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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1578

From जैनकोष



तर्कयेज्जगदुन्मत्तं प्रागुत्पन्नात्मनिश्चय:।

पश्चाल्लोष्टमिवाचष्टे तद्दृढाभ्यासवासित:।।1578।।

जब कोई पुरुष प्रथम ही प्रथम ज्ञानमार्ग में आया और उसमें आत्मा के स्वरूप का निश्चय किया तो सबसे पहिले जब वह जगत पर दृष्टि डालता है तो सारा जगत उसे उन्मत्त की तरह दिखता है क्योंकि उस आत्मा के स्वरूप की जानकारी की ना? मैं आत्मा तो विशुद्ध चैतन्यस्वरूप हूँ। जो आत्मा को जानने का अभ्यासी होता है उसको ये जगत के लोग उन्मत्त जैसे दिखते हैं। जब पहिले-पहल उसने जानना शुरू किया था आत्मा के स्वरूप को उस समय यह जगत पागल दिख रहा था और जब यह आत्मतत्त्व का दृढ अभ्यास कर लेता है, उस चैतन्य ज्योति के अभ्यास से खूब वासित हो जाता है तब फिर इसे सासरा जगत लोहा पत्थर की तरह निश्चल मालूम देता है। फिर तो यों लगता है कि आत्मा कैसा पागल है? आत्मा तो जो है सो है। यह तो सब पुद्गल का ठाठ है। इस चलायमान जगत में पुद्गल देखता है और अंतर में जो आत्मस्वरूप है उसे निश्चल देखता है।जब ज्ञान उत्पन्न होता है तो उत्पन्न होने के समय चूंकि पहिली बार ज्ञान किया ना आत्मा का तो दूसरे लोग जो जगत में भ्रमण करते हैं, नाना प्रकार की प्रवृत्तियाँ करते हैं उन्हें यह जगत पागल की तरह दिखता है। लेकिन जब उस तत्त्वस्वरूप का दृढ अभ्यास होता है तो ऐसा लगता है कि पागल कोई नहीं हो रहा। यह नृत्य तो पुद्गल का है। आत्मा तो निश्चल, स्वतंत्र, निष्काम, शुद्ध अनादि सिद्ध विराजमान है।


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