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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1754

From जैनकोष



मानुषोत्तरशैलेंद्रमध्यस्थमतिसुंदरम ।

नरक्षेत्रं सरिच्छैल सुराचलविराजितम ।।1754।।

नरलोक के क्षेत्र का परिमाण―यह मनुष्यलोक ढाई द्वीप में है अर्थात् पूरे जंबूद्वीप में दो लाख योजन का लवणसमुद्र है । लवणसमुद्र के चारों तरफ चार लाख योजन घातकी खंड द्वीप है और घात की खंड द्वीप के चारों ओर 8 लाख योजन का कालोदधि समुद्र है और कालोदधि समुद्र के चारों तरफ 16 लाख योजन चौड़ा पुस्कर द्वीप है । पुस्कर द्वीप के उत्तरार्द्ध में 8 लाख योजन चौड़ा पुष्करार्द्ध द्वीप हे । ऐसे ढाई द्वीप क्षेत्र में यह मनुष्य रहता है इससे आगे नहीं । यह क्षेत्र 45 लाख योजन का है । इतने लंबे क्षेत्र में किसी भी प्रदेश से ये सिद्ध भगवान मुक्त होकर सिद्ध लोक में जा विराजते हैं । तो 45 लाख योजन का ही सिद्ध लोक है । इस ढाईद्वीप में ऐसी कोई जगह नहीं बची जहाँ से मनुष्य निर्वाण को न पधारे हों । इसमें कुछ शंका ऐसी की जा सकती है कि समुद्रों से कैसे मोक्ष पधारे? तो समुद्र से मोक्ष जाने की यह विधि बनी है कि कोई मुनि महाराज को तपस्या करते हुए में किसी बैरी ने समुद्र में पटक दिया हो, किंतु उन मुनिराज का ध्यान उस समय उत्तम ही रहा, वहाँ ही केवलज्ञान प्राप्त किया और वही से मुक्त हो गए । तो समुद्र के भी प्रत्येक प्रदेश से अनगिनते मुनिराज मोक्ष पधारे । एक शंका और की जा सकती है कि जो मेरु पर्वत है उसका जो बीच का स्थान है, जहाँ एकदम चोटी ऊँची चली गई है और उस चोटी के ऊपर एक बाल के अंतर के बाद स्वर्ग की रचना चालू होती है, वहाँ से कैसे मुक्त गए होंगे? तो वहाँ से मुक्त होने की यह विधि बनी है कि कोई ऋद्धिधारी मुनि ऋद्धि बल से उस मेरु पर्वत के भीतर से भी गमन कर रहा हो तो उस मेरु के मध्य क्षेत्र में रुककर वहाँ ही उत्कृष्ट ध्यानी बन जाय, आयु पूरी होने का समय आ जाय, केवलज्ञान हो जाये और मुक्ति सिधार जाये तो वहाँ से भी मुक्ति होती है । इस ढाई द्वीप में कोई भी ऐसा प्रदेश नहीं बचा जहाँ से अनेक जीव मोक्ष न गए हों । कुछ नई स्मृतियों के अनुसार हम कुछ स्थानों को सिद्ध क्षेत्र मानकर पूजते हैं, पर वस्तुत: तौ सिद्ध क्षेत्र प्रत्येक स्थान है । जिस जगह हम रहते हैं, घर में बसते हैं, जहाँ बैठे हैं, जहाँ भी जाये, सभी जगह सिद्ध क्षेत्र है । तो ऐसा स्मरण कर के जैसे लोग सोचा करते हैं कि भाई हम तीर्थ क्षेत्र में हैं पाप की बात न विचारें, तो तीर्थक्षेत्र तौ सर्वत्र है । हम सभी जगह पाप की बात न विचारें । जैसे मरण काल जब आता है तो मरने वाला भी सोचता है । लोग भी समझते हैं कि अब तो इसका मरण काल है । अपना परिणाम निर्मल रखो । तो मरण काल तो प्रति समय है । जो समय गया वह समय फिर नहीं आने का है । बचपन गया, अब इस भव में बचपन वापिस नहीं आने का । जो जीवन गया वह वापिस तो नहीं आता । जो समय गया वह गया ही है ना । तो वह .मरण है, प्रति समय जीव का मरण हो रहा है । तो मरण समय में परिणाम सुधारों, इसका अर्थ यह जानें कि प्रत्येक समय में अपना परिणाम सुधारे।


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