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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1674

From जैनकोष



धनाब्धि: प्रथमस्तेषां ततोऽन्यो घनमारुत:।

तनुवातस्तृतोऽंते विज्ञेया वायव: क्रमात्।।1674।।

लोक के चारों ओर धनोदधि, धनवात, तनुवात नाम के वायुओं का परिवेष्टन―पहिली वायु का नाम तो है धनोदधि। उसके ऊपर जो वायु है उसका नाम है धनवात और उसके ऊपर अंत में तनुवातवलय है। इस प्रकार तीन वातवलयों से यह लोक भरा हुआ हे, इसी कारण यह लोक इधर-उधर हट नहीं सकता, स्थिर है, और यह लोक है कहां? तो आकाश के बीच में है, याने समस्त आकाश अनंत हैं। उस आकाश के मध्य में ये लोक रचनाएं हैं। तो आकाश अनंत है, तो किसी भी जगह लोक रचनाएं हों वह सब आकाश का मध्य है और फिर वैसे भी मध्य है। तो समस्त आकाश के बीच में ये लौकिक रचनाएं हैं और इनके चारों ओर तीन प्रकार के वातवलय हैं जिनके आधार पर यह लोक दृष्ट होता है। अब देखिये― इतने बड़े लोक में ऐसा कोई प्रदेश नहीं बचा है जिस प्रदेश पर हम आप अत्यंत बार पैदा न हुए हों। हमारा जन्म-मरण क्या है? अनंत बार प्रत्येक प्रदेश में अपना जन्म-मरण हुआ। उसमें कहां क्या रचना है―यह सब आगे बताया जायगा। किस जगह स्थावर जीव हैं, किस जगह त्रस जीव हैं, कितने में देव जीव हैं, कितने में नारकी जीव हैं यह सब वर्णन अभी आयगा। तो चार गतियों के जीवों से फैला हुआ यह लोक है और लोक में ही सिद्ध भगवान् विराजे हैं, वे लोक से बाहर नहीं हैं पर लोक के अंत में हैं। जहां तक लोक पाया जाता है, जिसके बाद फिर लोक नहीं हैं वहाँ सिद्ध भगवान् विराजे हैं।


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