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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1774

From जैनकोष



नित्योत्सवयुतं रम्यं सर्वाभ्युदयमंदिरम् ।

सुखसंपद्गुणाधारं कै: स्वर्गमुपमीयते ।।1774।।

स्वर्गलोक की नित्यसमारोहसंपन्नता―उस स्वर्ग की किससे उपमा दी जाय जो स्वर्ग नित्य ही उत्सवों सहित है । रोज-रोज नये-नये उत्सव समारोह होते रहते हैं । जहाँ कभी किसी प्रकार का विशाद और शोक का काम नहीं है, इष्टवियोग नहीं है । कोई इष्टदेव गुजरे तो वहीं कुछ ही समय बाद दूसरा देव उत्पन्न हो जाता है । कोई देवांगना अगर गुजर गयी तो दूसरी देवांगना उसी जगह झट उत्पन्न हो जाती है । वहाँ बुढ़ापा तो आता नहीं, सदा जवानी रहती है । वहाँ शारीरिक रोग तो होते नहीं, कष्टदायी रंच भी बात नहीं आती है, फिर भी वहां के देव अपनी कल्पना से मानसिक दुःख बनाये रहते हैं । दूसरों का वैभव देखकर चित्त में कुढ़ा करते हैं, मेरे इतना वैभव क्यों न हुआ? इसके पास तो इतना सब कुछ है आदि । वह स्वर्ग इतना रमणीक है कि समस्त अभ्युदयों के भोगों का निवास है । भोग और उपभोग की सामग्री वहाँ विशेषतया पायी जाती है, सुख संपत्ति और गुणो का आधार है, इस कारण से उस स्वर्ग की उपमा किसी भी स्थल से नहीं दी जा सकती है । यहाँ कोई भी ऐसा स्थल नहीं जिससे स्वर्ग की उपमा दी जाय । उन देवों का एक शारीरिक ढाँचा ही सुख देने वाला है । वैक्रियक शरीर है, घृणा की कोई चीज नहीं है । हड्डी रुधिर मल मूत्र ये जहां नहीं पाये जाते हैं, उनका देह ही इस प्रकार का सुंदर वैक्रियक है तो वहाँ अन्य की सुंदरता का तो कहना ही क्या है? वह स्वर्ग निरुपम है, ऐसा वैषयिक सुख अन्यत्र अलभ्य है । ऐसे पुण्यफल स्वर्ग में पाये जाते हैं । इस तरह संस्थानविचय धर्मध्यान वाला ज्ञानी पुरुष चिंतन कर रहा है और साथ ही साथ यह भी जान रहा है कि शुभोपयोग के भावों से अर्थात् दया दान आदिक शुभभावों के होने से ऐसे भोग साधन प्राप्त होते हैं ।


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