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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1616

From जैनकोष



नि:शेषनयनिक्षेपनिकषग्रावसन्निभम्।

स्याद्वादपविनिघतिभगनन्यमतभूधरम्।।1616।।

इत्यादिगुणसंदर्भनिर्भरं भव्यशुद्धितम्।

ध्यायंतु धीमतां श्रेष्ठा: श्रुतज्ञानमहार्णवम्।।1617।।

यह जैनशासन स्याद्वाद की कसौटी पर कसा हुआ हे। समस्त नय-निक्षेप से इस वस्तुस्वरूप की परीक्षा होती है इसलिए यह श्रुतज्ञान कसौटी के समानहै। जैसे कसौटी से कसकर हम स्वर्ण की बात बता सकते हैं कि यह सही है, इसमें दोष है ऐसे ही इस ज्ञान से वस्तुस्वरूप को हम कस सकते हैं कि यह वर्णन सही है या गलत है। स्याद्वाद से उन समस्त नयों का निर्णय आ गया है और भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वस्तु के स्वरूप को समझाया गया है। इस दृष्टि से यह स्वरूप सत्य हे इस दृष्टि से यह। तो स्याद्वाद वस्तु के स्वरूप की परीक्षा करने के लिए कसौटी के समान है। जिस कथन में स्याद्वाद का पुट लगा हो वह कथन तो जैनशासन का कथनहै और जहाँ एकांत धारा बनायी गयी हो वह जैनशासन से बाह्य कथन है। जैसे व्यापारी लोग अपनी वस्तुवों पर ट्रेडमार्क लगा देते हैं। यदि वह ट्रेडमार्क लगा हो तो समझो कि वह उस व्यापारी की चीज है इसी प्रकार जिस कथन में स्याद्वाद का पुट हो उसे ही समझना चाहिए कि यह जैनशासन का कथनहै। जैनशासन में नयों का वर्णन है। और जिस नय से जो बात कही जा रही है उस समय उस नय से कथन चलेगा। जिस नय से जिस समय बात चलेगी उस समय उस नय की ही पूरी शक्ति लगाकर बात कही जायगी। तो सुनने में ऐसा लगेगा कि यह एकांत कथन चल रहा है लेकिन एक नय से खूब विशेष वर्णन करने वाले पुरुष अपने उपयोग में दूसरे नय की बात को भी अपनी धारणा में बनाया है तो एकांत का दोष नहीं कहलाता। और दूसरे नय की बात का भीतर से खंडन का भाव ही रखा हो और एक नय का वर्णन किया जाय तो वह एकांत मत कहलाने लगता है।

जैन शासन में जितना भी वर्णन है वह वर्णन आगे पीछे किसी न किसी प्रकरण में स्याद्वाद की मुद्रा को लेकर कथन है। स्याद्वाद की झलक जिस उपदेश में न आये वह उपदेश जैनशासन से बाह्य का उपदेश है, लेकिन सुनने वालों को इतनी धीरता से सुनना चाहिए कि करता जाय और यह बाट जोहता रहे कि कहीं तो स्याद्वाद की मुद्रा लगी होगी? जिस नय से जब वर्णन चलता है उसी नय से वर्णन है, पर देखें कि आगे पीछे कहीं अन्य नय की झलक बतायी जाती है या नहीं। अगर दूसरे नय की बात नहीं आती है तो समझो कि वह जैनशासन से बाहर वर्णन है। जैनशासन वस्तुस्वरूप की परीक्षा करने के लिए कसौटी की तरह है और स्याद्वाद एक तरह से कसौटी बज्र है। जैनशासन इसलिए सही है कि सब दृष्टियों से वस्तुधर्म का वर्णन करता है और वर्णन करने के बाद फिर लक्ष्य विशुद्ध बनाता है कि हम लक्ष्य बनायें द्रव्यस्वभाव का। तो जैनशासन भेदविज्ञान का वर्णन करता है और भेदविज्ञान की बात सीखा कर हेय से छुड़ाकर उपादेय तत्त्व में लगाता है। इससे बढ़कर हमारे कल्याण का साधन और क्या होगा? हम आपको सहारा एक श्रुतज्ञान का है। श्रुतज्ञान वह दीपक है जिससे हम अपनी अवस्था से मार्ग को देख सकते हैं और अपने मार्ग पर चल सकते हैं। ऐसा आज्ञाविचय धर्मध्यानी पुरुष जिनेंद्र भगवान की आज्ञा को मुख्य करके तत्त्व का चिंतन करता है। इस प्रकार अनेक गुणों से भरा हुआ और भव्य जीवों को शुद्धि प्रदान करने वाला यह श्रुतज्ञानरूपी महारत्न है। इसको श्रेष्ठजन मन लगाकर ध्यान करो।


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