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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1830

From जैनकोष



निर्दग्धं विषयारण्यं स्मरवैरी निपातित: ।

कषायतरवश्छिंनारागशत्रुर्नियंत्रित: ।। 1830 ।।

पूर्वकृत विषयकषायविजय का स्मरण―वह इंद्र विचार कर रहा है कि मैंने पूर्व भव में इंद्रिय के विषयों से परम उपेक्षा की थी, सप्त ज्ञान के बल से यह उपयोग बनाया था कि ये विषयों के उपभोग एक सरीखे बेकार की चीजें हैं, ये औपाधिक भाव हैं, मेरे स्वरूप नहीं हैं, इनसे मेरा कोई हित नहीं है, यों जानकर विषयों से उपेक्षा की थी, इस विषय वन को जला दिया था, कामरूपी शत्रु का नाश किया था । इन देवों का बैरी एक कामभाव भी है जिस कामवासना में आसक्त होकर मनुष्य अनेक उपद्रवों में पड़ जाता है, ऐसा यह कामभाव जो एक मनोज है उसका मैंने विनाश कर डाला था, सर्व परिग्रहों से मैंने मूर्छा परिणाम हटाया था, मैंने अपनी कषायों को मंद किया' था, दूसरे प्राणियों को सताने का मन में भाव न आया था, मैंने किसी की झूठ बात न बोली थी, किसी की निंदा न की थी, परवस्तुवों को अहितकर समझकर उनसे दूर रहा था, और भी वह इंद्र निरंतर विचार करता जा रहा है कि मैंने पूर्वभव में इस राग शत्रु पर आक्रमण किया था, इन समस्त बातों के कारण ही मुझे स्वर्ग प्राप्त हुआ है और यह सारा साम्राज्य प्राप्त हुआ है । इस जीव का मुख्य बैरी राग है । इस ही राग भाव के कारण यह जीव निरंतर दुःखी होता रहता है, फिर भी इसका इसे कुछ ख्याल नहीं होता । आप एक यह विचार कीजियेगा कि जितने भी क्लेश इस जीव को प्राप्त होते हैं वे रागभाव के कारण प्राप्त होते हैं । चाहे स्त्री पुत्रादिक का राग हो, चाहे मान प्रतिष्ठा का राग हो, सभी जगह दुःख इस रागभाव के कारण प्राप्त होता है । तो वह इंद्र विचार करता है कि इस रागभाव को भी मैंने पूर्वभव में ठुकराया था अर्थात् राग बैरी का विनाश किया था जिसके कारण मुझे आज यह स्वर्ग प्राप्त हुआ है और स्वर्ग का यह सब इतना बड़ा साम्राज्य प्राप्त हुआ है ।


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