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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1619

From जैनकोष



वाग्देव्या: कुलमंदिरं बुधजनानंदैकचंद्रोदयम्,मुक्तेर्मंगलमग्रिमं शिवपथप्रस्थानदिव्यानकम्।

तत्त्वाभासकुरंगपंचवदनं भव्यान् विनेतुं क्षमम्,तच्छ्रीत्रांजलिभि: पिबंतु गुणिन: सिद्धांतवार्द्धे: पय:।।1619।।

यह श्रुतज्ञान अर्थात् तत्त्व के स्वरूप का परिज्ञान वाग्देवी का कुलमंदिर है, अर्थात् वचनदेवता सरस्वती इस ही में निवास करती है। सरस्वती शब्द स्त्रीलिंग का है। सरस्वती शब्द का अर्थ है विस्तार वाली। जिसका फैलाव हो उसको सरस्वती कहते हैं।सर्वाधिक फैलाव है विद्या का, इसलिए विद्या का नाम सरस्वती है। तो वचनदेवी का यह श्रुतज्ञान कुलमंदिर है, विद्याभवन है, यह निवास करती है। वचन कहाँहो? जहाँज्ञान हो। जहाँ अपार ज्ञान है वहाँ ही तो वचनदेवी रहती है। तो यह श्रुतज्ञान वाग्देवी के निवास का मंदिर है। समस्त व्याख्यान इस श्रुतज्ञान के अनुभव अथवा ज्ञाता पुरुषों से विनिश्रित हुआ और यह श्रुतज्ञान अथवा अलंकार में जल की उपमा दी गई है, यह बुद्धिमान पुरुषों के आनंद को प्रकट करने के लिए एक चंद्रोदय की तरह है। जैसे चंद्र का उदय मनुष्यों को आनंद प्रकट करता है इसी प्रकार यह श्रुतज्ञानरूपी जल विद्वान पुरुषों को आनंद प्रकट करता है। और यह मुक्ति का मुख्य मंगल है। जैसे किसी लक्ष्य के स्थान पर पहुँचने के लिए प्रारंभ में मंगल वस्तुवों से प्रयाण कराया जाता है जिससे यह प्रयाण में निर्वाध चले तो मोक्षमंदिर में जाने के लिए यह सिद्धांत जल एक मंगलरूप है। यहाँ से प्रारंभ होता है। जिनका भी उत्कर्ष होता है उनका इस विज्ञान के अभ्यास से प्रारंभ होता है। इससे पहिले नहीं। श्रुतज्ञान को इसीलिए मन का विषय बताया गया है। मन वाले पुरुष ही इस श्रुतज्ञान का उपयोग कर सकते हैं। वैसे साधारणतया तो मतिज्ञान और श्रुतज्ञान एकेंद्रिय तक के होते हैं। जिनके मन भी नहीं है उनके भी श्रुतज्ञान है, पर वह श्रुतज्ञान जो मुक्ति में पहुँचाने के लिए अग्रिम मंगल है, आत्मकल्याण का परम साधक है ऐसा यह श्रुतज्ञान है, केवल मन का विषय है। एकेंद्रिय आदिक के जो श्रुतज्ञान होता है वह श्रुतज्ञान वासना संस्कार संज्ञा और इंद्रिय का क्षयोपशम, इन सबसे संबंध रखता है। मन तो है ही नहीं, इस कारण विवेकी की बात उन असंज्ञी जीवों के नहीं हो सकती। जिनके मन है उनके ही विवेक भावना जग सकती है। मन कहते ही उसे हैं जो शिक्षा उपदेश ग्रहण कर सके। श्रुतज्ञान एक साधारण शब्द है। श्रुतज्ञान में शास्त्र भी आ गए और वे सब ज्ञान भी आ गए जो मतिज्ञान से जाने हुए पदार्थ में कुछ विशेषता उत्पन्न करते हैं। हमारे व्यावहारिक जितने भी ज्ञान हैं ये सब श्रुतज्ञान हैं। मतिज्ञान को तो कोई बता भी नहीं सकता। वह निर्विकल्प है। जैसे सबसे पहिले नेत्र इंद्रिय से निरखा और निरखते ही यह भाव बने कि यह सफेद हे तो वह श्रुतज्ञान हो गया। देखा गया सफेद से और निरखा गया सफेद ही और मतिज्ञान में भी वही आया। अगर सफेद है इस प्रकार की विशेषता को लेकर ज्ञान बना तो श्रुतज्ञान है। उसके लिए एक ऐसा दृष्टांत रख सकते हैं समझने के लिए कि जैसे जल्दी का उत्पन्न हुआ बालक कमरे में रखी हुई सारी वस्तुवों को निरख तो लेता है पर उसके चित्त में यह सफेद है, पीला है, कैसा है, क्या है यह कुछ नहीं जानता है। यद्यपि उसके उस निरखने में भी श्रुतज्ञान है, कहीं वह मतिज्ञान नहीं बन गया, पर मतिज्ञान श्रुतज्ञान का अंतर बताने के लिए दृष्टांत है।तो श्रुतज्ञान एक विशेष श्रुतज्ञान है, और तत्त्वार्थ सूत्र में जो श्रुतज्ञान को जो मन का विषय बताया है उसका इस मनपूर्ण श्रुतज्ञान से संबंध है। यह मन का विषय है। और यह सिद्धांत के लिए अथवा श्रुतज्ञान मोक्षमार्ग में गमन करने के लिए एक दिव्यवाद्य विशेष है। जैसे बड़े उल्लास के साथ गमन किया जाता है तो आगे-आगे बाजे बजते हुए जाते हैं। लोग जानते हैं कि अब आगमन हुआ है इसी प्रकार यह श्रुतज्ञान मोक्षमार्ग में जाने वाले संत पुरुषों के लिए बाजे की तरह है, अग्रिम चीज है, वह दिव्य अलौकिक पट है। मुक्तिनगर में इस आत्मा का प्रवेश हो रहा है तो पहले पहल यह श्रुतज्ञान का बाजा चला तब इसका प्रवेश हो सका।

हम आपका अधिक उपकारी शरणभूत, सारभूत सर्वस्व यह श्रुतज्ञान है जिसकी ओर अज्ञानियों की दृष्टि नहीं हो सकती। ज्ञानी पुरुष की श्रुतज्ञान का यह महत्त्व जान सकता हैं कि हमको एकमात्र आलंबन तो इस श्रुतज्ञान का है।जैसे अंधे का कोइ्र हाथ पकड़कर प्रेरणा देकर इष्ट साधनों में ले जाये ऐसा यदि कुछ है तो वह श्रुतज्ञान है।वैसे भी हम किसी भी चिंता में हों, रंज में हों, शोक में हों तब भी हमारा रक्षक केवल हमारा ही ज्ञान बनता है। कोई दूसरा चाहे जितना हमारे शोक को मिटाना चाहे तो वह मिटाने में समर्थ नहीं होता। वह शोक मिटाता है तो केवल हमारे ही ज्ञान से। इसलिए मोक्षमार्ग में चलने के लिए यह श्रुतज्ञान बहुत महत्त्व का है। हम आपको इसकी ओरज्यादा दृष्टि रखना चाहिए। और इसे हम अर्जित कर सकते हैं। बाह्यपदार्थ में हम कमा सकें यह हमारे आधीन बात नहीं है। वे तो उदयानुसार भवतव्य के अनुसार प्राप्त होते हैं। पर यह हमारी ही बात हमारी ही चीज यद्यपि यह भी भवतव्य की बात है लेकिन इस पर हमारा अधिकार नहीं है। हम रुचि करें, अपने आपको अपने स्वरूप को जानना चाहें तो इसमें कुछ बाधा देने वाला अन्य पदार्थ नहीं है। हम ही खुद विषय कषाय के लोलुपी बनकर स्वयं बाधक बन जाते हैं। दूसरा कोई हमारे ज्ञानपथ में बाधक बन ही नहीं सकता। पर हम चाहें तब ना। एकत्व ‘रमति’ अधिकार में लिखा है पद्मनंदी स्वामी ने कि जिसके मन में धर्म की कथा भी सुनने की रुचि जगे वह निश्चय ही भव्य है और भावी काल में निर्वाण पायगा। धर्म की रुचि होना ही एक कठिन बात है। उसके बाद फिर सारी बातें बन सकती हैं। इस मायामय चमत्कारों से भरे हुए संसार में जहाँ प्रत्येक मनुष्य विषय सुखों के लिए होड़ मचाये हुए हैं, ऐसे इस भयानक इंद्रजालवत् संसार में धर्म की रुचि भीतर में कहाँसे जगे,उसे और कुछ न सुहाये। जिसे देखकर प्राय: लोग अचरज करते कि इसके दिमाग में क्या हो गया? जैसे कितने ही पुरुष अथवा कितनी ही कन्यायें इस बात की धुन में लग जाती हैं कि हमें विवाद नहीं करनाहै, हमें किसी के आधीन नहीं बना है। और वे ऐसी दृढ़ता से ही जाती कि माँ बाप सब परेशान हो जाते समझाते-समझाते। दूसरे लोग भी बहुत-बहुत समझाते पर वे कन्यायें किसी की नहीं सुनती। लोग अचरज में पड़ जाते कि इसके क्या हो गया है? अरे हो क्या गया है? उसको केवल धर्म की धुन हुई है। धर्म में इतनी तीव्र रुचि हुई है कि उन्हें अन्य लौकिक सुख नहीं सुहाते। तो धर्मवाणी सुनने की जिसकी रुचि हुई है वह पुरुष भव्य है, होनहार है। वह निर्वाण का पात्र है। हम आपको ऐसी रुचि बनानी चाहिए कि जिसके सामने ये वैभव संपदा न कुछ प्रतीत होने लगें।

हम आप सबका सहारा एक तत्त्वज्ञान है, आत्मज्ञान है। वह श्रुतज्ञानरूपी जल अमृत की तरह है। उसे हमें इस कर्ण पात्र से पी लेना चाहिए, अर्थात् हम तत्त्व की बात सुनें, तत्त्व की बात बोलें, तत्त्व का चिंतन करें और उस तत्त्व को अनुभव में उतारने के लिए जनसंसर्ग छोड़ें, एकांत का वास करें, ध्यान करें, सामायिक करें। अपना मन ऐसा कठोर बना लें कि जिसमें पर का प्रवेश न हो सके। अनेक उपाय करके भी हम तत्त्व का अनुभव करें। यही हम आपके उत्कर्ष का कारण बनेगा। यह श्रुतज्ञान कुतत्त्वरूपी हिरणों के नष्ट करने में पंचवदन की तरह है। पंचवदन नाम है सिंह का। सिंह को 5 वदन वाला कहा है। वह चारों पैरों से और मुख से इन पांचों से जानवरों का आसानी से शिकार करता है इसलिए सिंह का नाम पंचवदन है। तत्त्वाभ्यास खोटे तत्त्व खोटे मत, कुसिद्धांत रूपी हिरणों को नष्ट करने में यह श्रुतज्ञान सिंह की तरह है, अर्थात् इस श्रुतज्ञान के समक्ष फिर कुतत्त्व ठहर नहीं सकते। और यह श्रुतज्ञान भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग में चलाने के लिए समर्थ है, ले जाने के लिए समर्थ है, मुक्ति का कारण है। अनात्मतत्त्वों से छुटकारा हो जाय तो यह आत्मा स्वयं अपने आप सहज सत्त्व के कारण जैसा कुछ हैसो ही रह जाय, इसके मायने हे मुक्ति। ऐसे मुक्ति पद में ले जाने के समर्थ यह सम्यग्ज्ञान है। यह जान जावें कि मैं यथार्थत: सबसे निराला केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ। पहिले अपनी कैवल्य का विश्वास तो करें फिर कैवल्य प्रकट हो सकता है। कोई अपने को सबमें मिला-जुला अनुभव करे, मैं इस जाति कुल का, इस पोजीशन वाला हूँ, तो वह चाहे समितियों का भी पालन करे साधु भी हो पर उसकी वे सब क्रियायें बेकार हैं। भीतर में पर्याय बुद्धि बनीहै जिसके कारण अब मैं शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ इस तरह की सुधि वह नहीं ले पाता है। ऐसी पर्यायबुद्धि बन गयी हो तो उसने कैवल्य की श्रद्धा कहाँकर पायी? और जब कैवल्य की श्रद्धा ही नहीं है तो कैवल्य का विकास, कैवल्यपद की प्राप्ति हो कहाँसे? तो यह तत्त्वज्ञान यह सहज अंतस्तत्त्व का बोध यह श्रुतज्ञान जीवों को मोक्ष में ले जाने के लिए समर्थ है। ऐसे सिद्धांतरूपी समुद्र के जल को हे गुणीजनों ! तुम कर्णरूपी अंजुलियों से पान करो। जैसे जल मिल जाय तो अंजुलियों में भरकर खूब पान करना चाहिए, इसी प्रकार सिद्धांतरूपी समुद्र के जल को हे गुणीजनों ! कर्णरूपी अंजुलियों से खूब पान करो।


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