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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 181

From जैनकोष



असंयममयैर्वाणै: संवृतात्मा न भिद्यते।

यमी यथा सुसन्नद्धो वीर: समरसंकटे।।181।।

संयम में पापबाणों का अप्रवेश―सम्यक्त्व जगे, महाव्रत का धारण हो, समिति, गुप्ति, चारित्र, तपश्चरण इनकी ओर दृष्टि जगे तो यह पुरुष कर्मों से अजेय हो जाता है। जैसे कोई पुरुष युद्ध में लड़ने जाय तो यदि वह अपने शरीर को लोहों के कवचों से जो युद्ध के साज हैं उनसे सजकर युद्ध में जाता है तो शत्रु के बाणों से यह भिदता नहीं है, इसी तरह से जिस आत्मा ने अपने आत्मा को व्रतों से, चारित्र से, तपश्चरण से मजबूत बनाया है उसे फिर असंयम के बाण, पापों के बाण नहीं भिदते हैं। सब बातें केवल एक चिंतन से होती है। यदि अपने चिंतन में शुद्ध दृष्टि आयी है आत्मस्वभाव की ओर झुकाव बनता है तो यह परिस्थिति इतनी सुदृढ़ होती है कि वहाँ खोटा भाव विषय कषायों के परिणाम फटक नहीं सकते। और इस ही में भला है। पापरूप परिणाम करके इस जीव को पराधीनता, पाप का बंध, घबड़ाहट, क्षोभ कायरता―ये सब खोटी बातें उत्पन्न हो जाती हैं, किंतु व्रतरूप प्रवृत्ति होने से, ज्ञानदृष्टि जगने से आत्मा में एक बड़ा बल उत्पन्न होता है और उसे पाप छू नहीं सकते।

विषय कषाय में अलाभ का चिंतन―अहो, विषयों के भोग में कषायों के करने में जीव को मिल क्या जाता है? खूब अच्छी तरह से निर्णय कर लो, अब तक क्या मिला, इससे ही समझ बना लो। इतनी उम्र हो गयी, नाना प्रकार के पंचेंद्रियों के विषयों में लगे रहे, आज लगा क्या हाथ? हाथ लगने की बात तो दूर रही, अपना खोया ही है सब कुछ। पुण्य खोया, आत्मबल खोया, मनोबल खोया, सब कुछ खोया है, पाया कुछ नहीं है। भले ही यह मोही जीव कल्पना में समझे कि हमने इतना परिवार बनाया, मकान बनवाया, हमने बहुत-बहुत काम किये, किंतु पाया कुछ नहीं। आज जो एक शरीर में बैठे हुए हैं उस शरीर में विराजमान् आत्मा की बात पूछो कि हे आत्मन् ! तुझे क्या लाभ मिला? उत्तर मिलेगा, कुछ नहीं। बल्कि यह और भी कायर बना, अधिक उलझनें आ गयी, अब यह और अधिक पराधीन हो गया। यों बिगाड़ ही बहुत मिला। यह बिगाड़ किसने किया? पाप परिणामों ने, असंयम भावों ने। यदि इन विडंबनाओं से बचना है तो अपनी शक्ति माफिक संयम धारण करो।

असंयमवृत्ति से पीछे पछतावा―भैया ! मनुष्य एक बार के खाने से भी जीवित रहते हैं लेकिन ऐसा असंतोष रखते हैं कि बार-बार बिना खाये काम तो नहीं चलता। ठीक है। कुछ पुण्य का उदय है, भोगसाधन मिले हैं, तो चाहे जितने बार खायें, लेकिन जब कोई दरिद्रता की स्थिति आ जाय या अन्य पशु नारकादिक कुयोनियों में जन्म हो जाय तो क्या वहाँ रात दिन कई बार खाये बिना गुजारा नहीं चलता? अरे कुछ उत्साह जगायें, कुछ संयम के भाव बनायें, अपने पद माफिक संयम की प्रवृत्ति रक्खें। यदि कुछ भी संयम न रक्खा, असंयमभाव में ही पड़ते गये तो जीवन तो जा ही रहा है। जब मरणकाल आयेगा तब इसको ख्याल होगा, ओह ऐसा दुर्लभ नर जीवन इसको इस तरह असंयम में, पापों में बिता डाला। बड़ा खेद होगा। जैसे बड़ी मुश्किल से पायी हुई निधि हाथ से छूटकर समुद्र में गिर जाय तो वह कितना विषाद मानता है, ऐसे ही समझो कि अनेक योनियों में भ्रमण करते-करते बड़ी कठिनाई से यह मनुष्य देह मिला है और इसे इंद्रिय के विषयों में ही खो दिया तो कुछ यदि विवेक रहेगा तो अंत में यह बहुत पछतायेगा। देखो शरीर तो गया ही, शरीर तो बूढ़ा ही हुआ, हम यदि भोगों में न रमते, असंयम में न रहते, कुछ संयम करते, तपश्चरण करते, आध्यात्मिक साहस बनाते तो हमारा बिगाड़ क्या था?

संयमधारण की प्रेरणा―शरीर का स्वभाव तो मिटने का ही है, बुरे परिणामों में रहे तो मिटेगा, भले परिणामों में रहें तो मिटेगा। बल्कि शरीर का मिट जाना तो लाभकारी चीज है। ऐसा मिटे यह शरीर कि फिर कभी शरीर न मिले यह अपने लाभ वाली बात है। यदि शरीर रहित अवस्था पानी है तो संयम धारण करें। भक्ति में कहा गया है कि संयम के बिना एक घड़ी भी न व्यतीत हो। एक असंयम के स्वभाव वाली प्रवृत्ति इस जीव को दुर्गति देने वाली होती है। जहाँ मन में भाव ही न आये कि मुझे कल्याण करना है। केवल पशु-पक्षियों की या मूढ़ों की, गँवारों की प्रवृत्ति की तरह अपनी प्रवृत्ति बनायी तो उसमें अच्छा फल न होगा। केवल खाने का ही संयम नहीं, वचनों का संयम हो, ब्रह्मचर्य का संयम हो, जैसी चाहे रागभरी मुद्रा देखने का परिहार हो, राग रागनियों के सुनने पर भी संयम हो, सात्विक रहन सहन हो, मन की भी उड़ानें खत्म कर दी जायें, यों पाँच इंद्रियाँ और छठा मन इनमें अपनी शक्ति माफिक संयम बनायें। असंयम में इस जीव को कुछ भी लाभ की बात नहीं है।

ज्ञानी वीर का संयम कवच―जैसे कोर्इ पुरुष युद्ध में, संकट में लोहे के कवच आदिक को अपने शरीर में सजाकर युद्ध में जाता है तो बाणों से नहीं भिदता, इसी तरह ब्रह्मरूप परिणाम से सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र के रत्नत्रय के दृढ़ कवच से जिसने अपने आपको सजाया है ऐसा संयमी पुरुष भी असंयम के बाणों से नहीं भिदता है अर्थात् अशांति उसमें नहीं आती है। जिसे शांति चाहिए ही वह अच्छा आचरण करे, ज्ञान बढ़ाये और संयम तपश्चरण व्रतरूप अपनी प्रवृत्ति रक्खें, यों कषायें दूर होंगी और अपना भला होगा।


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