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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1745

From जैनकोष



विस्मृतं यदि केनापि कारणेन क्षणांतरे।

स्मारयंति तदाम्येत्य पूर्ववैरं सुराधमा:।।1745।।

परस्पर बैर का स्मरण कराकर पीड़ित कराये जाने की वेदना―यह वह नारकी कुछ थोड़ा बहुत भूल भी जाय एक दूसरे को सताने में तो वहाँ असुर जाति के देव जो संक्लिष्ट हैं उन्हें याद दिलाते हैं कि देखो वह तुम्हारा पूर्वभव का बैरी है । जैसे बहुत से मनुष्यों को तीतर, कुत्ता मनुष्य आदिक लड़ाने का बड़ा शौक होता है, उनकी लड़ाई को देखकर वे बड़े खुश होते हैं ऐसे ही असुर जाति के देव हैं । असुर कुमार के देवों में सभी देवों की इस प्रकार की अभिलाषा नहीं रहती, कोई खोटी जाति के देव असुरों में भी जो ऊधमी हैं उनकी ऐसी प्रकृति होती है । भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी आदि के जितने भी इंद्र हैं उन सब इंद्रों में असूर कुमार जाति के जो इंद्र हैं उनका वैभव बहुत बढ़ा चढ़ा होता है । यों समझना कि सौधर्म स्वर्ग के इंद्रों के प्रति असुर कुमार के देवों की ईर्ष्या चलती रहती है । वैभव असुर कुमार का अन्य इंद्रों की अपेक्षा बढ़ा चढ़ा है तो वहाँ नरकों में ऐसे असुर कुमार जाति के देव पहुंचते हैं और उन नारकियों को याद दिलाते हैं । देख तेरी आंखों में इसने शूल छेदी थी, यह तेरा बैरी है, चाहे उसने आँखों में अंजन ही लगाया हो, लेकिन ऐसी-ऐसी बातें कहकर उन नारकियों को वे आपस में लड़ाते रहते हैं । तो स्वयं मारने पीटने का तो दुःख उनके है ही, मगर असुर जाति के देवों के द्वारा भी उन्हें बहुत कुछ दुःख पहुंचाया जाता है ।


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