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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1646

From जैनकोष



अरिष्टोत्पातनिर्मुक्तो वातवर्षादिवर्जित:।

शीतोष्णरहित: काल:स्यात्सुखाय शरीरिणाम्।।1646।।

जो पापी जीव है वह दु:खी होता है, और जो पुण्योदय वाला जीव है वह सुखी होता है। एक ही घर में नाना विचार वाले जीव हैं। कोई निर्मोह ढंग से रहता है, सुख से रहता है, कोई बहुत बड़ा मोह करके रहता हे, दु:खी रहता है। तो जिसके जैसा उदय है पुण्य का अथवा पाप का, उसके अनुसार अवस्था मिलती है। तो जो पुण्य वाले जीव हैं उनको ऐसा अवसर मिलता है, ऐसा क्षेत्र मिलता हे कि जहाँ दु:ख देने वाला कोई उत्पात नहीं है। हवा, बर्फ आदिक जो कोई कष्ट उत्पन्न करने वाले मौके हैं उनसे रहित समय पाता है। ऐसे समय में ऐसे क्षेत्र में ये पुण्यवान जीव सुख भोगते हैं। जहाँन शीत अधिक पड़ती है, न गरमी अधिक पड़ती है। अच्छा क्षेत्र मिलता जो सुख का कारण हो, ये तो पुण्य के काम हैं, और ऐसे खोटे क्षेत्र मिलना, खोटा समय मिलना जिससे दु:खी हों ये पाप के काम हैं। तो संसार में क्या दिख रहा है? सिवाय पुण्य पाप के और कुछ नजर नहीं आता। और जिसके पाप है वह दु:खी है सांसारिक, मानसिक, वेदनावों से और पुण्यवान तृष्णा करके दु:खी होते हैं। जिसके जितना पुण्य का उदय है वह उतना बड़ा तृष्णालु बन सकता है। देहाती आदमी साधारण परिस्थिति का कोई तृष्णा बनायेगा अपने गुजारे के माफिक वह भी साधारण भांति से। पर जिसके पुण्य का उदय है वह लाखों करोड़ों की कल्पनाएँ करता है, तृष्णा करता है और दु:खी होता है। सो यहाँ कोई सुखी नहीं है। कल्पना से लोग छांट लेते हैं कि यहाँ बड़ा सुख है, ऐसा घर है, ऐसी दूकान है, यह बड़ा सुखी होगा मगर सुखी कोई नहीं है। सुख कहो, शांति कहो, आनंद कहो, निराकुलता कहो, वह तो मोह रागद्वेष के त्याग से हैं खूब सोच लो―जब तक अपना परिणाम मोह रागद्वेष से रहित न बन सकेगा तब तक शांति प्राप्त नहीं हो सकती। और मोह रागद्वेष है व्यर्थ का। समस्त चीजें न्यारी हैं, भिन्न हैं, साथ रहने वाली नहीं हैं, मिटेगी, पर अज्ञानी जीव ने उनसे अपना हित मानाहै। यही वैभव, यही स्नेह, यही कुटुंब, पर इनका ध्यान करके ये अज्ञानी जीव दु:खी हैं, अज्ञानी जीव ईर्ष्या भी करते हैं। यह बहुत ज्यादा धनी हो गया, ऐसी ईर्ष्या करते हैं अज्ञानी जन। ज्ञानी जीव ईर्ष्या नहीं करते क्योंकि वे तो इस तरह देखते कि ये तो बड़े दु:खी हो गए हैं। जब दूसरों को दु:खी हो गए इस तरह मानते तो वहाँ ईर्ष्या कहाँ? दया आ गयी। यह ज्यादा धनी हो गया, बड़ा दु:खी हो गया, अपना उपयोग कहाँ-कहाँ भटका रहा है। वह तो दूसरों को दया का पात्र मानेगा, ईर्ष्या क्या करेगा? अज्ञानी पुरुष ही दूसरों के इन लौकिक उत्कर्षों को देखकर ईर्ष्या करते हैं।


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