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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1759

From जैनकोष



उपर्युपरि देवेश निवासयुगलं क्रमात् ।

अच्युतांतं ततोऽप्युर्ध्वमेकैकत्रिदशास्पदम ।।1759।।

ऊर्ध्वलोक में कल्पवासियों के कल्प और इससे ऊपर अन्य विभावों का संकेत―देवों के निवास 8 कल्पों में हैं, 8 जोड़ियों में हैं । एक-एक जोड़ी में दो-दो स्वर्ग चलते हैं । इस तरह सोलह स्वर्गों की रचना है, उनके ऊपर एक-एक विमान कर के 9 तो ग्रैवेयक हैं, एक अनुदिश का पटल है, एक अनुतर विमान का पटल है । इसमें सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं, और नवग्रैवयक के विमानों में मुनि ही उत्पन्न हो सकते हैं, चाहे सम्यग्दृष्टि हों अथवा मिथ्यादृष्टि हों । सोलह स्वर्गों में तो सभी श्रावक उत्पन्न हो सकते हैं । बारह स्वर्गों तक तिर्यंच विशिष्ट उत्पन्न हो सकते हैं । इस प्रकार ऊर्ध्व लोक में स्वर्गों की और स्वर्गों से ऊपर विशिष्ट विमान की रचनायें हैं ।


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