न मिले और उपेक्षा ही रखे तो घर में रहता हुआ भी घर के लोगों का त्यागी है। इसी प्रकार देह में रहता हुआ भी ज्ञानी पुरुष चूंकि देह से भिन्न अपने आत्मा को जानता है तो वह भी देह का त्यागी है। सबका आधार इतना है कि जो देह को मानता हे कि यह में हूँ उसे तो देह मिलते रहेंगे अर्थात् जन्म मरण चलता रहेगाऔर जो देह से भिन्न ज्ञानमात्र अपने को देखता है उसके देह की परम् परा न रहेगी अर्थात् उसका निर्वाण होगा। तो उस देह से ममता न रहे, देह से विमुख बुद्धि रहे उसका यह विचार चल रहा है। तो उन विचारों में एक विचार यह भी है कि इस देह को लक्षण से भिन्न जानें और देह को घृणास्पद जानें। इस देह में रमने लायक कुछ चीज नहीं है। इस देह को ही सब कुछ समझते हैं। इस देह में ऊपर से लेकर नीचे तक भरा हुआ है? खून, पीप, नाक, थूक, मल, मूत्रादिक अपवित्र वस्तुवें ही तो भरी हैं। यह देह प्रीति करने लायक नहीं है, ऐसा जानकर हम देह से ममता त्यागें।


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