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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1614

From जैनकोष



यत्पवित्रं जगत्यस्मिन् विशुद्धयति जगत्त्रयी।

येन तद्धि सतां सेव्यं श्रुतज्ञानं चतुर्विधम्।।1614।।

फिर कैसा है यह श्रुतज्ञान कि जगत में पवित्र है, क्योंकि श्रुतज्ञान के द्वारा तीनों जगत पवित्र होते हैं। भावश्रुत का आलंबन लेकर नारकी जीव भी सम्यक्त्व को उत्पन्न करता है और संसार के संकटों को दूर करने का अपने में आत्मानुभव करता है। इसी श्रुतज्ञान के आलंबन से देवता लोग सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, मध्यलोक के मनुष्य और तिर्यंच इसी श्रुतज्ञान से सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं। यह इस श्रुतज्ञान का प्रताप है। इस कारण यह श्रुतज्ञान संत पुरुषों के सेवने योग्य मानाहै। श्रुतज्ञान की सेवा क्याहै? शास्त्रों को अच्छी जिल्द में बांधना, बढ़ियाकपड़ों में कसकर रख देना, इतने मात्र से सेवा नहीं हुई, वह भी कर्तव्य है, रक्षा करें मगर शास्त्रों में क्या लिखा है, आचार्यों में उसमें क्या अनुभव लिखा है उसका हम जब तक अनुभव न करें तब तक हम उसका लाभ न पायेंगे। तो यह श्रुतज्ञान जो-जो इसका आलंबन लेता है उस-उस जीव को यह पवित्र बना देता है। इस कारण सब पुरुषों को जो कल्याणार्थी हैं उन्हें इस श्रुतज्ञान की आराधना करनी चाहिए। यह श्रुतज्ञान चार प्रकार के अनुयोगों में बंटा है। प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।जिसमें बड़े-बड़े पुरुषों के चारित्र का वर्णन किया हो वह प्रथमानुयोग है। यह हम आप सबको बहुत आवश्यक है। तो हम जब बड़े पुरुषों के चारित्र सुनते हैं, बाँचते हैं तो हमें भी एक प्रेरणा मिलती है तभी तो हम उनके वैराग्य की कथा सुनते हैं, कहते हैं। वैराग्य हो तो हम आपको भी उससे प्रेरणा मिलती है। उनको सम्यक्त्व कैसे हुआ? इन कथावों के सुनने से हमको भी उसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। प्रथमानुयोग से हम आप सबको बड़ी प्रेरणा मिलती है। जैसे और लोग उपन्यास पढ़ते हैं तो उससे उनको भी कुछ प्रेरणा मिलती है। हाँ उनसे खोटी प्रेरणा मिलती है, अपने परिणाम बिगड़ते हैं। जैसा कथन पढ़ा होता है वैसे परिणाम बनते हैं। तो हम महंत पुरुषों के जब चरित्र सुनते हैं, कैसे उनके ज्ञान जगा, कैसे वैराग्य जगा तो उसको पढ़कर हमारा भी परिणाम निर्मल होता है।

हम यात्रा में महंत पुरुषों की प्रतिमावों के दर्शन करते हैं उनका चरित्र पढ़ते व सुनते हैं तो हमको भी उससे एक हित की प्रेरणा मिलती है। जैसे सम्वेद शिखर की वंदना करते हैं तो अनेक तीर्थंकरों का चरित्र याद आ जाता है, उससे हमारा भी चित्त विशुद्ध होता है। शास्त्रों में रामचंद्रजी का वर्णन आया है ( पद्मपुराण में) कैसी गंभीरता उनमें थी, कैसी नीति थी, क्या नियम था उनका, पर आत्मकल्याण के लिए सब कुछ त्याग ही त्याग किए रहे। जितने वर्ष उन्हें राज्य भी मिला तो क्या राज्य किया, राज्य करना तो चित्त में था ही नहीं, चित्त में तो था प्रजा का सुखी होना, राज्य का काम सही बना रहे, अंत में आत्मकल्याण का चित्त चला। संपदा से तो तब भी विरक्त थे और अंत में भी। दूसरा वेद हे करणानुयोग। इसमें परिणामों की जाति का वर्णन है, कर्मों की जाति का वर्णन हैं, तीन लोक तीन काल का वर्णन है। बताया है कि यह सारा लोक 343 घन राजू प्रमाण है। इस लोक के प्रत्येक प्रदेश पर यह जीव जन्मा है और मरा है। कोइ्र जगह इस विश्व में नहीं बची जहाँ पर इस जीव ने जन्म और मरण किया हो। तो इससे भी ज्ञान जगता है। जगत में अनंत जीव हैं, इन अनंत जीवों में से प्रत्येक जीव का कोई न कोई संबंध अनंत भवों से रहा आया, चाहे निगोदिया बनकर ही संबंध रहा आया हो, तो फिर इनमें यह क्या छटनी करना कि ये मेरे बंधु हैं, ये मेरे बैरी हैं―ऐसा सोचना तो एक मूढ़ता भरी बात है। यहाँ कौन किसका बंधु और कौन किसका बैरी? कितना बारीक कथन करणानुयोग में है कि कर्मों का प्रत्येक समय में क्या-क्या परिणमन होता है? जीव के भावों का प्रति समय कैसा-कैसा परिणमन चलता है? बहुत बड़ी बारीकी की बात करणानुयोग में बतायीहै। उसको सुनकर इतना विश्वास दृढ़ होता है कि सर्वज्ञदेव का कहा हुआ वचन है, नहीं तो इतना बारीक कथन और कोई कैसे कर सकता है? तो करणानुयोग से हमें आत्महित की शिक्षा मिलती है? चरणानुयोग में यह बताया है कि हमारा जो परिणाम मलिन होता है वह किसी परवस्तु का आश्रय लेकर होता है। राग होगा तो कोई परपदार्थ मन में बसा होगा। और राग का स्वरूप इसी तरह बनता कि कोई परपदार्थ उपयोग में है तो राग बन रहा है। आप किसी भी परवस्तु का ध्यान न करें और राग बनावें तो नहीं बन सकता है। किसी में स्नेह हे तभी तो राग बनता है। चरणानुयोग कहता है कि पर का आश्रय लेकर राग बनता है, इसलिए हम पर-आश्रय का त्याग करें। कम से कम संपदा रखें, अष्टमी चौदस को आरंभ परिग्रह त्यागें, एक दो बार विधिवत् सामायिक करें, कुछ समय को भोगसाधन हटावें, भोगोपभोग का परिणाम करें। ये सब बातें बताया है। उसका प्रयोजन है कि परवस्तु का आश्रय लेकर रागभाव हुआ करता है तो उन परवस्तुवों के आश्रय से हमारा रागभाव है। जीवों को जितने क्लेश हैं वे सब रागद्वेष मोह भाव के हैं अन्यथा कोई क्लेश नहीं। जीव का स्वरूप ज्ञान और आनंदमय है, उसमें कोई आकुलता नहीं है। चरणानुयोग हमें यह शिक्षा देता हे कि तुम परवस्तुवों का आलंबन छोड दो। जितना तुम अपने को अकेला रख सकोगे पर से न्यारा रख सकोगे, अपने आपको लख सकोगे उतना ही तुम्हारा कल्याण है। द्रव्यानुयोग हमें वस्तु का स्वरूप बताता हे, जीव का क्या स्वरूप है, पुद्गल का क्या स्वरूप है, ऐसा हमें लक्षण सिखा करके हमें पर से हटाकर अपने आपमें लगाना चाहता है। तो द्रव्यानुयोग भी हमारे लिए बहुत सहायक है। इसमें चार अनुयोगों में यह श्रुतज्ञान विभक्त है। इस प्रकार चार प्रकार के शास्त्रों का अध्ययन करें। हर एक शास्त्र में अलग-अलग माहात्म्य पड़ा हुआ है।


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