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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1842-1843

From जैनकोष



क्वचिद्गीतै: क्वचिन्नृत्यै: क्वचिद्वाद्यै मनोरमै:।

क्वचिद्विलासिनीब्रातक्रीडाशृंगारदर्शनै:।।1842।।

दशांगभोगजै: सौख्यैर्लभ्यमाना: क्वचित् क्वचित्।

वसंति स्वर्गिण: स्वर्गे कल्पातीतवैभवे।।1843।।

देवों के महाभूतिसंपन्न सुखों का वर्णन―कहीं तो मन को लुभाने वाले गीत वादित्र नृत्यों के द्वारा वे सुख प्राप्त करते हुए स्वर्ग में रहते हैं, कभी विलासिनी देवांगनाओं के समूह से किए हुए क्रीड़ा शृंगार को देखने में समय व्यतीत करते हैं, कहीं 10 प्रकार के भोग से कल्पवृक्षों से उत्पन्न हुए सुखों सहित अद्भुत वैभव वाले होकर स्वर्गों में वे अपना समय व्यतीत करते हैं। जैसे यहाँ फाल्तू मोही अज्ञानी जीवों को जिन्हें सुख सुविधा बहुत मिली है वे अब क्या करें? लेटे-लेटे ही प्रभु का ध्यान करें, पर वे क्या करते हैं कि अब सिनेमा थियेटर आदि देखना है, अब क्लब गोष्ठियों में जाना है, अब संगीत सुनने जाना है, आदिक प्रवृत्तियां करते हैं, वे विश्राम से नहीं बैठ सकते हैं, ऐसे ही वे देव भी क्या करें बैठे-बैठे? कोई रोजगार भी नहीं करना है, कोई चीज की फिक्र नहीं है तो वे कभी गीतों से, कभी नृत्यों से, कभी वादियों से भी शृंगारों से नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करते हुए वे देव स्वर्गों में जहां पर अद्भुत वैभव है कुछ आयु पर्यंत बसा करते हैं। यह है ऊर्ध्वलोक की रचना की चर्चा। संस्थानविचय धर्मध्यानी सम्यग्दृष्टि पुरुष लोक के आकार का विचार कर रहा है। उस विचार में ऊर्ध्वलोक का यह चिंतन कर रहा है कि वहाँ ऐसे-ऐसे देव हैं, ऐसी उनकी स्थितियां हैं।

लोकवासी संसारी जीवों के आवासों का संक्षिप्त कथन―लोक के तीन विभाग हैं―अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक। अधोलोक में नारकियों का निवास है, मध्यलोक में पशु पक्षी आदि और मनुष्यों का निवास है, ऊर्ध्वलोक में देवों का निवास है। तीनों ही लोक में जो श्रेष्ठ मन वाले जीव हैं वे जीव ज्ञानबल से आत्मस्वरूप और परमात्मस्वरूप का निर्णय करके अपने आपमें प्रसन्न और तृप्त रहा करते हैं। नारकी जीव नाना कष्टों में रहकर भी एक सम्यग्ज्ञान के बल से अंतरंग में तृप्त रहा करते हैं। तो मध्यलोक में ये मनुष्य और मन वाले तिर्यंच ये भी अपने स्वरूप की सुध लेकर तृप्त रहा करते हैं और देवो में भी नाना प्रकार के वैषयिक सुख भोगते हुए भी दिव्य सुखों के आनंद में तृप्त नहीं रहा करते ज्ञानी देव, किंतु आत्मस्वरूप के अनुभव में ही तृप्त रहा करते हैं । यद्यपि देवों में संयम नहीं होता, फिर भी सम्यक्त्व की साधना उनके रहा करती है । ज्ञानी पुरुष को अपने आपके स्वरूप में एक विचार चलता है । इस ज्ञानी ने विश्व के समस्त: पदार्थो का निर्णय कर लिया है । प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र सत् है । कभी किसी निमित्त में आकर कोई पदार्थ कैसी ही अपनी हालत बदले, तिस पर भी प्रत्येक पदार्थ अपना वस्तुस्वरूप नहीं मेटता । प्रत्येक पदार्थ सत् है, और जो सत् है वह प्रति समय नवीन अवस्था रूप बनता है, पुरानी अवस्था को विलीन करता है और शाश्वत रहा करता है । यह पदार्थों की वस्तुगत बात है । मैं भी सत् हूँ, मैं भी हूं । यदि मैं न होऊँ तो बड़ा अच्छा था । फिर ये सुख दुःख मुझे कैसे होते । पर ऐसा तो नहीं है । मैं तो हूँ, जब मैं हूँ तो मेरी कुछ न कुछ हालत सदा चलती रहेगी । बिना अवस्था के कोई पदार्थ रह नहीं सकता । आज अवस्था देखकर ही यह निर्णय कर लो कि मैं आगे भी किसी अवस्था में रहूंगा । तब एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने आप पर है कि अपने को ऐसा न्याययुक्त रहना चाहिए अपनी' पदवी के अनुसार अपने कर्तव्य में निष्ठ रहना चाहिए कि हमारा भविष्य बिगड़े नहीं, इस भव का भविष्य भी न बिगड़े और इस भव को छोड़कर जो-जो आगे का परलोक होगा उसका भविष्य भी न बिगड़े ।

आत्महित के अर्थ कल्याणार्थियों का कर्तव्य और चिंतन―आत्महित के अर्थ श्रावकों को, गृहस्थों को एक संकल्पी हिंसा का त्याग बताया है । किसी भी जीव को अपना द्वेषी जानकर उसे द्वेषी मानकर उसका अकल्याण करने पर अर्थात् उसका विनाश करने पर उतारू न हूजिये, हाँ कोई विरोधी बनकर हमारे देश जाति आत्मा पर कुटुंब पर आक्रमण करता है तो उस आक्रमणकारी पर आक्रमण करके उसका पूरा मुकाबला करें । उसमें यदि घात हो जाय तो उसका नाम विरोधी हिंसा है । इस विरोधी हिंसा का त्यागी गृहस्थ नहीं होता । साधुजन तो शत्रु द्वारा आक्रमण किए जाने पर भी शत्रु के प्रति रंचमात्र भी द्वेष न रखेगा और न कोई प्रतिक्रमण करेगा । वह तो अपनी साधना पर उतरा हुआ है, वह अपने को विकल्पों में न डालना चाहेगा । वह साधु विरोधी हिंसा भी नहीं करता । गृहस्थ तो उद्यम आदिक में, खान पान आरंभ आदिक में भी जो हिंसा होती है उससे अलग नहीं रह सकता, हाँ संकल्पी हिंसा का अवश्य त्यागी है, ऐसा गृहस्थ भी और ऐसा वह देव भी अपने आपके विषय में ऐसा चिंतन रखता है कि मैं क्या हूं? एक सद्भूत वस्तु हूँ, स्वतंत्र हूँ, यह आत्मा किसी के कैद में नहीं आता, किसी की पकड़ में नहीं आता । लोग पकड़े, गिरफ्तार करें, कैद करें तो यह शरीर ही कैद में आया, लेकिन वहाँ भी आत्मा अपने आत्मस्वरूप का चिंतन करे तो वहाँ भी वह स्वतंत्र है । यह मैं आत्मा प्रतिसमय स्वतंत्र हूँ । कोई खोटा परिणाम करता हूँ तो वहाँ भी केवल मैं ही खोटा परिणाम करता हूँ, कहीं दूसरा मुझ में मिलकर मेरा खोटा परिणाम करता हो ऐसा नहीं है । जब कभी मैं शुभ परिणाम करता हूँ तो मैं ही अकेला शुभ परिणाम करता हूँ, कोई दूसरा मुझ में मिलकर मेरी शुभ परिणति को बनाता हो, ऐसा नहीं है । जब मैं शुभ अशुभ से हटकर केवल एक आत्मधर्म में स्थिर होऊँगा तो वहाँ भी केवल मैं ही स्थिर होऊंगा, दूसरा कोई जीव मेरे साथ मिलकर स्थिर हो जाय ऐसा नहीं होता । मैं प्रत्येक अवस्था में स्वतंत्र हूँ । जब भी दुःखी अथवा सुखी होता हूँ तो मैं अकेला ही होता हूँ । मैं अपना एक स्वभाव रखता हूँ । प्रत्येक पदार्थ अपना एक स्वरूप रखा करते हैं । चाहे वह पदार्थ बिगड़ जाय, और-और रूप बन जाय फिर भी स्वभाव उसका एक ही रहा करता है । जैसे पानी गर्म भी हो जाय गर्मी से अथवा अग्नि से, तिस पर भी उस जल का स्वभाव ठंढा है इसी प्रकार मैं भी अपना कोई स्वभाव रखता हूँ ।

मेरे शाश्वत स्वरूप की शाश्वतता―आज हम यद्यपि बहुत बिगड़ी हुई स्थिति में हैं । आत्मा का कार्य था केवल जाननहार रहना, मगर इसमें राग, स्नेह, द्वेष, मोह ये सारे विष भरे पड़े हुए हैं । इतनी बिगाड़ की स्थिति में है । मेरा कार्य था कि मैं एक सहज आत्मीय आनंद का ही अनुभव किया करता और अनेक दुःख अनेक चिंता अनेक कल्पनाओं का मैं शिकार बना हुआ हूँ । बहुत बिगड़ी हुई स्थिति में हूँ, फिर भी अपने अंतस्तत्व को निरखा जाय तो मैं एक शुद्ध ज्ञानानंदस्वभावी हू । जब तक अपने इस ज्ञानानंदस्वभाव की दृष्टि न जगेगी तब तक हमारी स्थिति सुधर नहीं सकती । तो मैं एक स्वभाव रखता हूँ जो स्वभाव मेरा सदा निश्चल है, कभी चलायमान नहीं होता । किसी भी वस्तु का स्वभाव चला जाय तो वस्तु की सत्ता ही समाप्त हो जायगी । कितना ही बिगाड़ हो जाय, कितना ही विरुद्ध परिणम जाय कोई भी पदार्थ, मगर स्वभाव स्वरूप मेरा वही रहता है जो मेरे सत्त्व के कारण मुझमें अनादि अनंत है । यह एक अपने आपको अपने सहज सिद्ध स्वभाव के देखने की बात चल रही है । इस जीव ने बहुत-बहुत विकल्प किये, बाह्यदृष्टि करके अनेक मौज माने, अनेक कष्ट माने लेकिन फल कुछ हाथ न आया । बाह्य पदार्थ विमुख हो गया, मैं अकेला ही रह गया और जो उस संयोग के समय में पापकार्य किया उन पापकार्यों की वासना लगार तो मेरे साथ बनी हुई है । वे परपदार्थ तो बिछुड़ गए जिनकी दृष्टि कर के मैंने पापकार्य किया था लेकिन वे पापकार्य साथ चल रहे हैं । चल रहे हैं ठीक है, तिस पर भी यह ध्यान दीजिये कि मैंने बाह्यपदार्थों का कुछ भी नहीं किया । वहाँ भी मैं केवल अपने भाव ही बनाता रहा । पाप किया, खोटे भाव किया । खोटे भावों के बजाय यदि मैं शुद्ध भाव कर लूँ तो खोटा भाव तो समाप्त हो जायगा, चिंता किस बात की? अगर कोई सोचे कि हम चिरकाल से पापी बने चले आ रहे हैं, खोटे भाव किए चले आ रहे हैं, मेरा क्या सुधार होगा? तो भाई खोटे भावों के समय में खोटे भाव थे परिणति ही तो है । यदि ज्ञान का अवलंबन किया जाय और परिणामो को शुद्ध बना लिया जाय तो वे सभी खोटे भाव समाप्त हो जायेंगे। परवाह, चिंता की क्या बात है? अपने स्वरूप की संभाल करने से सारी गल्तियां क्षंतव्य हो जाती हैं। स्वरूप को देखिये। मैंने गल्तियां बहुत की, इच्छायें बहुत बढ़ाया, स्वच्छदतायें बहुत की, शक्ति, बला, चला, कीर्ति आदि पाकर भी मैंने अनेक पातक कार्य किये, लेकिन मेरा आत्मा उन सर्व पापों से रहित है। मेरा स्वभाव एक ज्ञान और आनंदरूप ही है। जरा भीतर निरखकर देखिये क्या मिलता है खुद में? कोई रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है, एक जाननहार जो भीतर आत्मा है उस आत्मा के ढांचे को देखिये, उस आत्मा के स्वरूप को निरखिये क्या मिलेगा आत्मा में? एक ज्ञानप्रकाश, एक जाननभाव। तो केवल जाननभावरूप यह मैं आत्मा अपने आपके स्वरूप को संभालूं तो सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।

मोह की अपेक्षा ज्ञान की अधिक बलवत्ता―लोग कहते हैं कि मोह बड़ा बलवान है, सब जगह को वश कर डालता है, इस मोह से पिंड छुटाना कठिन है, पर भाई ! यदि मोह में बलवत्ता के ही गीत गाते रहोगे तो इस मोह से छुटकारा कैसे मिल सकेगा अपने को यदि कायर बना लिया तो यह मोह फिर छोड़ न सकेगा। लोग इस बात को तो भूल गये कि इस मोह से भी बड़ा बलवान ज्ञान है। मोह ने जिसके बंधन को अनादि काल में बना पाया है चिरकाल में बंध पाया है उस सारी बाँध को यह आत्मज्ञान क्षणभर में ध्वस्त कर देता है। तो मोह की जितनी कला है, मोह का जितना प्रताप है, जितना उसका कार्य है सबको ध्वस्त कर देने का, और उसे भी क्षणमात्र में नष्ट कर देने का फल ज्ञान में है। आत्मबल एक ज्ञानबल को ही कहते हैं। अपने को अजर अमर स्वरूप में निरखना और किसी भी परवस्तु को अपने उपयोग में न रखना यही तो एक आत्मबल है, उसकी प्रतीति तो की नहीं और मोह बलवान है यही गुण गाते रहे तो स्वयं हम कायर होकर मोह के दु:ख को मोह से ही मिटाने का उपाय जानकर मोह-मोह में ही फंसे रहेंगे।

भ्रम में तथ्य का अभाव―एक कथानक है कि एक कुम्हार का गधा गुम गया था, सो शाम को सूर्य छिपते समय वह पास के गांव में ही ढूंढ़ने के लिए गया हुआ था। वहाँ एक खेत में गेंहू कट रहे थे। सूर्यास्त हो गया तो मालिक ने गेंहू काटने वालों से कहा कि तुम लोग जल्दी-जल्दी काम निपटावो और चलो नहीं तो अंधेरी आ जायगी। हमें जितना डर अंधेरी से है उतना डर शेर से भी नहीं है। इस बात को एक पेड़ के नीचे बैठे हुए शेर ने सुन लिया । शेर सोचने लगा कि अभी तक तो मैं अपने को इस जंगल का राजा समझ रहा था, पर मुझसे भी अधिक बलवान कोई अंधेरी हुआ करती है। सो शेर कुछ डर सा रहा था। इतने में कुछ अँधेरा तो हो ही गया था। वह कुम्हार उस पेड़ के नीचे पहुंचा। पेड़ के नीचे बैठे शेर को उसने अपना गधा समझा और शेर ने समझा कि लो आ गयी वह अंधेरी। कुम्हार ने उसके कान पकड़े, भली बुरी दो चार बातें भी कहीं और अपने घर में लाकर गधों के बीच में बांध दिया। जब सवेरा हुआ तो शेर ने देखा कि यह क्या खेल, यह मैं कहां बंधा, मैं गधों के बीच में बंध हूं। उसने अपने स्वरूप को सम्हाला और बंधन तोड़कर भाग गया। यही हालत हम आपकी है, मोह ममता की विशेष चर्चायें करते हैं, विषयों के साधनों को चित्त में बड़ा महत्त्व देते हैं, जिनसे हमारे राग होता है उनका हम हृदय में बड़ा बड़प्पन मानते हैं। तो ये सब हमारी कायरता को बढ़ाने वाली बातें हैं, अर्थात् हम मोही बन-बनकर उनके ही आधीन रहा करते हैं। एक दृष्टि से निरखो―आत्महित की दृष्टि से तो अपने को जो इष्ट लगता है, जिसमें हमारा चित्त आदिक मोहित रहता है वह तो मेरे प्रति शत्रुता का ही काम करने वाला है। यदि मैं इनमें ही फंसा रहा, इनके ही राग में दबा रहा, अपने आपका विवेक खो दिया तो फिर जगत में कौनसा पदार्थ है कि जिसकी शरण गहे तो मुझे वास्तव में शांति प्राप्त हो? कुछ भी नहीं है। मैं अपने इस कामनारहित, विभावरहित केवल ज्ञानमात्रस्वरूप को निरखूं तो मुझे शांति होगी। ऐसा यह मैं केवल जाननदेखनहार एक आत्मा हूं। देखिये―ज्ञान आत्मा का गुण है, आत्मा में रहता है, आत्मा में अभेद है, आत्मा का स्वरूप है, किंतु मोही पुरुषों का ज्ञान अपने आधार की तो खबर नहीं रख रहा और बाहरी पदार्थों में ऐसा लंबा मोह करता जा रहा है कि मानो इसने अपनी आदि ही छोड़ दी है, असीम बाह्य पदार्थों में भटक रहा है। अरे उस भटकते हुए ज्ञान को अपने आपके निकट ले जायें तो केंद्रीय भूत में ज्ञान में वह बल बनेगा कि अभी तो हम पदार्थों को जानने के लिए तरसते हैं और ज्ञात नहीं हो पाते, पर उस ज्ञानबल से पदार्थों को जानने की इच्छा भी न रह सकेगी और सारा विश्व लोकालोक हमारे ज्ञान में झलका करेगा।

सहज आत्मस्वरूप के परिचय में आत्मा की सच्ची दया―भैया ! अपने आत्मा पर दया करना अर्थात् अपने आत्मा के नाते से अपने आपके हित का निर्णय करना। देखिये हम जो अटपट विश्वास बनाये हुए हैं वे सब विश्वास हमारे सत्यस्वरूप के दर्शन के बाधक हैं। मैं मनुष्य हूं, मैं अमुक बिरादरी का हूं, मैं अमुक पोजीशन का हूं, मैं अमुक परिवार वाला हूं, मैं इतने बच्चों वाला हूं, आदिक रूप से जो कुछ अपना विश्वास बना रखा है वह विश्वास हमें अपने में बसे हुए परमात्म परमार्थ स्वरूप को सिद्ध नहीं करने देता और फिर धर्म के बारे में भी जो हमने विश्वास बनाया है, मैं अमुक धर्म का हूं, अमुक मजहब का हूं, अमुक मेरे गुरु हैं, उनका यह उपदेश है, ऐसे इन विकल्पों के आश्रय से हम करना तो चाहते अपना कल्याण, पर उन विकल्पों की अटक भी हमें अपने में बसे हुए परमार्थस्वरूप का दर्शन नहीं करने देती। सर्व विकल्पों को छोड़कर एक बड़े विश्राम से अपने आपके स्वरूप के निकट में ठहर जायें तो अपने त्मा नहार वरूप काम करने वाल


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