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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1593

From जैनकोष



अतींद्रियमनिर्देश्यममूर्त कल्पनाच्युतम्।

चिदानंदमयं विद्धि स्वस्मिन्नात्मानमात्मना।।1593।।

हे आत्मन् ! तू आत्मा को आत्मा में ही अपने आपको ऐसा जान कि मैं अतींद्रिय हूँ। ऐसा जानने के लिए बाहर में कोई साधन न चाहिए कि कहीं दीपक हो, उजेला हो तो मैं आत्मा को जानूँ, या किसी घर में बैठा हुआ हो वह आत्मा तो मैं उसे जानूँ। ऐसी बात है नहीं। अपने आपमें अपने आप आत्मा को जान लेनाहै। तो हे आत्मन् ! अपने आपमें अपने ज्ञानबल से अपने को जानें। कैसे जानें कि मैं अतींद्रिय हूँ? कोई चाहे कि मैं कान से सुनकर, हाथ से छूकर, जिह्वा से चखकर, नाक से सूँघकर, तथा नेत्रों से देखकर मैं आत्मा को जान लूँ तो वह नहीं जान सकता है। यह आत्मा किसी भी इंद्रिय के द्वारा नहीं जाना जा सकताहै। मन का भी विषयभूत यह आत्मा नहीं है। यद्यपि मनोबल से बहुत कुछ प्रयत्न कर लिया जाता है आत्मा को समझने के लिए। मन द्वारा इतना बड़ा भारी प्रयत्न हो सकता है आत्मा के समझाने का कि आत्मा के अतिनिकट इस उपयोग को यह मन पहुँचा दे। पर आत्मा से साक्षात् मिलन नहीं करा सकता। निकट पहुँचा दे इतना तो किसी विशुद्ध मन का काम बन जायगा, पर अनुभव केवल ज्ञानबल से अपने आपके आत्मा को जानेगा। मन का काम है विकल्प करना, तो विकल्प की स्थिति में आत्मा नहीं जाना जा सकता है। यों समझो जैसे कई द्वारपाल राजदरबार में पहरे पर खड़ा है, कोई राजा से मिलने आये तो द्वारपाल इतना कर सकता है कि उसे राजा के निकट पहुँचा दे और बता दे कि यह राजा है। पर राजा से मिलना, बात करना यह द्वारपाल का काम नहीं है। इसी प्रकार यह मन इस आत्मा के निकट पहुँचाने के लिए द्वारपाल का काम करता है। पर आत्मा का अनुभव कराना यह मन का काम नहीं। वहाँ मन शांत हो जाता है, एक निर्विकल्प स्थिति हो जाती है तब उस आत्मा का अनुभव होता है। तो यह आत्मा इंद्रिय और मन से परे है। इसलिए कहा गया कि यह आत्मा कल्पना से भी च्युत है। तो हे आत्मन् ! तू अपने आपको अपने आपमें ऐसा ही समझ कि मैं अतींद्रिय हूँ, कल्पना से बाहर ही, इसका कोई नाम नहीं, अर्थात् वचनों द्वारा आत्मा को जान नहीं सकता, अत: ये वचन अनिर्देश्य हैं और यह आत्मा अमूर्त है, रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द से रहित यह आत्मा है, इसलिए हे आत्मन् ! अपने आपके उपयोग में ऐसा अनुभव बना। केवल ज्ञानमात्र निर्लेप हूँ, किसी प्रकार का जहाँ विकल्प नहीं है, केवल जहाँ एक ज्ञानमात्र का अनुभवन है वहाँ पहिचाना जाता है कि यह मैं आत्मा कैसा हूँ? यह मैं आत्मा अतींद्रिय हूँ, अनिर्देश्य हूँ, कल्पना से परे हूँ, अमूर्तिक हूँ। फिर हूँ में क्या? इंद्रिय द्वारा नहीं जाना जाता;किसी नाम से नहीं जाना जाता;रूप, रस, गंध, स्पर्श से रहित हूँ। आचार्य महाराज कहते हैं कि हम अपने आत्मा को इस प्रकार अनुभवें कि मैं चिदानंदमय हूँ, ज्ञानदर्शन और आनंदमय हूँ, ऐसे चैतन्यमात्र अपने आपका अनुभव करें, अर्थात् अपने आत्मा को इस प्रकार जानें, और बहुत-बहुत कहने से क्या, समझाने से बात नहीं आती। जिसमें योग्यता है, जिसमें सामर्थ्य है वह अपने आपका अनुभव कर लेता है। हम अपने आपमें ऐसा अनुभव करें कि मैं विशुद्ध चैतन्यमात्र हूँ। जिसमें कल्पना नहीं रहती, विकल्प नहीं रहता ऐसा शून्य केवल एक शुद्ध प्रकाशमात्र चिदानंदस्वरूप अपने आत्मा को जानें।


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