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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 160

From जैनकोष



यद्यद्स्तु शरीरेऽत्र साधुबुद्धया विर्चायते।

तत्तसर्वघृणां दत्तेदुर्गंधमिध्यमंदिरे।।160।।

शरीर की घृणास्पदता―इस शरीर में जो-जो पदार्थ हैं साधु बुद्धि से विचार करने पर वे सब घृणा के स्थान तथा दुर्गंधित मल के घर ही होते हैं, अर्थात् इस शरीर में कोई भी पदार्थ पवित्र नहीं है। शरीर की सुंदरता को निरखने में साधक है रागभाव, कामभाव और शरीर जैसा है उस ही प्रकार नजर आये इसका कारण है वैराग्यभाव। एक कथानक प्रसिद्ध है पुराण में कि कोई राजपुत्र एक सेठ की वधु पर आसक्त हो गया, उसने दूती भेजी तो वधू कहती है कि अच्छा आज से 15 दिन बाद राजपुत्र आ जाय। वधू ने क्या किया कि उस ही दिन से जुलाब लेना शुरू किया और एक मटके में शौच करती जाय। 10-12 दिन में उसका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया। राजपुत्र आया तो उस वधू को देखकर आश्चर्यचकित हो गया जो 15 दिन पहिले सुंदर देखा था, यहाँ तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा। हड्डी निकली, बिल्कुल ढांचा ही बदल गया, देखने में डर लगे, ऐसी शक्ल उस वधू की बन गई थी। तो वधू कहती है―राजपुत्र तुम क्यों सोचविचार में पड़े हो? तुम जिस सुंदरता पर आसक्त थे चलो वह सुंदरता हम तुम्हें दिखायें, उस सुंदरता से तुम प्रेम करो। जहाँ शौच से भरा हुआ घड़ा रखा था वहाँ ले जाती है और कहती है देखो इसमें हमारी सुंदरता भरी है। वहाँ देखा तो बड़ी दुर्गंध थी और ऐसे वातावरण से ऊबकर वह राजपुत्र तुरंत वापस चला गया।

सुंदरता की मात्र कल्पना―भैया ! जो सुंदरता नजर आती है वह भीतर मल भरा है और भी अशुचि पदार्थ हैं, उनकी ही तो खूबी है। सुंदरता और किसका नाम है? हष्ट-पुष्ट शरीर भी, कांतिमां शरीर भी वैराग्य से वासित हृदय वाले को अरम्य जंचता है और दुर्बल जैसी चाहे शक्ल का भी शरीर हो, कामी पुरुषों को सुंदर और सर्वस्व जँचता है। कहाँ है सुंदरता और असुंदरता? जैसे जो पुरुष बड़े मजे में रह रहा है उसे सब जगह लगेगा कि मजे में है, मजे का ही वातावरण है ऐसा नजर आता है। जब इष्टवियोग आदिक किसी कारण से दु:ख हो जाय, दु:खी रहा करे तो उसे सब जगह लोगों की स्थिति मुद्रा सब कुछ दु:खमय विदित होता है, लो सभी दु:खी हैं, ऐसे ही जब चित्त में राग और उद्भ्रम उत्पन्न होता है तो अन्य शरीर ये सब शरीर उसे सुंदर और हितरूप मालूम पड़ते हैं? और जब यह राग नहीं रहता, विवेक जगे, सम्यग्ज्ञान का प्रकाश हो तो ये सब शरीर मायामय यों ही निमित्तनैमित्तिक भाव में मिल गए, ऐसे ही अटपट नजर में आते हैं। जो-जो भी पदार्थ इस शरीर में हैं वे सब घृणा को ही देते हैं। शरीर क्या है? दुर्गंधित मल का मंदिर है। मलमंदिर जहाँ मल ही मल भरा है, मंदिर का अर्थ है स्थान। ऐसा यह शरीर रम्य नहीं है। ऐसे शरीर को पाकर इससे विरक्ति की वृद्धि में इसे साधनभूत बनाएं तो यह एक विवेक है अन्यथा आसक्तिवश शरीर में रम गए तो इसमें संसार ही लंबा चलेगा, और जन्ममरण की परंपरा ही बनेगी।


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