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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 189

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सकलसमितिमूल: संयमोद्दामकांड:। प्रशमविपुलशाखो धर्मपुष्पावकीर्ण:।

अविकलफलबंधैर्बंधुरो भावनाभिर्जयति जितविपक्ष: संवरोद्दामवृक्ष:।।189।।

संवर महावृक्ष―यह संवररूपी महान वृक्ष कैसा है? उसका वर्णन इस छंद में कर रहे हैं, संवर का आख्यान, संवर की विशेषताओं का वर्णन एक वृक्षरूपी रूपक बना करके कर रहे हैं। जैसे वृक्ष होता है तो वृक्ष में अनेक तो जड़े हुआ करती हैं जिन जड़ों के आधार पर वृक्ष सधा रहता है एक बात। दूसरी बात वृक्ष में तना होता है, जहाँ तक शाखायें न फूटें वहाँ तक का जो मोटा भाग है ऐसा तना हुआ करता है। तीसरी बात वृक्ष में अनेक शाखायें हुआ करती हैं। चौथी बात वृक्षों में फूल हुआ करते हैं और 5 वीं बात वृक्षों में फल लगा करते हैं। ऐसी ही अन्य अनुपम संवर की 5 विशेषताओं को वृक्षों के रूप में बता रहे हैं। संवररूपी महावृक्ष की जड़े हैं समस्त समितियाँ। संवर कहते हैं कर्मों का न आना और अपने भावों का शुद्ध बनाना। इस संवररूपी वृक्ष की जड़ है समितियों का पालन। समस्त समितियाँ इन वृक्षों की मूल हैं। जैसे जड़ें बहुत होती हैं ऐसे ही इस संवरवृक्ष की जड़ ये 5 समितियाँ हैं और इस संवर वृक्ष में संयम का बहुत विशाल तना लगा हुआ है, जिस तने के ऊपर से विशुद्ध भावों की बड़ी-बड़ी शाखायें निकलती हैं और उन शाखाओं में फूल किसके हैं? धर्म के जैसे वृक्ष में फूल हुआ करते हैं। ऐसे ही संवर वृक्ष में धर्म के फूल हैं―क्षमा, मार्दव, आर्जव आदिक और इस संवरवृक्ष में फल क्या है? वे फल बहुत पुष्कल दृढ़ और शाश्वत आनंद के देने वाले हैं। यह संवरवृक्ष बारह भावनाओं से बंधुर है अथवा बारह भावनाओं के छोटे फलों से बढ़कर आनंद के महाफल को देने वाला है। यह संवरवृक्ष अपने विपक्ष को जीतने वाला है अर्थात् जहाँ संवर है वहाँ कर्मों का आना नहीं हो सकता।

जीव के साथ कर्मों का संबंध– सब कर्म जीव के साथ लदे हुए हैं, इसका परिणाम यह है कि जीव के साथ कर्म न लगे होते तो यह जीव नानारूपों में क्यों बनते? आत्मा का तो सबका स्वरूप एक प्रकार है लेकिन कोई आत्मा पशुपर्याय में है, कोई पक्षी पर्याय में, कोर्इ कीट में, कोई नरक में, कोर्इ मनुष्य में और इसमें भी भिन्न-भिन्न तरह की प्रकृतियाँ एक मनुष्य की प्रकृति दूसरे मनुष्य से नहीं मिलती। यद्यपि अरबों खरबों की संख्या में मनुष्य हैं लेकिन एक की प्रकृति दूसरे से नहीं मिलती। जैसे कि एक मनुष्य की वाणी दूसरे की वाणी से नहीं मिलती। आखिर जहाँ गला होता है वहीं सबका गला है, जहाँ जीभ, नाक है, वहीं सबके जीभ, नाक, दाँत आदि हैं और जिस तरह से बोलना होता है उस तरह से सब बोला करते हैं लेकिन एक की वाणी दूसरे से नहीं मिलती। जैसे कि अक्षर एक के दूसरे में नहीं मिलते। भला बताओ अक्षर वही 33 व्यंजन और उनमें 16 स्वर लगे हुए हैं; 14 स्वर होते हैं, दो तो अनुनासिक व विसर्ग होते हैं वे स्वर नहीं हैं किंतु स्वर के साथ लगा करते हैं तो इतने ही नियत अक्षर हैं और वे अरबों-खरबों मनुष्य उन्हीं अक्षरों को लिखे तो एक के अक्षरों से दूसरे के अक्षर नहीं मिलते हैं। तो ये जब ऊपरी बातें एक की दूसरे से नहीं मिलती तो अनेक विशेषताओं के कारणभूत ये कर्म भी किस एक के दूसरे से क्या मिलेंगे? प्रत्येक संसारी जीव के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म लगे हुए हैं।

कल्याण संवर और निर्जरा का प्रसाद―जो पुरुष कर्मों का क्षय करते हैं वे संसार से पार होकर मुक्त हो जाते हैं और जो कर्मों को बनाते रहते हैं, बढ़ाते रहते हैं वे इस संसारसागर में भ्रमण करते हैं। यह आत्मा अनादि काल से अपने स्वरूप को भूला चला आ रहा है, इसी कारण नाना प्रकार के कर्म इसके बंधते रहते हैं। लेकिन जब यह अपने स्वरूप का पहिचाननहारा बने और स्वरूप को जानकर इस ही निजतत्त्व में लीन हो तब फिर इसके कोई विपदा नहीं रहती। कर्मों का आना बंद हो जाता है और बंधे हुए कर्म भी झड़ जाया करते हैं और इस संवर और निर्जरा के प्रसाद से ये सर्व प्रकार से सर्वमलों से मुक्त हो जाते हैं। वह संवर भाव कैसे मिले? उसके लिए संक्षेप में इतना ही समझना कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र बनने पर यह संवर प्रकट हो जाता है। जहाँ इसकी पूर्णता हो जाती है, एकता हो जाती है वहाँ पूर्ण संवर प्रकट होता है।

सुधार के अवसर को न खोने का अनुरोध―विषयों से कषायों से हम आपकी विजय नहीं हो सकती, उसमें क्लेश ही क्लेश आयेंगे। इस कारण इन विषयों से कुछ विराम लें और अपने स्वरूप की खबर लें। इस रागद्वेष मोह से कषायों से भ्रमों से इस जीव का अकल्याण ही है। हम जब भी चेतें तभी भला है और यदि अभी नहीं चेतते हैं, जो अवसर मिला है सुधार का, इस अवसर का लाभ न उठा पाये तो आगे क्या आशा की जा सकती है। मान लो मरकर कीड़ा-मकौड़ा बन गए तो फिर क्या रहा इसका? यहाँ तो यह मनुष्य अपने वैभव पर नाज करता है। अपने यश पर, अपने परिजन समूह पर गर्व करता है और मरने के बाद कीड़ा-मकौड़ा बन गये, पेड़-पौधे हो गये, कहाँ गर्व रहेगा? ये समागम रमने के लिए नहीं हैं। बुद्धिमान् गृहस्थ तो इस समागम का भी उपयोग जैसे अपना मोक्षमार्ग चल सके, उसमें बाधा न आये उस प्रकार करता है, एक ही लक्ष्य हो जो प्रभु ने मार्ग अपनाया वही मुझे अपनाना है तब कल्याण है।

निर्जरा भावना


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