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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1611

From जैनकोष



नयोपनयसंपातगहनं गणिभि: स्तुतम्।

विचित्रमपि चित्रार्थसंकीर्ण विश्वलोचनम्।।1611।।

यह श्रुतज्ञान द्रव्यार्थिकनय, पर्यायार्थिकनय, सद्भूतनय, असद्भूतनय, अनेक नय-उपनयों के समूह से गहन है। श्रुतज्ञान का कोई पार नहीं पा सकता।जैसे घने जंगल का पार हर व्यक्ति नहीं पा सकता है ऐसे ही इस श्रुतज्ञान का पार भी हर व्यक्ति नहीं पा सकता है। विवाद किस बात का है? जब सभी मतों का यह जैनशासन समन्वय कर सकता है कि इनका मत इस दृष्टि से ठीक है, इसका मत इस दृष्टि से ठीक है, तो क्या परस्पर में होने वाले विवादों का समन्वय नहीं कर सकता? नयों की दृष्टि लगाकर सबका समन्वय कर सकता है। तो यह श्रुतज्ञान अनेक नय के समूहों से गहन है। इसका पार अल्पज्ञानी पुरुष नहीं कर सकता। जिसने समस्त शास्त्रों का परिज्ञान किया है, जिसने गुरुवों की सेवा करके विद्या शिक्षा पायीहै, जिसने अनेक युक्तियों से तत्त्व को कसा है, साथ ही अनुभव प्राप्त किया है ऐसा ज्ञानी पुरुष ही श्रुतज्ञान का पार पा सकता है, पर जो अल्पज्ञानी हैं वे श्रुतज्ञान को पार नहीं पा सकते। यह बड़ा गहन है क्योंकि इसमें सब नयों की बात है। गहन है इसलिए अनेक विद्वान धर्म के नाम पर विवाद करते रहते हैं, अगर सद्बुद्धि हो तो सबकी बात सुलझ जाये। दृष्टि में सब कथन सही हो जायगा और विवाद का काम न रहेगा। तो श्रुतज्ञान अनेक नयों के समूह से गहन है। इस श्रुतज्ञान का कौन स्तवन कर सकता है? गणधर आदिक देव ही इसका स्तवन कर सकते हैं। गणधर देव द्वादशांग के पाठी हैं। जो 11 अंग 9 पूर्व के जानकार होते हैं, तो वे श्रुतज्ञान की महिमा जान सकते हैं। जो अल्पज्ञानी पुरुष हैं वे अपने ज्ञान को बहुत बड़ा मानते हैं, पर वे अल्पज्ञानी पुरुष जब ज्ञान की आराधना करते हैं तो जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे ही वैसे वे जानते हैं कि यह ज्ञान तो बहुत गंभीर है, इसका कौन पार पा सकता है? तो ऐसे श्रुतज्ञान को जिसमें समस्त विद्याएँ गर्भित हैं उस श्रुतज्ञान का विषय किसी के कहने में नहीं आ सकता। गणधर देव ही उसकी महिमा को समझ सकते हैं। यह श्रुतज्ञान विचित्र है, अपूर्व है, नाना प्रकार की विद्यायें इसमें पड़ी हुई हैं, इसके शब्दों में नाना अर्थ बसे हुए हैं। कोई मूल बात होती है पर उसमें रहस्य बहुत बसे होते हैं। तो नाना प्रकार के अर्थों से भरा हुआ यह श्रुतज्ञान है। यहाँ श्रुतज्ञान में लोग इसी कारण विवाद करते हैं कि कोई कुछ अर्थ निकालता, कोई कुछ। लेकिन जितने भी अर्थ निकल सकते हैं उन सब नयों की दृष्टि से ठीक बैठाया जा सकता है, पर नयों का परिज्ञान नहीं है इसलिए शास्त्र में आज अनेक विवाद खड़े होते हैं। नयों का परिज्ञान कर सकता है यह पुरुष मगर परिज्ञान करके भी पक्ष की हठ हो जाती है। जैसे आज के विवादों में निश्चय और व्यवहार के पक्ष चल रहे हैं, उन पक्षों में भी उन पक्षों के करने वाले विद्वानों में अनेक विद्वान ऐसे हैं जो निश्चय का विरोध कर रहे हैं, उनकी श्रद्धा निश्चय पर है, पर जरा एक पार्टी में नाम निकल गया है तो उस पार्टी का पक्ष करना पड़ता है। हृदय गवाही नहीं देता है मगर उस पार्टी में नाम आ जाने की वजह से उसका पक्ष करना पड़ता है। निश्चय का समर्थन करने वालों में भी कुछ ऐसे विद्वान हैं जिनके चित्त में व्यवहार की बात है लेकिन नाम निकल गया है कि यह निश्चयवादी हैं, निश्चय का कथन करते हैं तो पार्टी कापक्ष रखने के लिए भी पार्टी की जैसी बात करते हैं। तो कोई भी पुरुष अगर निष्पक्ष न्याय दृष्टि से नयों की दृष्टि लगाकर उसका विवेचन करे तो समस्या सुलझ सकती है।

यह श्रुतज्ञान नाना नयों से भरा हुआ है और एक-एक शब्द के नाना अर्थ है, और रहस्य से भरे पड़े हैं इसलिए यह श्रुतज्ञान विचित्र है, नाना अर्थोंसे परिपूर्ण है और यह श्रुतज्ञान विश्व का नेत्र है। सारे विश्व का स्वरूप इस श्रुतज्ञान के द्वारा जाना जाता है। अब देखिये एक-एक भाषा और एक-एक विषय कितना-कितना बड़ा है, उनका कितना-कितना विस्तार है, वह सब श्रुतज्ञान का एक अंश है। वह जरा सा अंश भी विश्व का लोचन है। समस्त विश्व का ज्ञान कराने वाला यह श्रुतज्ञान है। जो नाना पुरुष हैं, जिनकी मोक्षमार्ग में लगने की चाह है, उनके लिए सारे विश्व का ज्ञान इतने में ही हो जाता है कि गुणपर्ययद्रव्यं। समस्त अचेतनों से भिन्न यह चेतन आत्मा है और एक सहज ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व है, इतने परिज्ञान में सारे विश्व का ज्ञान हो गया। जिसका जितना प्रयोजन होगा उसके दायरे में हो तो ज्ञान करेगा। ज्ञानी पुरुष का प्रयोजन समस्त पदार्थों से न्यारा अपने आत्मस्वरूप में जानने का है तो उसने जो एक निगाह में यह जान लिया कि शुद्ध ज्ञानानंदमात्र तो यह मैं आत्मा हूँ और इससे ये सब परे हैं और पुद्गल जाति में धर्मद्रव्य है, अधर्मद्रव्यहै, आकाशद्रव्य है, और काल जाति के द्रव्य हैं ये सब पर हैं। अब इस ज्ञानी को यह जरूरी नहीं है कि एक-एक स्कंध की बात अलग-अलग जानें। एक-एक परमाणु की बात अलग-अलग देखें, मुझे कुछ प्रयोजन नहीं है, मुझे तो भेदविज्ञान से प्रयोजन था, यह भेदविज्ञान की बात उस ज्ञानी ने समझ लीहै। तो यह श्रुतज्ञान समस्त विश्व का ज्ञान कराने वाला है। इस श्रुतज्ञान की महिमा जितनी भी गायी जाय वह थोड़ी है। अगर यह श्रुतज्ञान न होता तो पदार्थ का स्वरूप कहाँ से जाना जाता? और न जाना जाता पदार्थ का स्वरूप तो उन समस्त पदार्थों से भिन्न आत्मा का बोध कहाँ से हो सकता था? और आत्मा का बोध जब तक नहीं हो सकता तब तक संसार के संकट दूर नहीं हो सकते, कर्मों की निर्जरा नहीं हो सकती, निर्वाण पद नहीं प्राप्त हो सकता। तो आप समझिये कि जो इतना उच्च पद है, निर्वाण मोक्ष पद, उस पद के पाने का प्रथम साधन श्रुतज्ञान है। यह श्रुतज्ञान है। इस श्रुतज्ञान के सहारे जीव भेदविज्ञान करते, हेय का परिहार करते, उपादेय का ग्रहण करते, ऐसे ही जीव भेदविज्ञान को करके आत्मस्वरूप में लीन होकर मोक्ष पद को प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए सब कल्याण का मूल यह श्रुतज्ञान है जिसका चिंतन आज्ञाविचय धर्मध्यानी पुरुष कर रहा है। और वह जिनेंद्रदेव का बड़ा आभार मान रहा है कि भगवान जिनेंद्रदेव के कहे हुए वचन यथार्थ सत्य हैं। इस प्रकार भगवान के स्वरूप का जो चिंतन है उसका नाम आज्ञाविचय धर्मध्यान है।


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