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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1590

From जैनकोष



इत्थं वाग्गोचरातीतं भवयंतपरमेष्ठिनम्।

आसादयति तद्यस्मान्न भूयो विनिवर्तते।।1590।।

यह आत्मा वचनों के विषयभूत नहीं है।कोई आत्मा वचनों से जानना चाहे तो अशक्य है। वचनों से तो जो कुछ बताया जाय उस तरह का कोई अपना प्रयत्न करे तो प्रयत्न से आत्मा जाना जा सकता है, जिसे पूजन कहते हैं।आचार्य उपदेश करते हैं कि आत्मा ज्ञानमात्र है। तो जिसे आत्मानुभव की इच्छा हो वह आत्मा को इस प्रकार विचारे कि मैं ज्ञानमात्र हूँ।ज्ञान क्या ज्ञान करता है? ज्ञान का काम जानना है। जानने का क्या स्वरूप है? जानने के साथ रागद्वेष न हो तो जानने का सही स्वरूप होता है। किसी पदार्थ का विकल्प न हो, प्रेम न हो, द्वेष न हो, केवल जाननमात्र जो स्वरूप है। उसमें अपने आपको अंतरंग में तकें, केवल ज्ञानप्रकाश मात्र हूँ, इस प्रकार से अपने ज्ञानोपयोग का कोई प्रयत्न करे तो आत्मा का अनुभव होगा। वह आत्मा वचनों के विषय से अतीत है। जैसे कोई मिश्री का स्वाद जानना चाहें तो वचनों से कितना ही समझाया जाय पर स्वाद नहीं आ सकता। स्वाद तो खाने में ही आयगा। इसी प्रकार आत्मा का अनुभव वचनों से न आयगा। आचार्य भगवंत कितना भी उपदेश करें उनके वचनों से आत्मा का अनुभव अतीत है। हाँ जो मार्ग उन्होंने बताया उस मार्ग पर चलने का प्रयत्न करें तो आत्मा का अनुभव हो सकता है। ऐसा वचनों के विषय से अतीत जो परमपद हैं सिद्ध अरहंत के स्वरूप और यह सहज ज्ञानस्वभाव ज्ञानमात्र ऐसे परमतत्त्व की भावना इस प्रकार भाना चाहिए कि फिर कभी आत्मा के अनुभव से न चिगें, फिर आत्मा का अनुभव न छूटे ऐसे सिद्धपद को प्राप्त होता है।




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