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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 178

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सर्वास्रवनिरोधो य: संवर: स प्रकीर्तित:।

द्रव्यभावविभेदेन स द्विधा भिद्यते पुन:।।178।।

संवर का स्वरूप―समस्त आस्रवों का निरोध होना उसे संवर कहते हैं। वह संवर दो प्रकार का है―द्रव्यसंवर और भाव संवर। द्रव्यसंवर नाम है कार्माणवर्गणा में मिथ्यात्व न आने देना। यह द्रव्यसंवर है। भावसंवर नाम है अपने परिणामों में विकार न आने देना। संवर की व्याख्या अध्यात्मसूत्र में यह कही है विकारानुत्पत्ति: संवर:। संवर के आगे भेद करते हैं द्रव्यसंवर, भावसंवर, तो जो भेद किये जाते हैं उन भेदों का जो एक मूल है वह स्वरूप दोनों भेदों में लेना चाहिए, तब ऐसा वह भेद है। जैसे जीव के दो भेद किए गए―एक संसारी और एक मुक्त। तो संसारी में केवल जीवपना घटित हुआ और मुक्तपना घटित हुआ तब तो वे जीव के भेद है। नहीं तो कोई कहने लगे उनके दो भेद हैं―एक संसारी और एक चौकी। ठीक रहा ना? यह तो अट्टसट्ट बोलना है। संसारी में जीवत्व है पर चौकी में कहाँ जीवत्व है। तो जिनके भेद किए जाते हैं उनका स्वरूप भेद में घटित होता है, तो संवर का स्वरूप है विकार नहीं आने देना। तो कार्माणवर्गणा में कर्मत्व का आना, यह एक विकार है कर्म का। कार्माण वर्गणा में उनका यह विकार नहीं आ सकता यही है द्रव्यसंवर और जीव परिणाम में जीव का विकार न आ सके, यही है भावसंवर। ये दोनों प्रकार के संवर ज्ञानी जीवों के रहा करते हैं।

जीव का परपरिणति पर अनधिकार―द्रव्यसंवर पर जीव का अधिकार नहीं है, आस्रव पर भी अधिकार नहीं है, द्रव्यकर्म के आस्रव पर संवर पर निर्जरा अथवा मोक्ष पर जीव का अधिकार नहीं है। जीव तो जो कुछ भी कर सकेगा, परिणाम सकेगा वह अपने ही प्रदेशों में अपनी ही शक्ति के परिणमन में परिणम सकेगा। तो जीव का पुरुषार्थ जीव का अधिकार अपने भाव बनाने में हैं। अपने भाव करने से अर्थात् अन्य पदार्थ में कुछ परिणति करने पर मेरा अधिकार नहीं है। यद्यपि यह बात अविनाभावरूप है कि जीव यदि शुद्धभाव करे तो कर्मों का संवर होगा ही, जीव अशुद्धभाव करे तो कर्मों का आस्रव होगा ही। ऐसा अविनाभाव रहा आये, निमित्तनैमित्तिक संबंध रहा आये, फिर भी इस जीव का अधिकार परिणमन उस पदार्थ में नहीं है। जिसे यद्यपि रोज यह देखते हैं कि महिलाएँ रोटी यों बनाती हैं, सेका, बनाया, रखा, सब कुछ दिख रहा है, इतने पर भी महिला का अधिकार महिला के हाथ का कर्तव्य रोटी के सिकने का, बेलने का, बनाने का अधिकार नहीं है, किंतु हो रहा है अविनाभूत संबंध है कोई भी पदार्थ अपना परिणमन अपने प्रदेशों से आगे नहीं करता है। तब बतलावो उस महिला का कर्तव्य कितने तक है, बस जैसे हाथ चलते हैं उतने तक कर्तव्य है। उस प्रसंग में प्रत्येक वस्तु किस-किस प्रकार परिणमती है? यह सब वस्तु की बात है।

आत्मभावना व आत्मदया―जीव केवल अपने परिणामों की संभाल तक ही समर्थ है, इससे आगे जो कुछ होता है पर में वह सब निमित्तनैमित्तिक भाव की बात है। तब यही तो हुआ ना कि हमारी ही भावना संसार का नाश कर सकती है, हमारी ही भावना इस संसार को बढ़ा रही है। इस भावना के ही हम अधिकारी हैं, तब देखिए, जब केवल एक भावना करने मात्र से संसार का हो जाना, मोक्ष का हो जाना, इतने बड़े अंतर वाले काम होते हैं तब हमारा क्या यह कर्तव्य नहीं हो जाता कि हम ऐसी भावना बनायें जिसके फल से संसार के संकटों से मुक्त हो सकें? हम ऐसी भावना की सृष्टि में लगें, वह भावना शुद्ध आशय बनाने से होती है। आशय की अशुद्धता तो खुद के लिए बिगाड़ की बात है। हम पर का कुछ नहीं करते, अपना अभिप्राय निर्मल रखने का यत्न करें यही अपने आप पर सच्ची दया है।


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