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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1671

From जैनकोष



स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतै: पदार्थैश्चेतनेतरै:।

संपूर्णोऽनादिसंसिद्ध: कर्तृव्यापारवर्जित:।।1671।।

सर्व पदार्थों की उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकता―उत्पाद व्यय ध्रौव्य से युक्त चेतन और अचेतन पदार्थों से यह लोक व्याप्त है। लोक कहते किसे हैं? अवलोकते सर्वाणि द्रव्य: यत्र स लोक:। जहां समस्त द्रव्य दिख जायें, पाये जायें उसे लोक कहते हैं। समस्त द्रव्यों का ही नाम लोक है। ये समस्त द्रव्य उत्पाद व्यय ध्रौव्य से युक्त है। प्रत्येक पदार्थ चूंकि वे हैं अतएव नियम से बनते हैं और बिगड़ते हैं। उत्पाद उनमें होता है और पूर्व पर्याय का व्यय होता है। कोई भी पदार्थ कल्पना करो कि बनता नहीं, बिगड़ता नहीं और फिर भी हो तो बुद्धि तो गवाही न देगी, श्रद्धा के आधार पर भले ही कोई कह दे एक अपरिणामी ब्रह्म। और जरा भी उसकी अवस्था न हो, परिणमन न हो वह बुद्धि में तो आयगा नहीं। श्रद्धा में तो जो चाहे चीज जानी जा सकती है पर श्रद्धा सत्य वह है जो यथार्थ वस्तुस्वरूप की हो। प्रत्येक पदार्थ उत्पादव्यय ध्रौव्य करके युक्त हैं, त्रयात्मक हैं, त्रिदेवतात्मक हैं, जिनकी अनेक लोगों ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश के नाम से कल्पना की है और बताया है कि ये देवता हुए हैं, ब्रह्मा ने उत्पत्ति की है, विष्णु ने रक्षा की है, और महेश ने प्रलय किया है। कब दृष्टि की, कब तक रक्षा की, कब प्रलय करेंगे, इसका अंतर लंबा-लंबा है लेकिन वस्तुस्वरूप यह बतला रहा है कि इसका अगला काल लंबा नहीं है। एक ही समय में ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, महेशत्व प्रत्येक पदार्थ में पाया जा रहा है अर्थात् उत्पाद व्यय ध्रौव्य श्रेष्ठ होना, उसकी रक्षा रहना अर्थात् सत्त्व बना रहना, ध्रुव रहना और व्यय होना, प्रलय होना प्रत्येक पदार्थ में निरंतर पाया जा रहा है। त्रिगुणात्मक है समस्त द्रव्यसमूह। और पदार्थ की ही बात है। आज का हमारा राष्ट्रध्वज भी लहराकर कह रहा है कि प्रत्येक पदार्थ त्रिगुणात्मक है। राष्ट्र के ध्वज में तीन रंग हैं, बीच में सफेद और ऊपर नीचे लाल, हरा। साहित्य में हरा रंग उत्पाद में आता है और लाल रंग व्यय में आता है। सफेद रंग धीरता स्थिरता में आता है, और देखो कि ध्रुव के साथ ही में सफेद रंग के आस-पास ही उत्पाद व्यय के रंग चढ़े हुए हैं। उत्पाद होते हुए ध्रुव निरंतर बना रहता है जो उत्पाद व्यय दोनों को सम्हाले हुए है। हम सत् हैं, निरंतर उत्पाद व्यय ध्रौव्य करते हैं।

सबका अपने-अपने निज क्षेत्र में अपने गुणों का योग्यतानुसार परिणमन―यह अपने ही प्रदेशों में रहकर अपना उत्पाद किया करते हैं। और नवीन अवस्था का उत्पाद हुआ, उसी के मायने यह है कि पूर्व पर्याय का व्यय होगा। मैं ही क्या, जगत् के समस्त चेतन अचेतन पदार्थ अपने आपके अस्तिकाय में गुणों में अपना परिणमन किया करते हैं और इसी कारण प्रत्येक पदार्थ आज तक है। यदि कभी ऐसी गड़बड़ हो गयी होती कि एक पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ में अपना परिणमन धर दे तो जगत् शून्य हो जाता। यह सारा जगत् अब तक टिका है, सामने दिख रहा है। यह ही इस बात का प्रमाण है कि वस्तु का स्वरूप चतुष्टय अपना-अपना है। हाँ, इतनी बात को मना नहीं किया जा सकता कि इन परिणमनों में जो विभावपरिणमन हैं, अपने स्वभाव के विरुद्ध परिणमन हैं, विकार परिणमन हैं, वे सब परिणमन किसी पर-उपाधि के संसर्ग में हो रहे हैं। ये पर-उपाधि के बिना केवल अपने आपके स्वभाव से ही विभावपरिणमन नहीं हो रहे, सो ऐसे विभावरूप परिणमन में इस प्रमेयमान उपादान की ऐसी कला है कि वह किसी अनुकूल निमित्त का सन्निधान पाकर विभावरूप परिणम जाय यों पदार्थों को निरखना उनके एकत्वस्वरूप में।

कर्तृत्वविवर्जित विशुद्ध अंतस्तत्त्व की दृष्टि में आकुलताओं की समाप्ति―देखिये बात सब ओर की सही है, निमित्तनैमित्तिक भाव की बात सही है, उपादान के एकत्व की बात सही है, निर्णय के लिए सब निर्णय कर लीजिए, पर हम उस चर्चा को क्यों लंबा करें जिस चर्चा में हमें बुद्धि अनेक पदार्थों पर उनके संबंध पर दे देकर उपयोग को भ्रमाना पड़ा। वह सब सत्य है, यह भी सत्य है, लेकिन हम अपना हित किस दर्शन में पाते हैं, हम अपने को अनाकुल किस दर्शन में अनुभवते हैं? उसका भी तो निर्णय रखियेगा। प्रत्येक पदार्थ अपने उत्पाद व्यय ध्रौव्य से रहते हुए अनादि से चले आये हैं। अनंत काल तक चले जायेंगे। यों यह लोक चेतन अचेतन समस्त पदार्थों से परिपूर्ण है, इस दृष्टि में स्व स्वामित्व का संबंध पर के साथ नहीं रहता। इस दृष्टि में पर के कर्तृत्व का अभिमान नहीं ठहरता। इस दृष्टि में उपयोग को बहुत-बहुत भटकना नहीं पड़ता। पदार्थ के एकत्वस्वरूप का दर्शन जो स्वरूप पदार्थ में नित्य अंत: व्यक्त है, प्रकाशमान है, पर मोही जीव चूंकि कषायों से उपयोग को मिला रखा है तो उन कषायों की प्रेरणा में अपनी बुद्धि को गंवाकर पदार्थ के एकत्वस्वरूप का दर्शन नहीं कर पाता। यों यह लोक कहो या पदार्थ कहो अनादिकाल से इसी प्रकार प्रसिद्ध चला आया है, और यह लोक कर्तृत्व के व्यापार से रहित है। जैसे अनेक लोग यह धारणा बना लेते हैं कि इस लोक को किसी ने बनाया तो है और ऐसा गाकर उस ईश्वर के उसमें महत्ता स्थापित करते हैं। अरे ईश्वर की महत्ता उस विशुद्ध ईश्वर की महत्ता बताकर बढ़ेगी। कर्तृत्व तो एक रोग है जिस रोग में रहकर हम बेचैन रहा करते हैं। कोई एक रुई धुनने वाला विदेश गया हुआ था, वहाँ से जब अपने घर को लौटा तो पानी के जहाज में बैठकर आया। उस जहाज में हजारों मन रुई लदी हुई थी। धुनिया उस रुई को देखकर एकदम अशांत गया, हाय रे हाय कितनी रुई लदी है, यह सब रुई हमीं को तो धुननी पड़ेगी। बस चिंता हो गई, सिर तक असर गया, हरारत हो गई, बुखार भी हो गया, लोग आये, दवा की। कुछ आराम न हुआ। एक चतुर व्यक्ति आया, बोला आप लोग जाइये, हम इसकी औषधि करेंगे। बैठ गया, आपस में बोलचाल होने लगी। चिकित्सक बोला कि तुमको यह हरारत कब हुई, कहां से आ रहे? बोला हम विदेश से आ रहे, पानी के जहाज में बैठकर आये।....अच्छा तुम्हारे साथ कितने लोग थे? धुनिया बोला कि आदमी तो एक भी न था, पर उसमें हजारों मन रुई लदी थी, उसकी इस रागमय बात को सुनकर वह पहिचान गया कि इसे क्या रोग है। बोला―अरे तुम उस जहाज से आये, वह जहाज तो आगे के बंदरगाह में जो ही लगा कि न जाने क्या हुआ कि सारा जहाज आग से जल गया। अरे जल गया? लो चंगा हो गया। अब वह चिंता न रही कि हाय हमको तो यह सारी रुई धुननी पड़ेगी।

सुखानुभव का आधार इच्छा का अभाव―एक और राज देखिये कि हम आप सबको जितने सुख होते हैं वे सब सुख इच्छा के अभाव से होते हैं। मानते यह हैं कि इच्छा की पूर्ति से सुख हुआ। अच्छा यह बतलावो कि पूर्ति नाम किसका? क्या जैसे बोरों में गेहूं भरते हैं और भर-भरकर बोरे की पूर्ति कर देते हैं। ऐसे ही हम आत्मा में इच्छा भरते हैं और भर-भरकर हम इच्छा की पूर्ति करते हैं? इच्छा के न रहने का नाम ही इच्छा की पूर्ति है। अरे सर्व सुखों में आप यह बात पायेंगे कि इच्छा नहीं रही उसका सुख है। भोजन कर चुकने के बाद जो सुख अनुभवा जाता है अब उस तरह की इच्छा नहीं रही उसका सुख है। भोजन कर चुकने के बाद जो सुख अनुभवा जाता है अब इस तरह की इच्छा नहीं रही उसका सुख है। कोई कहे―वाह भोजन किए बिना इच्छा न रहे, सुख लूट लेवे। तो लूटने वाले वहाँ भी सुख लूट लेते हैं। भोजन भी कर चूके, अब निरखियेगा, भीतर पेट भरा इससे सुख नहीं आ रहा, ज्ञान देखिये किस तरह का ज्ञान आ रहा है जिस पर सुख की प्राप्ति चल रही है। वहाँ भोजन संबंधी इच्छा नहीं उसका सुख है। जो साधु योगीश्वर भोजन किए बिना दो-दो, चार-चार दिन का उपवास करने पर भी भोजन की इच्छा नहीं रखते उनके बराबर आनंद चल रहा है। एक बात। दूसरी बात यह देखिये कि जिसको जब भी सुख मिल रहा है वह इस भाव का मिल रहा है कि मेरे करने को अब काम नहीं रहा। खूब विचार करके देखिये―किसी को मकान बनवाना है, दु:खी है, तब तक मकान पूरा नहीं बनता बड़ा श्रम करता है, मकान बन चुकने के बाद जो उसे सुख होता है वह मकान बनने का सुख नहीं होता, किंतु उस स्थिति में उसके यह भाव बनता है कि अब मेरे करने को काम नहीं रहा, उसका सुख हुआ है। हर काम में काम कर चुकने के बाद जो सुख होता है वह काम करने का सुख नहीं होता, किंतु अब मेरे करने को काम नहीं रहा इस भाव का सुख होता है। खूब सूक्ष्म दृष्टि रखकर परख लीजिए, और ज्ञानी जीव बिना कुछ नाम किए ही सुखी बने रहते हैं क्योंकि उनके सभी पदार्थों का यह निर्णय पड़ा हुआ है कि मेरे करने को परपदार्थ में कुछ काम ही नहीं। अपने स्वरूप से बाहर मेरी कहीं परिणति ही नहीं। अपने स्वरूप से बाहर मेरी कहीं परिणति ही नहीं। मैं जानता हूं तो अपने में ही जो कुछ कर रहा हूं बस यही जान रहा हूं, जो कुछ भी अनुभवता हूं मैं अपने ही क्षेत्र में सब अनुभवता हूं। मेरे करने के लिए कुछ पड़ा ही नहीं, बाहर किया ही नहीं जा सकता, अब इसको किया ही नहीं जा सकेगा, अर्थात् मेरे करने को कहीं कुछ काम है ही नहीं, इस भाव का सुख है। जो बात जिस पद्धति से होती है वह तो उसी पद्धति से होती है पर मोही जीव अपनी कल्पना में अन्य बात मान लेता है। जिस जन्म के बाद मरण की बात, शरीर रचना की बात जिस विधि से होती है उसी विधि से चलती रहे, पर कल्पना में अपनी भेष मुद्रा चाहे जिस ढंग से कर लें पर जन्म–मरण तो सबके जैसे होते वैसे ही होते, उनमें कोई भिन्नता नहीं कर पाते। तो ऐसे ही इन समस्त पदार्थों की रचना में विधि में उत्पत्ति में सब कुछ बात में जो है सो ही चल रहा है पर अज्ञानी जीव मानकर कल्पनाएं करके कुछ विरुद्ध बात मान लेते हैं और इसी कारण अज्ञान में भटकना बराबर बनी रहती है।

पदार्थों का स्वरूपस्वातंत्र्य―लोक क्या है? यह विश्व है। विश्व का अर्थ दुनिया नहीं। विश्व मायने है समूह। यह लोक क्या है? समूह है अर्थात् सर्वपदार्थों का समूह है। ये पदार्थ अपने एकत्वस्वरूप को नहीं छोड़ते। तभी सारी व्यवस्था बनी है। एक पिंड भी बने, जीव और अजीव का पिंड बन गया जिसे हम असमानजातीय पर्याय कहते हैं। वैसे भी सब तत्त्व सब द्रव्य अपने आपके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव में हैं, यह अजीव, अजीव का पिंड बन गया, मगर समानजातीय द्रव्य पर्याय कहते हैं वहाँ पर भी प्रत्येक अणु अपने-अपने स्वरूप को लिए हुए है। यह वस्तुस्वरूप है, इसे कौन मेटे? 6 साधारण गुण ही सर्वप्रथम इस व्यवस्था को बना लेते हैं। वस्तु है, अस्तित्व हुआ, पर सब रूप नहीं, ऐसा ख्याल करने के लिए है वस्तुत्व अर्थात् अपने स्वरूप से है परस्वरूप से नहीं। पर है, है में काम नहीं चला, वह परिणामी भी है, इसके लिए द्रव्यत्व गुण संकेत कर रहा है कि प्रतिसमय पर्यायरूप में द्रवता रहती है, अर्थात् क्या स्वच्छंद होकर पदार्थ जिस चाहे के पर्यायरूप में द्रवता है? नहीं। उस पर कंट्रोल करने के लिए अगुरुलघुत्व गुण है। प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें ही परिणमता है, अर्थात् पदार्थ न गुरु बनता, न लघु बनता। गुरु तो तब बनता है जब दूसरे पदार्थ का परिणमन उसमें आया तो वजनदार बन गया। जब वजनदार बने तब उस पदार्थ का परिणमन खिंचकर अन्य में पहुंचा तो रीता हो गया, लघु हो गया, ऐसा गुरु लघु नहीं होता। ये सब पदार्थ अपने-अपने प्रदेशों को लिए हुए हैं। लोक में वजनदार जंच रहे और ये पदार्थ किसी न किसी के ज्ञान में प्रमेय हैं यह प्रमेयत्व गुण है, लेकिन साधारण गुणों में वही व्यवस्था विदित हो गयी जो पदार्थ के नित्य पदार्थ में होना चाहिए। यों चेतन अचेतन पदार्थ अपना-अपना स्वरूप लिए हुए है, अनादिकाल से अवस्थित हैं, अनंत काल तक रहेंगे। उन सब पदार्थों के समूह का नाम यह लोक है। यह लोक का चिंतन चल रहा है। इस विस्तार के चिंतन से आत्मा के रागद्वेष भी पतले हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं, उपयोग बदल जाता है। संस्थानविचय धर्मध्यान की बात चल रही है। इस धर्मध्यान के पात्र उत्कृष्ट रूप से साधु जन ही होते हैं। इससे स्व का और पर का स्वरूप विदित होगा। उससे भेद ज्ञात होता है। भेदज्ञान करके अनात्मतत्त्व को छोड़कर अपने आत्मतत्त्व का ग्रहण करने का विवेक करना होता है। उसको देखकर उसमें रमकर उसमें ही तृप्त होकर हमें अपने ये दुर्लभ क्षण सफल बनाना चाहिए।


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