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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1596

From जैनकोष



यदभ्यस्तं सुखाद् ज्ञानं तद्दु:खेनापसर्पति।

दु:खैकशरणस्तस्माद् योगी तत्त्वं निरूपयेत्।।1596।।

तत्त्वाभ्यासी पुरुष, ज्ञानाभ्यासी पुरुष ज्ञान का अभ्यास तो करे पर साथ ही यह बात न भूले कि हम कुछ साथ-साथ तपश्चरण भी करें। कुछ हमको कष्ट आयें, दु:ख आयें उस मार्ग में तो उनके भी हम सहनशील बन जायें। इसके लिए जान-जानकर अनशन करें, ऊनोदर करें, तपश्चरण करें, सर्दी-गर्मी सहें, इष्ट वियोग अथवा अनिष्ट संयोग में अपने ज्ञानबल को यथार्थ रखें, ऐसी बात यदि वह कर सकता है तो उसका प्राप्त हुआ ज्ञान आगे कायम बना रहेगा। यदि कभी बड़े आराम से, बड़े सुख से ज्ञान का अभ्यास बना हुआ है तो वह दु:ख उसे घबड़वा देगा। तो ज्ञान की सम्हाल तो करें, मगर साथ-साथ तपश्चरण भी करें ताकि कभी विपत्ति आ जाय तो हम उस ज्ञान को न भूल सकें। ऐसा ज्ञानी विचारताहै कि जो ज्ञान सुख का अभ्यास किए है वह ज्ञान प्राय: दु:ख आने पर नष्ट हो जाया करता है। इस कारण योगी दु:ख को अंगीकार करके तत्त्व का अनुभव करता है, तपश्चरण करता है, परीषह सहता है ताकि कभी-कभी तो यह मेरा ज्ञानावलोकन, मेरा वह ज्ञानाभ्यास बन जाय। तो ज्ञान को स्थिर बनाने का, ज्ञानानुभव करते रहने का संबंध संयम से है। अपने आपके उपयोग को चारों ओर से हटाकर अपने ज्ञानस्वरूप आत्मा में संयत करें, यहाँ से कहीं बाहर न डुला सकें ऐसा कोई भीतर में यदि अभ्यास करता है तो उसका यह परमार्थ तपश्चरण है और जिसके बाह्य तपश्चरण में ऊब आ जाती है, कुछ खेद होने लगता है, कुछ आकुलता सी बन जाती है वह। एक कठिनाई वाला काम है, ऐसा कुछ अनुभव में रहता है। इस प्रकार कोई भीतर में यह परमार्थ तपश्चरण कर रहा हो तो प्रथम ही प्रथम इस तपश्चरण का अभ्यास करने वाले ज्ञानी को कुछ खेद होने लगता है। इसकी भी यदि वह कुछ परवाह न करे, अपने उपयोग को बराबर चलाये जाय तो बस यह समझिये कि बहुत प्रयत्न तो वह कर चुका था, थोड़े समय और यत्न करने का काम था सो उसने कर लिया, अब उसके बराबर आत्मानुभव जग गया, और अपने आपके आत्मा में वह अमृत तत्त्व पा चुका। इससे यह शिक्षा लेनी हे कि हम परिषहों के सहने का अभ्यास रखें और ज्ञानार्जन करें ताकि हम अपने किसी क्लेश के आने पर इससे घबड़ा न जायें और ज्ञान के अनुभव को छोड न दें। योगी पुरुष अपने आत्मा कोही अपना शरण मानकर आत्मा में ही अपना उपयोग लगाते हैं, ज्ञानाभ्यास करते हैं और बड़े-बड़े तपश्चरण करते हैं।




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