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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1778

From जैनकोष



सप्तभिस्त्रिदशानीकैर्विमानैरंगनान्वितै: ।

कल्पद्रुमगिरींद्रेषु रमंते विवुधेश्वरा: ।।1778।।

स्वर्गलोक में देवेश्वरों की महती शोभा―स्वर्गो में इंद्र 7 प्रकार की देव सेनावों से सहित होकर क्रीड़ा वनों में आनंद करते हैं । यद्यपि स्वर्गो के देव और इंद्रों को किसी प्रकार के रक्षा के साधनों की जरूरत नहीं है क्योंकि उनकी असमय में मृत्यु नहीं होती । फिर भी पुण्य का फल तो फलित होता ही है । शोभारूप में वैभवरूप में इंद्र के साथ 7 प्रकार की देव सेना रहती है । उन देव सेनाओं से सहित और देवांगनावों से युक्त वे विहार करते हैं कल्पवृक्षों में और क्रीड़ा-वनों में यथेष्ट रमण करते हैं । ऐसा सुख भोगते हुए में सागरों पर्यंत की आयु उन्हें पता नहीं पड़ती कि कैसे व्यतीत हो जाती है? देवतावों में यदि कोई दुःख की बात आती है तो केवल उस प्रसंग में आती है कि जब उनका मरणकाल निकट होता है । देवों के मरण से 6 महीना पहिले उनके शरीर के बने हुए जो एक माला के रूप अंग हैं वे मुरझा जाते हैं और उस माला के मुरझा जाने से वे यह निश्चय करते हैं कि हमारी मृत्यु का अब समय आया है । जैसे यहाँ के मनुष्यों को कोई यदि बता दे कि तुम्हारा मरण दो चार महीने में होने वाला है तो उसकी बड़ी दुर्दशा हो जाती है, ऐसे ही जिन देवों को यह विदित हो गया कि अब मेरा मरण काल निकट है तो मरण का समय निकट जानने पर ये देव बड़ा संक्लेश करते हैं । तो दुःख की बात उन स्वर्गों में एक यही है कि मरण काल निकट आने पर छ: महीना पहिले से वे बड़ा संक्लेश मानते हैं, बाकी और समय में वे यथेष्ट आनंद भोगते हैं । संस्थानविचय धर्मध्यान में ज्ञानी पुरुष लोकरचना का विचार कर रहा है और पुण्यफल के रूप में स्वर्गों की रचना का चिंतन कर रहा है । तो जैसे पापफल को यह ज्ञानी जीव एक औपाधिक चीज समझता है इसी प्रकार पुण्यफल को यह ज्ञानी जीव एक औपाधिक चीज समझता है । तो वहाँ इंद्र 7 प्रकार की सेना सहित वनों में और यत्र तत्र विहार करते हैं । वह सेना केवल उनके एक वैभव के लिए है । कोई उनके रक्षा के प्रसंग की बात नहीं है । वे 7 सेनायें कौन-कौन हैं, उसे बता रहे हैं ।


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