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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1699-1700

From जैनकोष



विषयाशामपाकृत्य विध्याप्य मदनानलम्।

अप्रमत्तैस्तपश्चीर्णं धंयैर्जंमार्तिशांतये।।1699।।

उपसर्गाग्निपातेऽपि धैर्यमालंब्ये चोन्नतम्।

तै: कृतं तदनुष्ठानं येन सिद्धं समीहितम्।।1700।।

प्रमादमदमुत्सृज्य भावशुद्धया मनीषिभि:।

केनाप्यचिंत्यवृत्तेन स्वर्गो मोक्षश्च साधित:।।1701।।

शिवाभ्युदयदं मार्गं दिशंतोऽप्यतिवत्सला:।

मयावधीरिता: संतो निर्भर्स्य कटुकाक्षरै:।।1702।।

नरकजन्महेतुओं के स्मरण होने पर पूर्वकृत पाप का संताप―संस्थानविचय धर्मध्यान का प्रकरण चल रहा है। इसमें लोक की रचनावों का चिंतन चल रहा है। कितना बड़ा लोक है, कैसी-कैसी रचनाएं हैं? इस समय अधोलोक के चिंतन में नारकी जीव नरक में उत्पन्न होकर यह सोच रहा है कि ओह ! मैं यहाँ किस भूमि पर आ गया हूं? सारी भूमि भयानक दिखती है। थोड़ी देर में जब कुछ प्रतिबोध होता है तो वहाँ ज्ञानी विचारता है कि अहो !यह सब धर्म से विमुख होने का फल है। ऐसे साधु संतों की वाणी मुझे बड़ी कटुक लगी, जिन साधु संतों ने विषयों की आशा दूर कर कामरूपी अग्नि को बुझाकर अप्रमत्त होकर महान् तपश्चरण किया था, एक जन्म जरा मरण की पीड़ा मिटाने के लिए संसार के दु:खों से छूटने के लिए जो प्रतिबद्ध थे, निष्कषाय थे उन्होंने करुणा करके उपदेश भी किया तो मैंने उसे नहीं माना विमुख रहा, उसे कटुक ही समझा, उस अधर्म का यह फल है कि इस नरक भूमि में जन्म लेना पड़ रहा है।

ज्ञानी पुरुष का सार के लिये सार उद्यम―देखिये सार तत्त्व, ज्ञानी पुरुषों ने ऐसा कौनसा एक आश्रय किया जिससे उन्हें सफलता मिली, मन को स्थिर किया, वश किया और अपने आत्मा के प्रयोजन की सिद्धि की। बहुत से लोग यह समस्या सामने रखते हैं कि हम जब जाप देते हैं, पूजन करते हैं, सामायिक करते हैं, ध्यान में बैठते हैं तो मन चारों ओर टिकता फिरता है। कहीं लगता नहीं। ऐसी-ऐसी जगह मन पहुंचता है कि जहां धर्म करते समय नहीं पहुंचता। समाधान में केवल एक ही बात है। जिन जीवों ने उस एक उपदेश का निर्णय नहीं किया, जो परमार्थभूत है, सत्य है, अपने आपमें शाश्वत विराजमान है वह मन को कैसे स्थिर कर सकता है? एक स्वांतस्तत्त्व के अनुभव के बिना किसी को भी धर्म मानकर वहाँ मन टिकाना चाहेगा, तो आखिर वह भी पर स्थान है, भिन्न वस्तु है, मन कहां टिकेगा? जिन्होंने अपना अनुभव किया है मैं देह से भी निराला, तर्क वितर्कों से भी परे, इन रागद्वेष विकल्पों से भी परे अपने ही स्वभाव से केवल ज्ञानप्रकाश मात्र, चित्स्वरूप मात्र यह मैं अंतस्तत्त्व हूं ऐसा जिनको प्रत्यक्ष की तरह अपना आत्मस्वरूप अनुभव में आया है वे तो मन को झट वहीं टिका लेंगे, अपने मन को वश कर सकेंगे, किंतु जिन्हें इस परमार्थ परम एक पद का अनुभव नहीं है वे कदाचित धर्म के नाम पर भी मन को लगायेंगे तो कहां लगायेंगे? मूर्ति में लगायेंगे। किसी आकार को सोचकर उसकी भक्ति में लगायें अथवा किन्हीं विकल्पों में लगायें। वे सब पर स्थान हैं, वहाँ चित्त नहीं लग सकता। स्थिर होने की जगह तो निज स्वरूप है। जिन संतपुरुषों ने ऐसे निजस्वरूप का अनुभव किया और जगत के जीवों पर करुणा करके कुछ उपदेश दिया तो जिन जीवों ने उसे कटु माना, उस धर्म से विमुख रहे, विषयों में आसक्त रहे वे पुरुष नरक आयु का बंध करते हैं, नरक में जन्म लेते हैं और दु:ख भोगते हैं। संस्थानविचय धर्मध्यान में ज्ञानीपुरुष चिंतन कर रहा है। कैसी-कैसी लोक में जगह हैं और किस-किस तरह के जीव रहा करते हैं, इतने विस्तार वाले वर्णन को सुनकर, जानकर, लोगों के विस्तृत स्वरूप को समझकर पुरुष राग से दूर होते हैं और वैराग्य में बहुत साधक हैं। लोक विस्तार और काल विस्तार का वर्णन जानना।

संतों के उपदेश की अवहेलना का कटु परिणाम―जो जीव लोक विस्तार को नहीं जानते, कितना बड़ा लोक है और वहाँ प्रत्येक प्रदेश पर इस जीव ने अनंत बार जन्म लिया है, यह बात जिनके ज्ञान में नहीं है वे अपने पाये हुए थोड़े से क्षेत्र में ममता करते हैं। वहाँ की यश नामवरी से वहाँ के निवास से उनके ममता हो जाती है और जिन्हें लोकस्वरूप का विस्तृत बोध है उन्हें अपने क्षेत्र में ममता नहीं रहती। तो ऐसे साधु संतों का उपदेश जिन्हें नहीं रुचता वे जीव नरक में जन्म लेते हैं। कैसे हैं वे संत पुरुष कि अपने तत्त्वज्ञान में ऐसा दृढ़ है कि उपसर्ग आ जाय, अग्निदाह हो जाय, कैसी ही कठिन विपदा आ जाय पर धर्म का आलंबन करके जिन्होंने अपने आत्मा का अनुमान किया है और शुद्धि प्राप्त की है। ज्ञान में ज्ञान है, ज्ञान का ज्ञान करने वाला ज्ञान है, जो ज्ञान ज्ञान के स्वरूप का ज्ञान कर रहा हो वह ज्ञान आत्मानुभव है। आत्मा को केवल ज्ञान के रूप में जान सकते हैं, अन्य रूप में इसकी परख नहीं हो पाती। यद्यपि आत्मा विस्तृत हैं, लंबा चौड़ा फैला हुआ भी है, देह में रहते हुए की स्थिति में यह देहप्रमाण है। देह से मुक्त हो जाने पर जिस देह से मुक्त होता है उस देह प्रमाण है, उसमें लंबाई चौड़ाई है पर उस सब विस्तार को देखने से आत्मा को आत्मा का अनुभव नहीं मिलता। इस प्रकार आत्मा की अवस्थाएं अनेक हैं, शुद्ध अशुद्ध परिणतियां अनेक हैं, उन परिणतियों को उपयोग में रखने पर आत्मानुभव नहीं होता, किंतु आत्मा केवल ज्ञानमात्र है, एक प्रतिभासस्वरूप है ऐसा ज्ञान में लेने पर ज्ञानानुभव हुआ, वही आत्मानुभव है, ऐसा उत्कृष्ट ज्ञान कैसे प्रगट हो उसका साधक है भेदविज्ञान। यह मैं आत्मा एक सद्भूत वस्तु हूं। सद्भूत ज्ञान के नाते निरंतर उत्पाद व्यय भी करता रहता हूं। उत्पाद व्यय करके भी मैं अपने स्वभाव द्रव्य स्वरूप ध्रौव्य को कभी नहीं छोड़ता। यों मैं आत्मा उत्पादव्ययध्रौव्य से युक्त हूं। मैं उत्पाद शील हूं ना, अर्थात् मुझमें अनेक पर्यायें बनती रहती हैं, मैं अपने परिणमन में स्वतंत्र हूं अर्थात् किसी दूसरे पदार्थ की परिणति लेकर नहीं परिणमता हूं। भले ही उपादान अशुद्ध हो, पर अन्य निमित्त का सन्निधान पाकर आत्मा में विषम परिस्थितियां होती हैं पर परिणमा यह आत्मा अकेला ही, निमित्त को साथ लेकर नहीं परिणमा। प्रत्येक पदार्थ यों उत्पाद व्ययशील है। मैं परिणमता हूं अपने लिए, मेरा फल केवल मुझे मिलता है। सुख मिले, दु:ख मिले, शांति मिले, मुक्ति मिले, मलिनता हो, आकुलता हो, अनाकुलता हो, मेरे लिए ही परिणमन है, मैं अपने में ही परिणमता हूं। अपनी ही परिणति का परित्याग करके नवीन परिणतियां लेता हूं। यह मैं आत्मा सर्वत्र अकेला हूं। जब अपने स्वरूप का उपयोग रखता हूं तब तो मोक्षमार्ग रहता है और जब स्वरूप का उपयोग छोड़कर परपदार्थों को अपनाता हूं तो वहाँ बंधन का मार्ग मिलता है। मेरा मैं ही जिम्मेदार हूं, दूसरा मेरा जिम्मेदार नहीं, कोई परपदार्थ मेरा रक्षक नहीं। ऐसे तत्त्वज्ञानी पुरुष ने अकेले स्वतंत्र मार्ग का साधन किया, उन्होंने उपदेश किया, उस उपदेश को कटुक जानकर जो लोग दूर रहे, धर्म विमुख रहे, विषयों में बसे रहे, रागद्वेष के बंधन में ही जकड़े रहे ऐसे व्यसनी पुरुषों ने नरक आयु का बंध किया और वे वहाँ जाकर दु:ख भोगते हैं।

संस्थानविचय धर्मध्यान में ज्ञानी का चिंतन―संस्थानविचय धर्मध्यान में यह ज्ञानी का चिंतन चल रहा है। जिन संत पुरुषों ने प्रमाद छोड़कर, अभिमान छोड़कर भावशुद्धि करके स्वर्ग और मोक्ष की साधना की, उन्होंने स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग को बताया बड़े प्रेमपूर्वक करुणा से, लेकिन मैंने उन वाक्यों का तिरस्कार किया, उन साधु संतों का तिरस्कार किया जिनके कारण यहाँ अब मैं नरकभूमि में दु:ख भोग रहा हूं। देखिये किन्हीं भी विषयों के भोग में इस आत्मा को कुछ भी लाभ नहीं मिलता। एक विशेष इच्छा होती है, वेदना जगती है। रहा न जाय तो शांति के लिए उपाय करते हैं, मगर अंत में एक शांत दिमाग से सोचा जाय तो यह निर्णय मिलेगा कि पंचेंद्रिय के विषयों में से किसी भी विषय के भोग से आत्मा के साथ कुछ लगता नहीं है। जैसे कानों से खूब रागभरी बात सुनते हैं, राग रागनियां प्रेम की बातें, मोह उत्पन्न करने वाली बातें, काम भरी बातें सुनते हैं उन्हें सुन करके आत्मा का क्या लाभ है? परिणाम मलिन कर लेते हैं और अपना समय गंवा लेते हैं। किसी का सुंदर रूप नेत्रों से देख लिया तो उससे क्या लाभ मिला, कुछ भी तो हाथ नहीं लगा बल्कि अपने परिणाम बिगाड़ा, ऐसी ही बात घ्राणेंद्रिय की है। बहुत-बहुत सुगंधित तेल फुलेल लगा लिए, बड़े सौरभ वातावरण में रहे तो इससे आत्मा को क्या लाभ मिला? रसना इंद्रिय से अनेक प्रकार के रस चख लिया, कुछ थोड़ासा स्वाद ले लिया तो उससे भी इस आत्मा को क्या लाभ मिला। हाँ थोड़ा इतनी बात है कि रसास्वादन से कुछ क्षुधा की वेदना का शमन होता है, शरीर में बल रहता है, जीवन रहता हे तो यह कुछ थोड़ा लाभ की बात है। यों उस संबंध में यदि मृत्यु हो जाय तो जन्ममरण का भटकना तो बराबर चला। तो उदरपूर्ति से थोड़ासा लाभ हुआ, मगर रस से क्या लाभ लूटा? रस का तो आस्वादन किया, और उसमें थोड़ा उपयोग भ्रमाया, बहुत-बहुत उसमें चैन माना, अब उससे क्या हाथ लगा? बल्कि पेट दर्द करे, सिर दर्द करे। तो रसना इंद्रिय से भी लाभ की बात कुछ न रही। स्पर्शनइंद्रिय के विषयभोग में यह जीव अपना ही घात करता है। उपयोग बिगाड़ा और अपना देहबल भी बिगाड़ा, लाभ कुछ नहीं मिलता है। तो जो विषयों से उपेक्षा करके अपने आत्मस्वरूप का बोध करते हैं और आत्मतत्त्व का निर्णय करके वहाँ उपयोग शमन करते हैं जीवन तो उनका धन्य है। ऐसे पूज्य पुरुषों ने उपदेश किया करुणा करके, लेकिन मैंने उस उपदेश से विमुख होकर उनका तिरस्कार ही किया और अपने को विषयों में आसक्त ही रखा। इसका फल यह हुआ कि नरक भूमि के दु:ख भोगने पड़ रहे हैं।


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