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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1640

From जैनकोष



स विपाक इति ज्ञेयो य: स्वकर्मफलोदय:।

प्रतिक्षणसमुद्भूतश्चित्ररूप: शरीरिणाम्।।1640।।

धर्मध्यान के 4 भेद हैं―आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय। जिसमें आज्ञाविचय और अपायविचय धर्मध्यान का वर्णन हो चुका है कि भगवान की आज्ञा को प्रधान मानकर वस्तुस्वरूप का चिंतन करना सो आज्ञाविचय धर्मध्यान है। जो रागादिक विभाव आत्मा को बरबाद कर रहे हैं उसका चिंतन करना यह कैसे दूर हो, उन उपायों का चिंतन करना सो अपायविचय धर्मध्यान है। अब यह तीसरा विपाकविचय धर्मध्यान चल रहा है। विपाक का अर्थ है अपने कर्मों के फल का उदय प्राप्त न करना। इसका धर्मध्यान का संबंध इसलिए है कि इस ध्यान में न कोई इंद्रिय के विषय का उपयोग है, न मन के, यश के, प्रशंसा के विषय का उपयोग है। एक धर्मप्रसंग का उपयोग है। इस कारण कर्मफल का विचार करना भी विपाकविचय धर्मध्यान माना गया है। यह विपाक इस संसारी जीव के प्रतिक्षण उत्पन्न होता है और यह नानारूप है। जीव के साथ कर्म अनादिकाल से लगे चले आ रहे हैं। यद्यपि इनमें ऐसा निमित्तनैमित्तिक संबंध है कि जीव का रागादिक विभावों का निमित्त पाकर कर्मबंध होता है और कर्मों का उदय निमित्त पाकर जीव में रागादिक विभाव होते हैं। यदि पूछा जाय कि बतावो जीव में सबसे पहिले क्या था? तो कहेंगे कि जीव में सबसे पहिले रागादिक पिंड था। रागादिक पिंड हुए फिर उससे कर्मबंध हुआ, फिर रागादिक हुए, फिर कर्मबंध हुआ। तो ये रागादिक भाव सर्वप्रथम किस कारण से हुए? क्या अपने आप हो गए या अपनी सत्ता के कारण हो गए? उससे पहिले कर्म थे जिनके उदय में रागादिक हुए। अर्थात् कोई कहे कि सबसे पहिले कर्म ही मान लो, उसके उदयकाल में रागादिक हुए। फिर उन रागादिकों का निमित्त पाकर ये कर्म बंधे। फिर सिलसिला बन गया, तो यह बतलावो कि सर्वप्रथम जो उनके साथ कर्मबंधन था वह कैसे हो गया? रागादिक विभाव हुए बिना कर्मबंध नहीं होता। तब एक उत्तर क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं। यह कहना पड़ेगा कि इनकी संतति अनादिकाल से चली आयी। जैसे आम का पेड़ व उसकी गुठली को ले लो, पहिले आम हुआ कि गुठली? यदि पहिले गुठली हुई तो बिना आम के पेड़ के कैसे बन गया और यदि कहो कि पहिले आम का पेड़ हुआ तो वह आम का पेड़ बिना गुठली के कैसे बन गया? तो यह संतति अनादिकाल से चली आयी। इसी प्रकार यदि पूछे कि कोई पिता ऐसा भी हुआ कि जिसका पिता न रहा हो? तो ऐसा कोई पिता नहीं कि जिसका पिता न रहा हो। कोई पुत्र भी ऐसा नहीं जो बिना पिता का हो। तो यह पिता पुत्र की संतति भी अनादिकाल से चली आयी है। ऐसे ही आत्मा के साथ रागादिक विभाव और कर्मबंध ये सब अनादि से चले आये हैं। अब यह प्रश्न होगा कि जो चीज अनादि से चली आयी हो उसका विनाश कैसे होगा? ये रागादिक अगर अनादिकाल से आ रहे हैं और ये कर्म अनादि से आ रहे हैं तो विनाश कैसे हो? समाधान यह है कि राग की परंपरा चली आ रही है। कोई खास राग अनादि से नहीं है। उसकी आदि है। जैसे कोई पिता अनादि से नहीं है, पिता की परंपरा अनादि से है। ऐसे ही कोई प्रकार का विकल्प कोई रागपरिणमन अनादि से नहीं होता, उसका आदि है, उत्पन्न है, इसी तरह कोई कर्म जो बंधा है वह अनादि से नहीं बंधा है, उसकी उत्पत्ति है तब से बंध है मगर इसकी परंपरा अनादि से है।हाँ तो यह प्रश्न था कि जो अनादि से हो वह नष्ट किस तरह से हो? उत्तर यह है कि इसकी परंपरा अनादि से है, ये तो अवस्थाएँ हैं। अवस्था अनादि से नहीं होती। अब तीसरा समाधान यह है कि कल्पना में आनंद मान लो। जिसके साथ जो लगा है उसका आदि नहीं है अर्थात् उसको छोडकर नहीं रहा तो भी उसका नाश हो जाता है। जैसे तिल में तेल भला बतलावो कब से आया? तो कोई सही नहीं बता सकेगा क्या कि हाँ अमुक दिन को आया। अरे जब से वह तिल आया तब से वह तेल आया। तिल को छोडकर तेल नहीं रहा। जब कोल्हू में पेला जाता है तो उससे तेल अलग हो जाता है। इसी तरह परंपरा में जीव के साथ कर्म चले आ रहे हैं अनादि से रागादिकभाव तिस पर भी इनका वियोग हो जाता है। कारण यह है कि प्राय: करके सर्वसाधारण जीवों के कषायों की परंपरा अनादि ये है, जब कभी औपाधिकभाव हट जायें तो वीतरागता होने से अब जो राग होगा वह सादि है। अगर कर्म का संबंध छूट जाय तो फिर कभी कर्म का संबंध नहीं होता। रागादिक भावों कारणभूत तो कर्म हैं वे औपाधिक भावों के होने पर भी जीव के साथ लगे हैं, वे दबे हैं, तो कारण होने से रागभाव की बीच में उस समय रागभाव की परंपरा खंडित हो जाती है, मगर राग बराबर पड़ा हुआ है इससे फिर राग की उत्पत्ति हो जाती है। क्षायक भाव में जो क्षय हुआ सो क्षय ही हुआ, उसकी आदि नहीं है, इसलिए वहाँ कोई परिणमन ही नहीं है। तो सामान्यतया सर्व साधारण संसारी जीवों को दृष्टि में लेकर कहा जा रहा है कि जीव के साथ रागादिक और कर्मबंध की परंपरा अनादि से चली आ रही है और यह कर्मफल देखो तो सबके विचित्र-विचित्र मालूम पड़ रहे हैं। जीव की ये जो नाना विचित्रताएँ देखी जा रही हैं इसका कारण क्याहै? किसी भी पदार्थ की एक पर्याय अन्य कारण के बिना हो सकती है। अगर विषम परिणाम बने तो अन्य कोई उपाधि अवश्य होती है। जीवों में ये सब विसमताएँ हैं। किसी को कैसी पर्याय मिली, किसी को कैसी। किसी के शुभ भाव है तो किसी के अशुभ भाव है। इन विषमतावों से अनुभव होता है कि जीव के साथ कोई विरुद्ध चीज लगी है, जो कोई विपरीत चीज लगी है उसका कोई नाम रख लो। जो चीज ध्रुव है, हाथ से न पकड़ी जा सके, आँखों से न देखी जा सके, ऐसी वह चीज है कर्म। इस प्रकार कर्मों का फल संसारी जीवों में विचित्र-विचित्र देखा जा रहा है। उस कर्मफल का विचार करना विपाकविचय धर्मध्यान है।


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