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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1631

From जैनकोष



किमुपेयो ममात्मायं किवा विज्ञानदर्शने।

चरणं वापवर्गाय त्रिभि: सार्द्ध स एव वा।।1631।।

ज्ञानी पुरुष अब ऐसा विचार कर रहा है। प्रश्न करता जाता है, उत्तर लेता जाता है। उपेय क्या है अर्थात् अत्यंत ग्रहण करने योग्य मूल बात क्या है? उत्तर में यह आया कि यह आत्मा ही उपेय है। किसकी शरण जायें, किससे स्नेह बढायें, किसका हाथ पकड़ें, किससे आशा रखें कि यह मेरा भला कर देगा, उत्थान कर देगा? कोई नहीं है ऐसा जिसकी आशा रखी जाय कि यह मेरा उत्थान कर सके। कहाँजायें? बाह्य में पंचपरमेष्ठी शरण है। तो वे भी इस प्रकार शरण में निमित्त भर बन पाते हैं कि मेरे आत्मा की सुध आये, मेरा परिणाम निज परमात्मतत्त्व में समा जाय, इसलिए परमेष्ठी का गुण स्मरण शरण है, इस कारण शरण माने जाते हैं। साक्षात् तो वे भी कहीं मेरा हाथ पकड़ कर मोक्ष में न बैठायेंगे? किसकी शरण जायें? कौन उपेय है? ज्ञानी पुरुष को अंतरात्मा का समाधान मिलता है कि यह मेरा आत्मा ही उपेय है अथवा ज्ञानदर्शन ही आत्मा है। अपने आपके आत्मा को किस रूप में ध्याया जाय कि आत्मानुभूति बन सके? पदार्थ का निरखन 4 प्रकार से होता है―द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव। पुद्गल में बैठे तो चारों से पुद्गल का ठीक निर्णय होता है। जैसे द्रव्य से कोई चीज कैसी है? पिंडरूप। चश्मा कैसा है? अभी दिखा दो ऐसा है पिंड सा है द्रव्यदृष्टि से वह देखो। क्षेत्रदृष्टि से जितना लंबा, चौड़ा, मोटा जिस प्रकार से आकार को लिए हो पदार्थ वह देखो, कालदृष्टि से पदार्थ की जो वर्तमान परिणति है, क्षेत्र विस्तार की परिणति, गुण की परिणति, जो परिणति है वह परिणति दिख गई, पर्याय दिख गई। और भावदृष्टि से उस पदार्थ में जो स्वभाव बसा है वह देखा गया। इसी प्रकार आत्मा में भी हम इन चारों में से कुछ निरख लेते हैं, द्रव्यदृष्टि में तो गुणपर्याय का पिंड देखो। यह द्रव्य दृष्टि में मिला। क्षेत्रदृष्टि से निरखने पर आत्मा जितने विस्तार में है पैरों से लेकर सिर तक उतना हमको क्षेत्र रूप में मिला। कालद्रव्य से आत्मा जैसा प्रदेशों की परिणति में है अब और गुणोंके स्वभाव में है उस रूप में निरखने को मिलता है और इस दृष्टि से आत्मा आत्मस्वभावरूप आत्मशक्तिरूप है। ज्ञानदर्शन रूप देखने को मिलता है और इसी कारण आत्मा को चार जगह बताया गया है। एक तो तत्त्वों में गिनाया है जीवतत्त्व, अस्तिकाय को गिनाया है जीवास्तिकायतत्त्व, पदार्थ में गिनाया है जीवपदार्थ और एक जीवद्रव्य। इनमें से काल की दृष्टि से तो जीवद्रव्य है क्योंकि यहाँ जीव का अर्थ है जो पर्याय को ग्रहण किया था वह द्रव्य है। तो यह कालदृष्टि से बना जीव पदार्थ शुद्ध दृष्टि से बना, क्योंकि पदार्थ में पिंडरूप ग्रहण है और क्षेत्र में जीवास्तिकाय बना और भावदृष्टि से जीवास्तिकाय बना। तो जब हम इस जीव को एक लंबे चौड़े के रूप में ज्ञान करते हैं तो अनुभूति नहीं बनती। जब हम अनेक गुणपर्याय पिंड हैं, यह आत्मा ऐसी दृष्टि में लगता है तब भी अनुभूति नहीं बनती। यह अनेक पदार्थों में बसने वालाहै, इस प्रकार की मुख्यता से दृष्टि को लेना तब भी अनुभूति नहीं बनती, किंतु जब हम जीवतत्त्व के रूप में चैतन्यस्वभाव के रूप में सहज ज्ञानदर्शन के रूप में जब हम अपने को ग्रहण करते हैं तो अनुभूति जगती है, इसका कारण यह है कि अनुभव करने वाली चीज है ज्ञान और ज्ञानस्वभाव है जीवतत्त्व। वही ज्ञानस्वभाव ज्ञान के द्वारा ज्ञान में आयें तो ज्ञानानुभूति बनती हे और ज्ञानानुभूति ही आत्मानुभूति है। हम अपने आत्मा का अनुभव करने के लिए इस तरह निरखें कि मैं ज्ञान ही हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, केवल ज्ञानमात्र अपने आपको निरखें, ऐसा ही यत्न करें कि मैं अपने को केवल ज्ञानप्रकाशरूप अनुभव कर सकूँ, तो यही है स्वानुभूति का उपाय।

भैया ! अपने अंत: सोचिये―उपेय हुआ मेरा आत्मा। तो आत्मा भी किस प्रकार है? केवल ज्ञानदर्शनरूप चैतन्यस्वरूपमात्र। जिस स्वरूप की अनुभूति की मुख्यता देने के लिए सांख्यों ने केवल आत्मा को चैतन्यस्वरूपमात्र माना है, ज्ञानदर्शन से न्यारा माना है। ज्ञानदर्शन को जीव का स्वभाव नहीं मानाहै सांख्यों ने। ज्ञानी पुरुष ऐसा चिंतन कर रहा है कि उपेय क्या चीज है? ग्रहण करने योगय क्या है? मेरा शरणभूत, मेरा रक्षक कौन है? तो वह अपने आत्मा को ही अपना शरणभूत व रक्षक पाता है। वह आत्मा है ज्ञानदर्शन सामान्यस्वरूप। ज्ञान जो विशेष-विशेष रूप जानता है तद्रूप नहीं, किंतु सहज ज्ञान हुआ आत्मा का स्वरूप। मैं ज्ञानमात्र हूँ, केवल ज्ञानप्रकाश मात्र हूँ―इस प्रकार अपने को देखें तो आत्मा ग्रहण में आ सकता है। इस ग्रहण को मुख्य बनाने के लिए सांख्यों ने आत्मा का स्वरूप ज्ञानरूप नहीं माना किंतु एक चैतन्यमात्र मानाहै। और इस ज्ञान को प्रकृति का धर्म मानाहै, किसी पदार्थ का धर्म नहीं माना। इतना अधिक अंतर सांख्यों ने इस लोभ से कर दिया है कि मेरे में कोई विकल्प न जगे,ज्ञान की तरंगें भी न उठें। मैं केवल एक निस्तरंग रहूँ, परदृष्टि बनाये रहूँ, लेकिन यह विचार न कर सके वे सांख्य जन कि ज्ञान जो तरंगित है, विकल्परूप है वह ज्ञान कीएक विकार दशा है। ज्ञान का शुद्ध परिणमन, ज्ञान की शुद्ध अवस्था निस्तरंग है। यदि अपने आपको ज्ञानदर्शन रूप में निरखें तो आत्मा का अनुभव होगा और स्पष्ट समझ में आयगा कि यह मेरा आत्मा उपादेय है। क्या उपेय है मोक्ष के लिए? उसके उत्तर में समाधान चल रहा है। मोक्ष के लिए चारित्र बताया है। चारित्र में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान गर्भित हैं क्योंकि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सहित स्थिति में सम्यक्चारित्र की उत्पत्ति होती है। तो चारित्र मायने है अपने आत्मा के स्वरूप में चर्या करना, अत्यंत स्थिर होना। यह तत्त्व जब तक नहीं बन सकता तब तक आत्मा के इस स्वरूप की दृष्टि नहीं होती, और यह स्वरूप उपयोग में न आये तब तक इस स्वरूप में उपयोग स्थिर हो जाय ऐसा चारित्र नहीं बन सकता, इसलिए चारित्र बताया ऐसा कहने में सब आया अथवा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र―इन तीनों सहित आत्मा ही उपादेय है। अपायविचय धर्मध्यानी पुरुष इन कर्म शत्रुवों के रागादिक भावों के, विनाश के लिए चिंतन कर रहा है कि मेरे इन रागादिक विभावों का विनाश कैसे हो जो अनादि वासना से मेरी बरबादी करते चले आ रहे हैं।


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