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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1658

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सुरायुरारंभककर्मपाकात्संभूय नाके प्रथितप्रभावै:।

समर्थ्यते देहिभिरायुरग्रयं सुखामुतस्वादनलोलचित्तै:।।1658।।

कर्मों के संबंध में अनेक प्रकार के चिंतन करना और मुख्यतया कर्मों के फल का चिंतन करना सो विपाकविचय धर्मध्यान है। उसी प्रसंग में सब कर्मों का स्वरूप बताते हुए इस समय आयुकर्म का स्वरूप बतला रहे हैं। तो आयुकर्म के चार भेद हैं―देह, मनुष्य, तिर्यंच और नारक। आयु कर्म का काम है कि इस जीव को शरीर में रोके रहे, आयुकर्म इस जीव को नारकी शरीर में रोके रहे तो उसका नाम नरक आयु है, इसी प्रकार तिर्यंच, मनुष्य और देव आदिक शरीर में जो आयुकर्म रोके रहे उसका नाम तिर्यंच, मनुष्य और देव आदि आयु है। तो इन चारों प्रकार के आयुकर्मों में जीव उन-उन भवों में बना रहता है। सो उनमें से एक देव आयु तो पुण्य का फल है, जिसके कारण वैभव सामग्री सुख ये सब बराबर उनके बनते रहते हैं और नरक आयु जो है वह तीव्र पाप का फल है, जिसके उदय में नारकियों के ऐसे शरीर में रहना पड़ता तो महादुर्गंधित हैं और ऐसे क्षेत्र में रहना पड़ता कि जो क्षेत्र भी महान दुर्गंधित हैं। बताते हैं कि नरकों की भूमिका एक ढेला भी यहाँ आ जाय तो यहाँ सैकड़ों कोश के मनुष्य पशु-पक्षी मर जायें, ऐसी कठिन दुर्गंधित भूमि है। तो जहाँ क्षेत्र भी कठिन है वहाँ की यह नरक आयु तो कठिन हे ही। तो नरक आयु तीव्र पाप का फल है। मनुष्यों को पुण्य का भी फल मिलता है और पाप का भी। ऐसे ही तिर्यंचों को भी पुण्य का और पाप का भी फल मिलता है। राजा महाराजावों के घर में बंधे हुए हाथी, घोड़े तथा कुत्ते वगैरह कितना आराम से रहते हैं, काम कुछ नहीं पड़ता, इतना हष्ट-पुष्ट रहते हैं कि शरीर में कहीं हड्डी तक मालूम नहीं पड़ती। यह उनके पुण्य का ही तो फल है। बहुत सी गाय, भैंस भी बड़े आराम में रहती हैं। किसी-किसी पशु को तो भर पेट घास भी नहीं मिलती और किसी-किसी पशु की बड़ी सेवा होती है। तो यह उनके पुण्य का उदयहै। मनुष्यों में तो साफ नजर आता। कोई-कोई लोग तो हजारों आदमियों के बीच घिरे रहते हैं, बड़ा सम्मान होता है और कोई-कोई लोग भीख मांगते फिरते हैं। तो ये सब पुण्य पाप के फल हैं। ज्ञानी जीव इन पुण्य फलों को भी कुछ महत्त्व नहीं देता। वह जानता हे कि यह पुण्यफल नरकादिक दुर्गतियों में ले जाने का कारण बन जाता है। तो ज्ञानी जीव को पुण्यफल में विश्वास नहीं है, उसे अहितरूप मानता है और पाप के फल में वह ज्ञानी घबड़ाता नहीं है। जैसे पुराने समय में सुकुमाल मुनि को शादी होने के दो तीन दिन बाद तक स्यालिनी ने नोच-नोच कर खाया था तो क्या इसे पाप का फल न कहेंगे? सुकौशल स्वामी को उसकी ही माता ने मरकर सिंहनी बनकर भक्षण किया था तो क्या इसे पाप का फल न कहेंगे? राजकुमार मुनि विवाह करने के एक दिन बाद मुनि हो गए थे तो उनके ही स्वसुर ने सिर में बाढ़ बनाकर कोयला जलाया था, सिर जल रहा था तो क्या इसे पाप का फल न कहेंगे? था वह पाप का फल, पर ज्ञानी पुरुष थे वे, वे तो अपने ज्ञान में ही मग्न रहते थे। तो इतने बड़े उपसर्ग होने पर भी परिणामों में मलिनता नहीं आने दिया। आखिर समस्त कर्मकलंकों से मुक्त होकर उनका निर्वाण हुआ। तो ज्ञानी जीव पुण्य फल को महत्त्व नहीं देते, वे तो आत्मस्वभाव को महत्त्व देते हैं। आत्मस्वभाव की दृष्टि बने तो यह सर्वोत्कृष्ट सार बात है ऐसा ज्ञानी जीव का दृढ़ श्रद्धान है।


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