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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 197

From जैनकोष



ध्यानानलसमालोढमप्यनादि समुद्भवम्।

सद्य: प्रक्षीयते कर्म शुद्धयत्यड्.गी सुवर्णवत्।।197।।

कर्म का अनादिबंधन―इस जीव के साथ कोई चीज ऐसी अवश्य लगी हुई है जिसके निमित्त से जीव में ये असंख्यातों प्रकार की विभिन्न हालतें हो रही हैं। यदि जीव के साथ कोई दूसरी वस्तु न लगी होती तो जीव स्वयं अपने स्वरूप से असंख्यातों तरह का न बनता। कोई जीव पशु है, पक्षी है, मनुष्य है, कीट है, पतिंगा है और उनमें भी नाना तरह के कर्मफल हैं। मनुष्य भी कोई श्रीमंत है, कोई दरिद्र है, कोई विशेष ज्ञान वाला है, कोई कम ज्ञान वाला है आदिक जो नाना भाव हैं। ये भेद इस बात को सिद्ध करते हैं कि जीव के साथ कोई चीज ऐसी लगी हुई है जिसका निमित्त पाकर जीव का विकार चलता रहता है। इसका नाम है कर्म। जो चाहे नाम रख लीजिए। नाम से कुछ फर्क नहीं आता। चीज बताना है। तो जीव के साथ कर्म लगे हैं और यह कर्म कब से लगे हैं? इसकी कोई सीमा नहीं रख सकते। यदि कहेंगे कि अमुक दिन से जीव के साथ कर्म लगे हैं। तो उस दिन से पहिले क्या जीव के साथ कर्म न थे? अगर न थे तो इसका अर्थ यह है कि जीव पहिले कर्मरहित था, शुद्ध था, मुक्त था तो जो जीव पहिले शुद्ध था, फिर उसके साथ कर्म लगने का कारण क्या? इससे यह सिद्ध है कि जीव के साथ कर्म लगे हैं और वे अनादिकाल से लगे हैं। अनादिकाल से लगे हुए कर्मों के कारण जीव के साथ सुख दु:ख जन्म-मरण असंख्याते तरह की हालतें हो रही हैं।

वर्तमान परिस्थिति पर निर्णय―जीव की वर्तमान परिस्थिति है ऐसी कर्मकलीमस। अब यहाँ सोचो कि ऐसी परिस्थिति ही अपनी बनाये रहना है या कुछ परिवर्तन करना है। जीव के साथ कर्म लगे हैं और उनके उदय से सुख दु:ख चलते हैं, जन्म–मरण चलते हैं, ऐसी स्थिति क्या आपको प्रिय है? प्रिय नहीं है। कोई सुख भी हो जाय, इंद्रियज सुख के साधन भी जुड़ जायें तो भी चूँकि वह शाश्वत नहीं है, सदा नहीं रहता और पराधीन है तथा वह सुख भी जीवों के विरोधविकार को ही उत्पन्न करता रहता है। इस कारण वह भी हेय हैं तो कर्म सहित स्थिति पसंद न होना चाहिए। यह भीतर से इच्छा जगनी चाहिए कि मेरी कर्मरहित स्थिति बने। लेप न चाहिए, बोझ न चाहिए। मैं निर्भार केवल अपने स्वरूपमात्र रहूँ ऐसी इच्छा जगनी चाहिए। निर्भार केवल अपने स्वरूपमात्र जो रह रहे हैं उसका नाम है परमात्मा, मुक्त जीव, इनके कोई भार नहीं। यहाँ ममता लगी है, रागद्वेष चल रहे हैं। किसे अपना मान रखा? हैं सब भिन्न जीव, पर किसी को माना कि यह मेरा है और उसके अलावा औरों को माना कि ये गैर हैं, यह अज्ञान का अँधेरा है। जब देह तक भी अपना नहीं है तो किसी अन्य जीव को अपना कहना, अपना बनाने की कोशिश करना, ये सब अज्ञान की बातें हैं। इन कर्मों में लगे रहने से हम आपको लाभ की बात कुछ नहीं मिलती। बरबादी ही बरबादी है।

कर्मों के दूर करने का यत्न―इन कर्मों को दूर कैसे किया जाय? इसका क्या यत्न ठीक है, इस पर विचार करें तो मोटे रूप में यह बात निर्णय में मिलेगी कि ये कर्म कैसे लगे? जैसे लगे हों उससे उल्टा काम करने लगें कर्म टल जायेंगे। ये कर्म लगे हैं कषायें करने से। कषायें न करें, कर्म टल जायेंगे। ये कर्म लगे हैं मोह बसाने से, मोह न करें, कर्म टल जायेंगे। मोह और कषायें उत्पन्न न हों, इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सबका सही-सही ज्ञान करें और उसमें हम अपना जैसा स्वरूप पायें बस उसही स्वरूप में उपयोग लगायें, मग्न रहें। इस स्थिति का नाम है ध्यान। ध्यानरूपी अग्नि का स्पर्श हो जाय तो ये अनादिकाल के लगे हुए कर्म बहुत शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, जैसे कि पहाड़ बराबर ईंधन का ढेर भी रखा हो और उसमें अग्नि का स्पर्श करा दिया जाय तो बहुत ही शीघ्र इतने बड़े पहाड़ को भी यह अग्नि जला देगी।

वर्तमान में कर्मों का ढेर और उससे छुटकारा―इस जीव के साथ अनादि काल से परंपरया कर्म चले आ रहे हैं और आज इतने कर्म हम आपके साथ जुड़े हुए हैं। संभव है ये कर्म अनगिनतें भावों के लगे हुए हों। 48 मिनट में 66366 बार जन्म मरण हो सकता है जीव का। निगोद भव में जब यह जीव था तो इसका 48 मिनट 66366 बार जन्म मरण हुआ। तो एक दिन रात में ही लगा लो कितने बार जन्म हुआ। करीब बीस लाख बार हो जायेगा। कोर्इ निगोद जीव एक वर्ष भी रहा हो तो कितना लाख हो जायेगा, करीब तीस करोड़ बार जन्म हो जायेगा। और कर्म जो इसके बंधे हैं या निगोद होने से पहिले बंधे हैं वे कर्म अब तक हम आपके साथ संभव हो सकते हैं। तो अनगिनते जन्मों में बांधे हुए कर्म आज भी हम आपके साथ हैं। इतना तो यह ढेर है कर्मों का। किंतु आत्मा में ध्यानरूपी अग्नि का स्पर्श हो जाय तो इतना बड़ा ढेर भी शीघ्र नष्ट हो जाता है और फिर कर्मों के नष्ट होने पर यह जीव शुद्ध हो जाता है। जैसे स्वर्ण में अग्नि का स्पर्श होने पर स्वर्ण की किट्ट और कालिमा (कलंक) दूर हो जाती है इसी प्रकार अनादिकाल से चले आये हुए कर्मों से मलिन यह आत्मा यदि अपना ध्यान करे तो उस ध्यान के प्रसाद से अनादिसिंचित परंपरा से चले आये हुए कर्म शीघ्र खिर जायेंगे। और यह आत्मा अग्नितप्त स्वर्ण की तरह निर्दोष निर्लेप निरंजन निष्कलंक हो जायेगा। यह है स्थिति हम आपके आनंदमय होने की।

निर्मोहता से ही सफलता―भैया ! जीवन में यदि जैनधर्म का संयोग पाया, धार्मिक वातावरण पाया, शरीर भी निरोग पाया, आजीविका भी स्थिर पायी तो इसमें सफलता इस बात की है कि यह जीव बाहरी पदार्थों का मोह त्यागकर भले ही वे सब निकट लगे हुए हैं, पर रुचि न रखकर, रुचि रखे बिना आत्मस्वरूप की, ज्ञानस्वरूप की सहज चेतनारूपी जो अपना स्वरूप है उसकी प्रतीति रखा करे, इससे ये दुर्लभ पाये हुए समागम सफल हो जायेंगे। इसके विपरीत याने बाह्य पदार्थों की आदेयता का जरा विचार भी न करें।

धन प्रसंग से अलाभ―धन इकट्ठा करना है तो मान लो हो गया इकट्ठा, एक घर में बहुत सा जमा हो गया अब यह बतलाओ कि उस धन के जमा हो जाने से इसे सुख शांति क्या आयी, बल्कि विकल्प बढ़ेंगे। जितना धन जुड़ेगा, परिग्रह जुड़ेगा उतने ही विकल्प बढ़ेंगे। उसकी रक्षा करना, उसकी वृद्धि करना, अपने से और बड़ों को देखकर इच्छा ऐसी होना कि अभी मैं कुछ नहीं हूँ, मैं इनके बराबर हो जाऊँ, दसों प्रकार की आफतें विडंबनाएँ लग जायेंगी। तो धन इकट्ठा रखा जाने से लाभ क्या पा लिया जायेगा?

यशप्रसंग में अलाभ―लोगों की अंतर में भावना यह रहती है कि मेरा नाम, यश लोगों में बहुत-बहुत फैल जाय। मान लो फैल गया। यश के मायने क्या कि बहुत से लोग कभी-कभी इसका नाम ले लें, अमुक बड़ा अच्छा है, इतनी सी बात बने इसका ही तो नाम यश है। यश में और क्या रखा है? यश से कहीं पेट भी नहीं भरता, यश से कहीं शांति भी नहीं मिलती, यश कोई आनंद का साधक नहीं है। यश में दृष्टि फंसाने से जीव में मलिनता ही रहती है। तो क्या तत्त्व निकला यश से? जरा से यश के लिए जीवन भर संकल्प विकल्प किए जायें, दूसरों की पराधीनता सही जाय। उस यश से भी जीव को क्या सिद्धि हुई? कौन-कौन सी ऐसी बातें हैं जिनको आप चाहा करते हैं, उन सबके संबंध में खूब सोच लो।

राज्यप्रसंग से अलाभ―यह भी चाहते हैं लोग कि मैं कोई राज्य कर अधिकारी बन जाऊँ। मान लो बन गए अधिकारी, बन गए राजा तो राज्य के अधिकारी बनकर भी लाभ क्या पा लिया जायेगा? खूब सोच लो, बल्कि क्लेश ही होगा। किसी नगर का राजा गुजर गया तो मंत्रियों ने सोचकर कुछ ऐसी बात रखी―मान लो हाथी की सूँड में माला लटकी दी, यह हाथी चल फिर कर जिसके गले में माला डाल दे उसे राजा बना दें। सो उस हाथी ने एक लकड़हारे के गले में माला डाल दी। जो लकड़ी ढो-ढोकर खेद खिन्न रहा करता था। अब क्या था, वह लकड़हारा राजा बना दिया गया। अब 10-5 दिनों के बाद वह लकड़हारा राजा जब उठे तो मंत्रियों के कंधे पर हाथ धर कर उठे, तो मंत्रियों ने पूछा―महाराज आप तो लकड़ियाँ ढोते थे और अब 10-5 दिन में ही क्या हो गया कि आप खुद उठ भी नहीं सकते, मंत्रियों के कंधों का सहारा लेकर आप उठते हैं? तो वह राजा बोला―ऐ मंत्रियों ! पहिले तो मेरे ऊपर लकड़ियों का ही बोझ रहता था, लेकिन अब मेरे ऊपर सारे राज्य का बोझ है। हममें अब वह शक्ति नहीं रही कि अपने सहारे उठ सकें। सो राजपाट भी आ जाय पल्ले तो उससे जीव को सिद्धि क्या होगी?

आत्मधर्म में ही हित―एक अपने आत्मा के ज्ञान और धर्म के अतिरिक्त अन्य सब बातों में कल्पनाएँ करते जाइये, जो बात इष्ट हो, मान लो मिल गया वह सब, तो उससे भी इस जीव का क्या हित है? ये सब समागम प्यार करने योग्य नहीं हैं, इनसे अपेक्षा रखकर अपने आत्मा का जो स्वरूप है, जो प्रभु की तरह है उस स्वरूप का आदर करें, उस स्वरूप में मग्न होने का यत्न करें, यह तो भले उपाय की बात है। ऐसा न करके बाहरी पदार्थों में ही मन जुटाये रहते हैं तो वह कल्याण का उपाय नहीं है।


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