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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1629

From जैनकोष



एकत: कर्मणां सैन्यमहमेकस्ततोऽन्यत:।

स्थातव्यमप्रमत्तेन मयास्मिन्नरिसंकटे।।1629।।

ज्ञानी पुरुष ऐसा विचार करता हे कि इस संसार में एक ओर तो कर्मों की सेनाहै अर्थात् बहुत जबरदस्त कर्म हैं और एक ओर यह मैं अकेला हूँ तो ऐसी स्थिति में इस शत्रुसमूह के बीच में हमें बड़ा सावधान होकर रहना चाहिए क्योंकि अपनी सुध न रख सकेंगे तो शत्रुसमूह मेरा पतन करेगा। अपायविचय धर्मध्यान में ऐसा चिंतवन चल रहा हे कि मुझे यहाँ बड़ा सावधान रहना चाहिए याने विषय कषायों में हमारा उपयोग न जाय। मेरे उपयोग में मेरा स्वरूप बसे, पंचपरमेष्ठी का स्वरूप बसे जिससे विशुद्धता बढ़े। यदि मैं सावधान न रहूँगा तो मेरे खिलाफ ये समस्त कर्म हैं, मेरे स्वभाव के खुद में निमित्तभूत यह कर्मों का समूह पड़ा है मेरे साथ, यह मुझे बरबाद कर देगा, इससे मुझे अत्यंत सावधान रहना चाहिए।


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