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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 191

From जैनकोष



सकामाकामभेदेन द्धिधा सा स्याच्छरीरिणाम्।

निर्जरा यमिनां पूर्वा ततोऽन्या सर्वदेहिनाम्।।191।।

निर्जरा के प्रकार―निर्जरा दो प्रकार की होती है―एक सकामनिर्जरा और अकामनिर्जरा। इनमें से सकामनिर्जरा तो मुनियों के होती है और अकामनिर्जरा समस्त जीव के होती है। सकामनिर्जरा के समय में जो कर्म झड़ा दिये जाते हैं अपने व्रत तपश्चरण के द्वारा आध्यात्मिक आचरण के बल से वह सकामनिर्जरा है और अपना समय पाकर जो कर्म झड़ते रहते हैं वह अकामनिर्जरा है। इसही का नाम उदय है। जो कर्म आये हैं बंधे हैं वे तो उदय में आ गए। भक्त कर्मों के उदय से न घबड़ाने के लिए यह चिंतन करता है कि जो कर्म बंधे हैं वे तो भुगतने ही पड़ते हैं, आये हैं कर्म और उनके उदय में मिली है विपदा तो घबड़ायें तो भी हम छूट नहीं सकते विपदा से और न घबड़ायें तो इस बाह्यपरिणतिरूप विपदा से छूट नहीं सकते। जैसा वर्तमान में उदय है वह मिल रहा है, लेकिन धैर्य यदि होगा तो वह विपदा कम हो जायेगी और आगे विपदा से छुटकारा हो जायेगा। धैर्य न होगा तो वह विपदा कई गुणित हो जायेगी और आगे भी ऐसी विपदायें आती रहें, इसका विनिश्चय हो जायेगा। तो हम विपदाओं से घबड़ायें नहीं।

विपदाओं की कल्पना और संहति―भैया ! विपदायें है ही क्या? कल्पनाओं से मान लिया। मान लो वैभव कम हो गया तो आत्मा पर क्या विपदा आयी? मान लो मरण हो गया, इस देह से छूटकर इस आत्मा को जाना पड़ा तो इस आत्मा पर क्या विपदा आयी? यदि यह आत्मा अपने स्वरूप का भान बनाये रहे, अपने ज्ञान में अपना यह ज्ञानानंदस्वरूप बना रहे तो इसको तो कहीं विपदा ही नहीं है। यहाँ न रहे दूसरी जगह चले गए, क्या हो गया इस पर कुछ विपदा नहीं विपदा तो कल्पनाएँ करती हैं और मोह से विपदा बना डालते हैं। सर्वसंकटों के मिटाने का यही मूल उपाय है कि हम अपना शुद्ध ज्ञान बनायें और अपने आत्मा के इस सहज सत्य स्वरूप रूप ही अपनी प्रतीति करते रहें। मैं सबसे निराला केवल ज्ञानस्वरूप हूँ, इस प्रकार अपने ज्ञानस्वरूप का अनुभव करें तो सर्वसंकट स्वयमेव समाप्त हो जायेंगे।


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