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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1742

From जैनकोष



यः प्राक्परकलत्राणि सेवितान्यात्मवंचकै:।

यौज्यंते प्रज्ज्वलंतीभि: स्त्रीभिस्ते ताम्रजन्मिभि:।।1742।।

परस्त्रीसेवन का फल―जिन मनुष्यों ने पूर्वभव में परस्त्री सेवन किया है उनको अन्य नारकी तांबे की अग्नि से लाल की हुई पुतलियों को जिनका आकार स्त्री की तरह है उन्हें चिपकाते हैं कि ले तुझे परस्त्री की बड़ी अभिलाषा थी तो इस ताती पुतली का संगम कर । इस तरह अन्य नारकी जीव उन कामी पुरुषों को उन ताती पुतलियों को चिपकाकर त्रास देते हैं । इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि यह जीव कैसे परिणाम करता है उस प्रकार का कर्मबंध होता ही है, और प्राय: उस कर्म का उदय आने पर उस उदय के अनुसार उसका पल भोगना पड़ता है । कभी ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य कर तो रहा है पाप, लेकिन फल मिल रहा है अच्छा तो उसका कारण यह है कि इस पुरुष ने पूर्वजन्म में पुण्य विशेष कमाया था जिसके उदय में पाप कर्म करने पर भी उसका असर नहीं हो पा रहा है, लेकिन उस पापकर्म का असर अवश्य होगा । कुछ समय बाद होगा । देर है पर अंधेर नहीं है । जो मनुष्य पापकर्म करता है वह उस पापकर्म के फल में नियम से दुर्गति प्राप्त करता है । हाँ कोई ज्ञानबल ऐसा आ जाय, पहिले ही सम्यक्त्व की भावना जग जाय तो वह पापबंध को हटा दे, पापकर्म की निर्जरा कर दे यह बात तो अलग है मगर ऐसा तो कोई बिरला ही संत पुरुष हो जो बाँधे हुए कर्मों को टाल सकता है ।


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