• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1691

From जैनकोष



न तत्र सुजन: कोऽपि, न मित्रं न च बांधवा:।

सर्वे ते निर्दया: पापा: क्रूरा भीमोग्रविग्रहा:।।1691।।

निर्दय, पापी, क्रूर नारकियों की वराकता―उन नरक भूमियों में कोई भी सज्जन पुरुष नजर नहीं आते। बड़ी भयानक पृथ्वी है वह, जहां गरमी है तो इतनी अधिक है कि लोह का पिंड भी गल जाय, ऐसी कठिन गरमी को भी वे नारकी जीव सहन करते हैं। ऐसे ही ठंड की वेदना भी वहाँ ऐसी है कि लोह पिंड भी पिघल कर पानी जैसे बन जाते हैं इस तरह की तीव्र ठंड की वेदना भी वे नारकी जीव सहन करते हैं। बड़े-बड़े भयानक देहधारी क्रूर पशु हैं (हैं वे वैक्रियक शरीरधारी नारकी ही) जो कि दूसरे नारकी जीवों को सताते हैं, एक नारकी जीव दूसरे नारकी जीव पर टूट पड़ता है, खंड-खंड कर देता है। तो वे नारकी जीव निरंतर दु:खी रहा करते हैं, उनको कभी भी किसी भी प्रकार का चैन नहीं है। वे नारकी जीव पाप के उदय के वशीभूत होकर यों दु:ख सहते हैं। वे सभी नारकी पापी है―गम खाने वाले कोई नहीं हैं। वे निर्दय हैं, क्रूर हैं, भयानक तीक्ष्ण उनके देह है, उग्र नारकी जीवों को कभी किसी प्रकार का किसी से कोई सहारा नहीं मिलता। देखिये यह जीव भूल तो जरासी करता है और कष्ट कितने भोगने होते हैं? जो अपना स्वरूप नहीं है उसे माना कि यह मैं हूं, की इतनी सी भूल और फल कितना भोगना पड़ा कि चौरासी लाख योनियों में इस जीव को जन्म–मरण करना पड़ता है। इस प्रसंग में एक बात और विलक्षण देखो कि जिन गतियों में सुख के बड़े साधन है उन गतियों से जीव को निर्वाण नहीं होता। जैसे देवगति, भोगभूमिया के लोग जिनको कोई कष्ट नहीं है उनको निर्वाण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता है, नारकी जीव यद्यपि घोर दु:ख सहते हैं पर ऐसा उदय है कि उन्हें दु:खी ही होना पड़ता है, ऐसा कठिन पाप है। सबसे महान पाप तो मोह है, मिथ्यात्व है, इनका आश्रय करके दु:खी होता और खूब उदय भर वे अपना फल भोगते।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1691&oldid=83625"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki