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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1768

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यक्षकिंनरनारीभिर्मंदारवनवीथिषु ।

कांतश्लिष्टाभिरानंदं गीयंते त्रिदशेश्वरा: ।।1768।।

स्वर्गलोक में देवों की इंद्रियसुखप्रियता―स्वर्गों का जीवन एक विलासता का जीवन है । जैसे यहाँ मनुष्य जब किसी दुःख से पीड़ित नहीं' रहता, दरिद्रता, भूख, प्यास आदि के दुःख नहीं हैं, कोई शारीरिक रोग नहीं है तो उसका मन प्राय: कर के विषयों के सुख भोगने के लिए ही चला करता है तो सुख में रहकर जीवों का मन एक मलिनता की ओर बहता है, इसी प्रकार वे देव चूँकि शारीरिक बाधावों से दूर हैं तो उनका मन भी एक इंद्रिय सुख लेने के लिए चला करता है । उन स्वर्गों में इंद्र सुंदर-सुंदर स्थानों में मंदार वृक्षों की गलियों में जो दोनों ओर से घने सुगंधित वृक्ष हैं, और भी रमणीक वातावरण हैं, यक्ष किन्नर सेवक देवांगनावों सहित वहाँ विहार करते हैं और वे देवांगनाएँ उस समय के आनंद से आनंदित होकर बहुत राग रागनियों से पूरित गान करती हैं । देखो--मनुष्य भी तभी गाते हैं जब वे कुछ सुख में हों । आपने देखा होगा कि बड़े-बड़े पुरुष ऐसे गाते हुए नजर नहीं आते जितना कि छोटे लोग रिक्शा चलाने वाले, तांगा हांकने वाले, बोझा ढोने वाले लोग चलते फिरते श्रम करते गाते रहते हैं । उनका चित्त मौज में रहता है, वे अपनी छोटी बुद्धि के माफिक, अपनी छोटी ममता के माफिक समागम पाकर तुष्ट हो जाते हैं और वे गान करते रहते हैं । तो गाना-गाना एक मौज बिना नहीं होता है । तो जब इतना बड़ा मौज, इतने बड़े वैभव सहित, इंद्र के सहित जा रही हों देवांगनाएँ तो वे देवांगनाएँ बहुत ही सुंदर राग रस से पूरित गान करती हैं । गाने भी अनेक कलावों से सहित होते हैं । जब यहाँ के मनुष्य ही बहुत शास्त्रीय ढंग से गान करते हैं, तो कितनी ही पद्धतियों और कलावों से पूरित वह वातावरण बन जाता है । एक बहुत बड़ी बुद्धिमानी जंचती है, लोग उनकी चतुराइयों पर प्रसन्न हुआ करते हैं, तब उन देवों के नृत्य गान का तो कहना ही क्या है, उनमें तो स्वभाव से ऐसी कला पायी जाती है इसलिए पुण्य फल में विभोर होकर वहाँ देवांगनायें नाना प्रकार से नृत्य गान करती हैं । यह स्वर्गों का ठाठबाट इस प्रकरण में दिखाया' जा रहा है । ज्ञानी जीव उसे एक बंधन का फल मानता है । जैसे दु:खमयी वातावरण मिलना जीव का बंधन है ऐसे ही इन सांसारिक सुखों का समागम मिलना यह भी जीव का बंधन है । पुण्य और पाप दोनों के फल को ज्ञानी जीव बंधन समझता है, पर पुण्य में ऐसा हुआ करता है उसका प्रदर्शन किया जा रहा है, और जो जीव धर्म की ओर उन्मुख होते हैं उनको वैसे ही पुण्य का बंध होता है । जो यहाँ बड़े-बड़े महर्षि हुए हैं पंचम काल में भी उनका श्रद्धान ज्ञान और चारित्र पवित्र था, फिर भी रागभाव तो होता ही है । चाहे वह तपश्चरण का अनुराग हो, चाहे संसार के प्राणियों के उद्धार का अनुराग हो, चाहे ग्रंथ रचना का अनुराग हो तो उसके कारण उन्होंने बड़ा पुण्यबंध किया और उसके फल में वे करीब-करीब स्वर्ग में ही उत्पन्न हुए होगे, तो स्वर्गों में भी वे महर्षि क्या कर रहे होंगे? वे बड़े ऋद्धिधारी देव बनकर ऐसे ही वातावरण में होगे लेकिन उनका सम्यग्ज्ञान जागृत होगा तो वे वहाँ भी निर्लेप रहते हैं, उन विषयों में आसक्त नहीं होते हैं, ज्ञानी जीव की ऐसी ही विशेषता है । नरकों में अनेक प्रकार के दुःख भोगकर भी जैसे उन दुःखों से अछूते रहते हैं, अपनी श्रद्धा और उपयोग में ऐसे ही पुण्य के फल में देव होते हैं तो वहाँ भी अनेक प्रकार के सुखों के बीच भी उन सुखों से वे अछूते रहते हैं ।


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