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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1598

From जैनकोष



इति साधारणं ध्येयं ध्यानयोधर्मशुक्लयो:।

विशुद्धि: स्वामिभेदेन भेद: सूत्रे निरूपित:।।1598।।

यहाँ इस अधिकार से पहिले धर्मध्यान का और शुक्लध्यान का प्रकरण चल रहा था।ध्यान चार प्रकार के होते हैं―आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान। इसका वियोग होने पर, अनिष्ट का संयोग होने पर, शारीरिक कोई पीड़ा होने पर अथवा वैभव की आशा बनाने से जो कुछ अंतरंग में पीड़ा होती हैउस पीड़ा के समय जो ध्यान है उसे आर्तध्यान कहते हैं। यह ध्यान संसारबंधन का कारण है, दु:खों से भरा हुआ है। दूसरा हे रौद्रध्यान। क्रूर आशय करके पंचेंद्रिय के विषयों में आनंद मानना, किसी जीव के घात से आनंद मानना, ये जो परिणाम हैं वे रौद्रध्यान हैं। यह भी संसार का बीज है। एक धर्मध्यान और दूसरा शुक्लध्यान, ये आत्मा को उन्नति के पथ में ले जाने वाले हैं। विशुद्ध ध्यान मेंसाधारण रूप से बताया गया कि इस बहिरात्मा को छोड दें, अंतरात्मा का अनुभव करें और परमात्मतत्त्व का ध्यान करें। यह एक उपदेश है। बीच में अंतरात्मा है अर्थात् यह बहिरात्मा के परिहार का और परमात्मतत्त्व के ग्रहण का माध्यम है। एक सम्यग्ज्ञान बनाने से बहिरात्मापन भी छूट जाता हैऔर परमात्मतत्त्व का ग्रहण हो जाता है। जो धनवैभव आदिक बाह्यपदार्थों में आत्मबुद्धि करे वह बहिरात्मा है और अपने अंतरंग में विशुद्ध दर्शन ज्ञानस्वरूप अपनी चेतना में आत्मबुद्धि करे वह सम्यग्दृष्टि अंतरात्मा है। और जो समस्त कर्मों से रहित है, गुणों में संपन्न है वह परमात्मा है। परमात्मतत्त्व अत्यंत उपादेय है, उसकी प्राप्ति के लिए तू अपने आपमें बसे हुए सहज सिद्ध परमात्मतत्त्व का ध्यान कर। उसकी विधि इस अधिकार में बताया है, उसको संक्षेप में इतना कह लीजिए कि इंद्रिय के व्यापार को रोककर, मन के संकल्प विकल्प को दूर कर बड़े विश्राम के साथ जरा अपने आपमें पैठ तो जायें, एक विशुद्ध आनंद जगेगा तब समझ लेगा कि मेरा विशुद्ध स्वरूप क्या है? फिर जो समझा उसे कभी भूलेगा नहीं। उस तत्त्व का स्मरण कर, उसकी शरण गह, वही मंगल है, वही लोक में उत्तम है। ऐसे उस परमविविक्त अपने स्वरूप में लगना, सद्भूत ऐसे अंतस्तत्त्व की रक्षा करना, अपने आपमें परमात्मस्वरूप का निरखना, इन कार्यों में अपने आत्मा की दया हेतु अपने को लगाना चाहिए। मन थोड़ा लगे तो कुछ जबरदस्ती हमें धर्म के कार्यों में मन लगाना है, क्योंकि धर्म की शरण गहे बिना हमारा पूरा न पड़ेगा।एक धर्म ही हमारा रक्षक है। वह रक्षक हमारा हममें है। जरा विषयों से दृष्टि हटे, अपने आपमें निरखें तो अपने में वह ज्ञान प्रकाश मिलेगा जिसकी शरण गहने से नियम से संसार के संकट दूर होंगे।


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