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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1664

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निरुणद्धि: स्वसामर्थ्याद्दानलाभादिपंचकम्।

विघ्नसंततिविन्यासैविघ्नकृत्कर्म देहिनाम्।।1664।।

अब यह आखिरी कर्म अंतराय है उसके फल की बात कह रहे हैं। अंतरायकर्म विघ्न है। दो के बीच में कुछ आ गयाउसके मायने अंतराय है। जैसे दान देने वाला और दान लेने वाला हे और उसके बीच में कोई अटक आ गयी तो वह भावरूप हो गयी या कुछ परिस्थितिवश हो गई उसको अंतराय कहते हैं। अपनी सामर्थ्य से जीवों को प्राप्त होने वाली शक्ति में दान आदिक में विघ्न करे उसे अंतराय धर्म कहते हैं। जैसे किसी सेठ की चाह है कि मैं 100) दान करूँ, बीच में मुनीम कुछ ऐसी बात रख दे कि इस समय दान देने की गुंजाइश नहीं है तो वह दानमें अंतराय आ गया। इसी तरह कोई घर खूब समर्थ है, लाखों का धन है, सारी बातें ठीक हैं पर घर का कोई आदमी ऐसी व्याधि से घिर जाय कि डाक्टर उसे जीवन भर केवल मूंग की दाल का पानी पीने को कहे तो सब कुछ घर में होते हुए भी वह खा नहीं सकता, सभी चीजों को देखकर वह खाने की इच्छा करता है पर खा नहीं पाता है तो यह उसके अंतराय का उदय है। ऐसे ही और भी अनेक बातें हैं। तो उदय की बड़ी विचित्रताएँ हैं। सोचो और कुछ होता है कुछ। यह अपने जीवन में सबके घटित है लेकिन ज्ञानी जीव तो इस संबंध में यह चिंतन कर रहा है कि यह सब कर्मफल है। हो तो हो, न हो तो न हो, भोग पाये तो क्या, न भोग पाये तो क्या, ये सब कर्मफल हैं। और इन भोगों को भोगेंगे तो उसके जो भाव बनते हैं वे भाव भी कर्मफल हैं। मैं न विभावरूप हूँ, न अन्य किसी रूप हूँ। इस प्रकार कर्मफलों से भी निराला अपने आपका यह चिंतन कर रहा है विपाकविचय धर्मध्यानी जीव। इस अंतराय कर्म में जो 5 अंतराय बताये हैं―दानअंतराय, लाभांतराय, भोगांतराय, उपभोगांतराय और वीर्यांतराय। इससे अब अंतराय कर्म का बिल्कुल क्षय हो जाता है तो स्पष्ट रूप से अनंत वीर्यप्रकट होता है।। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये 5 ज्ञान बताये हैं। इन 5 ज्ञानों के आवरण हैं। जब इन 5 ज्ञानावरणों का क्षय हो जाता है तो केवलज्ञान प्रकट होता है। ऐसे ही 5 ज्ञानावरण नष्ट हो गए तो 5 ज्ञान प्रकट हो जाएँ। एक केवलज्ञान प्रकअ होता है। वे चार तो एक देशरूप हैं, विशुद्ध ज्ञान नहीं हैं। इस प्रकार जब 5 प्रकार का अंतराय का क्षय हो जाता है तो आत्मा में अनंत वीर्य प्रकट होता है। तो जैसे ज्ञानों में मूल ज्ञान केवलज्ञान है ऐसे ही आत्मा में अनंत शक्ति है सो अनंत शक्ति प्रकट होती है।


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