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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1705-1706

From जैनकोष



परवित्तामिषासक्त: परस्त्रीसंगलालस:।

वहुव्यसनविध्वस्तो रौद्रध्यानपरायण:।।1705।।

यत्स्थित: प्राक् चिरं कालं तस्यैतत्फलमागतम्।

अनंतयातनासारे दुरंते नरकार्णवे।।1706।।

मांसभक्षण, परस्त्रीसेवन व व्यसनासक्ति से हुए पापों का संताप―नारकी जीव पश्चाताप करता है कि मैं पर के धन में आसक्त रहा, परस्त्री का संग करने में मोही रहा, परस्त्री संग की लालसा रखता रहा, पर के धनरूपी मांस में आसक्त रहा, और-और भी बहुत प्रकार के व्यसनों से पीड़ित होकर रौद्रध्यान में रहा, तो जब पूर्व जन्म में इस प्रकार के कुपथ पर रहा तो उसही कारण इन अनंत पीड़ावों से पार नरकरूपी समुद्र में हमें गिरना पड़ा। जब मनुष्यों को भी कठिन वेदना आती है तो उस समय उसका भी दिमाग कुछ ठिकाने होता है। यह लौकिक आनंद, यह रौद्रध्यान, यह परिणामों की मलिनता का अधिक कारण है। दु:ख में परिणामों की मलिनता उतनी नहीं होती जितनी विषय सुखों के मौज में। नारकियों में जो नारकी कुछ विवेकी है वह चिंतन करता है, बाकी अज्ञानी जीवों के वह चिंतन नहीं है। मारो, काटो, इन ही प्रसंगों में वे व्यस्त रहते हैं। सम्यग्दृष्टि नारकी हों तो उनके तो ध्यान पहुंचता ही है, पर जो विशिष्ट ज्ञान रखते हैं उनके न तो सम्यग्दर्शन हुआ हो तो तब भी यह विचार बन सकता है। जैसे यहाँ मनुष्यों में अनेक मनुष्य धर्म के संबंध में चिंतन रखते हैं, सभी तो सम्यग्दृष्टि नहीं हैं, फिर भी कुछ ध्यान रखते हैं तो ऐसे ही नारकियों में जिनके मिथ्यात्व मोह कुछ कम है, कुछ विवेक है वे भी चिंतन करते हैं और सम्यग्दृष्टि नारकी चिंतन करता है और इस प्रसंग में। तो भी मुनिराज ऐसा विचार कर रहे हैं कि यह लोक इतना बड़ा है, इसमें अधोलोक की ऐसी रचना है वहाँ नारकी ऐसा चिंतन करते हैं। यह प्रकरण है संस्थानविचयधर्मध्यान का। संस्थानविचयधर्मध्यान का अर्थ है उसका जो लोक और काल की रचना के आश्रय धर्मध्यान चलता है, जो समागम प्राप्त हुए हैं, जिन विकल्पों में हम रहा करते हैं वे सब एक विडंबना हैं। ये विकल्प और ये भोग, ये आत्मा के हितरूप नहीं हैं। यह बात जिनके चित्त में समाई हुई है वे लौकिकता से बढ़कर कुछ अलौकिक तत्त्व में आ जाते हैं और जिनके चित्त में यह संसार ही समाया है, अपना नाम यश प्रतिष्ठा, ये ही जिनके चित्त में समाये हैं वे अज्ञानी जीव हैं और उनको आत्महित की वांछा नहीं होती। तो नारकी इस प्रकार चिंतन करता है कि मैं मनुष्यभव पाकर और कुछ हितसाधन पाकर भी विकारों में व्यसनों में आसक्त रहा जिनके फल में आज नरक में जन्म लेना पड़ा है।


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