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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1583

From जैनकोष



जातिलिंगमिति द्वंद्वमंगमाश्रित्य वर्तते।

अंगात्मकश्च संसारस्तस्मात्तद्वितयं त्यजेत्।।1583।।

अब लोक में ये विकल्प भी हुआ करते हैं कि मैं इस जाति का हूँ और अनेक लिंग का हूँयाने पुरुष हूँ, स्त्री हूँ आदिक विकल्प भी रहते हैं। और देख लो व्यवहार में कि स्त्री लोग अपने चित्त में कैसी बुद्धि बनाये कि मैं स्त्री हूँ। बोल-चाल, रंग-ढंग, उठना-बैठना, वस्त्रादिक पहिनना सभी बातों में प्रति समय ऐसी वासना झलकती है कि इस जीव को ऐसी दृढ़वासना है कि में स्त्री हूँ। यही बात पुरुषों में है। पुरुष भी अपने को यही अनुभव करते हैं कि मैं पुरुष हूँ और वैसी ही उनकी प्रवृत्तियाँ हैं। ये सब प्रवृत्तियाँ देहमें आत्मीयता की बुद्धि रखने के कारण हैं। आचार्य देवों ने बताया है कि इस शरीर में आत्मीयता की बुद्धि को छोड़ना चाहिए। मैं अमुक जाति का हूँ, वैश्य हूँ, ब्राह्मण हूँ, अग्रवाल हूँ, खंडेलवाल हूँ, अमुक हूँ― इस प्रकार की जो शरीर में आत्मीयता की बुद्धि रहती है, यह बुद्धि ही इस आत्मा को उन्नति से रोकती है। और इस बुद्धि में यह देख लो कि हर एक कोई कुछ प्रकृति से अपनी जाति को दूसरे से कुछ उच्च मानता हैं। कुछ वासना ऐसी रहती हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं कि जो यह जानते हों कि और लोग भी मेरे ही समान हैं अथवा मेरे से भी बढ़कर हैं। कुछ ही लोग ऐसा सोचते हैं। प्राय: सभी के यह वासना बनी है कि जिस जाति में हुआ है वह उसी को उच्च मानता है उसी को सबसे अच्छा और चतुर समझता है। एक बार मैं बरहानपुर से नैनागिरि में पैदल जा रहा था कोई 18-20 मील की जगह थी। तो साथ में एक गाँव का हरिजन भी साथ में था। और उनमें भी कोई और छोटी जाति का था। तो रास्ते में हमारी और उसकी खूब खुल-खुलकर बात होने लगी। खूब दिल खोलकर वह भी बातें करे और हम भी। समय तो काटना ही था। तो हमने सभी जातियों के नाम लेकर उससे पूछा कि लोग कैसे होते, ये लोग कैसे होते? उसने बहुत-बहुत बताया। आखिर निष्कर्ष यही था कि वह अपने से सबसे चतुर ईमानदार बताने लगा। तो मनुष्यों में प्राय: करके प्रकृति ऐसी है कि जो जिस जाति में उत्पन्न होता है वह अपनी जाति को महत्त्व देता है। तो जैसे लोग अपनी जाति का विकल्प रखते ऐसे ही मैं स्त्री हूँ, अथवा मैं पुरुष हूँ― इस प्रकार की शरीर में आत्मीयता की दृढ़बुद्धि बनी हुई है। देह को आत्मा समझ रहे हैं। तो देह के आश्रय से ही जाति है और लिंग है, ऐसे ही मुनि होना, श्रावक होना, अर्जिका होना, त्यागी होना ये भी शरीर के आश्रित भेष है। जैसे दो चद्दर लँगोटी पहिने सो क्षुल्लक है, जो नग्नभेषधारी है वह मुनि है, यों ही उस मुनि को भी भेष में आग्रह हो जाय कि यह मैं साधु हूँतो उसने क्या किया कि यह भेष तो था शरीर के आश्रय से और उसने उस भेष में ममता करके, आग्रह करके शरीर का ही आग्रह किया। जो पुरुष शरीर का आग्रह करता है वही तो मिथ्यादृष्टि अज्ञानी कहलाता है। तो ज्ञानी पुरुष जाति और लिंग के विकल्प का परित्याग करते हैं। अर्थात् ज्ञानियों को न अपनी जाति पर अभिमान रहता है, न अपने भेष पर।वह तो अपने आपको वेषों से रहित विशुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप मानता है। यह बात जब तक चित्त में नहीं समाती तब तक समझिये कि हम धर्मपालन नहीं कर रहे हैं। शरीर से निराला ज्ञानानंदस्वरूप मैं आत्मा हूँ, इस प्रकार की बुद्धि जब तक नहीं बनती तब तक समझना चाहिए कि वह धर्मपालन में नहीं है। यों लोकरूढ़ि से किसी भी बात में धर्म मानकर उसके लिए प्रवृत्ति कर रहे हैं। कोई सा भी कार्य हो वह विधि सहित हुआ करता है। व्यापार का कार्य भी विधिपूर्वक होता है तो ढंग से चलता है। ऐसे ही धर्म की बात भी विधिपूर्वक हो तो उसका विभाव होता है।धर्म की विधि हैकि सर्वप्रथम मूल में अपना यह दृढ़ निर्णय होना चाहिए कि मैं शरीर से निराला केवल ज्ञानानंदस्वरूप अंतस्तत्त्व हूँ, अमूर्त हूँ, जो छेद से छिदा नहीं जा सकता, भेद से भेदा नहीं जा सकता, ग्रहण में नहीं आ सकता, बंधन में नहीं आ सकता, ऐसा यह ज्ञानमात्र में आत्मतत्त्व हूँ, पहिले यह निर्णय हो तो समझिये कि हम धर्मपालन बराबर विधि से कर रहे हैं। यह बात जिनके होती है वे शरीर में आत्मबुद्धि नहीं करते, उनकी तो यह दृढ़प्रतीति है कि मैं तो ज्ञानानंदस्वरूपमात्र अमूर्त आकाशवत् निर्लेप अंतस्तत्त्व हूँ। जैसे कोई पुरुष ऐसी स्थिति में आते हों कि अंधे के कंधे पर लँगड़ा बैठा है तो उसे देखकर लोग ऐसा ख्याल करते कि देखो यह अंधा ही तो चल रहा है। उस लंगड़े की दृष्टि को अंधे में जोड़देते हैं। इसी प्रकार जो अज्ञानी जीव हैं वे शरीर को ऐसा चलते-फिरते देखकर ऐसा सोचने लगते हैं कि देखो यह शरीर कैसा चल रहा है, यह पिंड कैसा दिख रहा है? तो दिखाता तो आत्मा है, मगर आत्मा के देखने को शरीर में जोड़ देते हैं। शरीर जो दिख रहा है, चल रहा है उसे ही चलता हुआ , देखता हुआ समझता है। उसे यह परख नहीं कि दिखने वाला यह आत्मा नहीं है, और ये जो क्रियाकलाप हो रहे हैं ये सब शरीर के आधार में हो रहे हैं। तो ये अज्ञानीजन आत्मा और देह को भिन्न-भिन्न नहीं मान पाते। वे तो यह शरीर दिख रहा है उसी को सर्वस्व समझते हैं। तो इस शरीर में ही आत्मीयता की बुद्धि होने में सारे क्लेश लग रहे हैं। सम्मान और अपमान―ये दोनों भी इस देह में आत्मीयता की बुद्धि करने में होते हैं। जो ज्ञानी जीव होगा उसे शरीर और आत्मा में पूर्ण भिन्नता विदित है, अत: वह जानता हे कि इस मुझ ज्ञानानंदस्वरूप आत्मा का न कोई सम्मान कर सकता है और न अपमान। उस ज्ञानी पुरुष में ये व्यर्थ के विकल्प नहीं उठते, अत: वह सर्वविकल्पों के बोझ से रहित हो जाता है।




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