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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 20

From जैनकोष



अयं जागर्ति मोक्षाय वेत्ति विद्यां भ्रमं त्यजेत्।

आदत्ते समसाम्राज्यं स्वतत्त्वाभिमुखीकृत:।।20।।

न हि केनाप्युपायेन जन्मजातंकसंभवा।

विषयेषु महातृष्णा पश्य पुसां प्रशाम्यति।।21।।

तस्या: प्रशन्ये पूज्यै: प्रतीकार: प्रदर्शित:।

जगज्जंतूपकाराय तस्मिन्नस्यावधीरणा।।22।।

अनुद्विग्नैस्तथाप्यस्य स्वरूपं बंधमोक्षयो:।

कीर्त्यते येन निर्वेदपदवीमधिरोहति।।23।।

निरूप्य सच्च कोऽप्युच्चैरुपदेशोऽस्य दीयते।

येनादत्ते परां शुद्धि तथा त्यजित दुर्मतिम्।।24।।

स्वतत्त्व की अभिमुखता में जागरण― जब यह आत्मा स्वतत्त्व के अभिमुख होता है तब यह समता के साम्राज्य पर अधिकार पा लेता है और उस समय यह जीव मोक्ष के लिये जागृत होता है। जब तक मुक्त अवस्था में होने वाले आनंद का किसी भी अंश में अनुभव नहीं होता है, उसकी बानगी नहीं मालूम पड़ती तब तक उस मुक्ति के लिये कोई उद्यम कैसे कर सकता है? किसी व्यापारी को कोई सौदा खरीदना है तो उसकी बानगी देखकर यह निर्णय कर लेता है कि हाँ इस सौदे को ग्रहण करूँगा। इसी प्रकार मुक्त अवस्था में क्या आनंद होता है? उसका अनुभव उसकी जाति का पता पड़े तो मुक्ति पाने का कुछ उद्यम करे। भले ही मुक्ति में अनंत आनंद है, लेकिन उस जाति का आनंद सम्यग्दृष्टि को हो जाता है तो वह मुक्ति के लिये अपनी एक धुन बनाया करता है।

ज्ञानी के प्रभुता के निर्णय की अनुभूति― जैसे कोई गरीब आदमी किसी प्रसिद्ध मिठाई की दुकान से आधी छटांक ही मिठाई लेकर खाये और कोई धनी सेठ उसी मिठाई को उसी दुकान से आधा सेर लेकर खाये तो स्वाद तो यद्यपि दोनों को एकसा मिला, पर एक ने छककर खाया और एक छककर न खा सका। यहाँ हम आप जो सम्यग्दृष्टि जीव हैं वे मुक्त जीवों की तरह छककर आनंद नहीं पा सकते, कारण कि अभी रागद्वेष लगे हुए हैं, फिर भी मुक्त अवस्था में जिस जाति का आनंद होता है उस जाति के आनंद का अनुभव लिया जा सकता है। जो पुरुष इस सारभूत पदार्थ के अभिमुख होता है वह मोक्ष के लिये जागृत रहता है और वह उस आनंद को प्राप्त करता है, ज्ञानस्वरूप का अनुभव कर लेता है। सारे भ्रमों से मुक्ति हो जाती है और समतारूपी वैभव को प्राप्त कर लेता है।

स्वभाव और वर्तमान परिस्थिति― यह विचार कर रहा है वह सत्पुरुष कि आत्मस्वरूप तो आनंदघन है, किंतु हो क्या रहा है कि जन्म से उत्पन्न होने वाले आतंकों से यह जीव विषयों में महान तृष्णा को उत्पन्न कर लेता है। उस तृष्णा की शांति यह किसी भी उपाय से नहीं कर पा रहा है। यहाँ दो बातें मुकाबले की सामने आयी।ग्रंथ कर्ता के चित्त में यह बात आयी कि इस आत्मतत्त्व के अभिमुख हो तो सारा मार्ग स्पष्ट हो जाता है, मुक्ति की अभिलाषा जगती है, ज्ञानस्वरूप का अनुभव होता है, भ्रम का वहाँ नाम भी नहीं रहता है और समता के साम्राज्य को भी भोगने लगता है। बात तो सही होती है। करना तो जीवों को यह चाहिये किंतु बात और कुछ चल रही है, जन्मसंसरण से उत्पन्न यह तृष्णा होती है।

जीवों का विपरीत उद्यम―भैया ! जगत् के जीवों में और किस बात का संकट है सिवाय एक तृष्णा के? दूसरी कोई बात संकट की हो तो बतलावो। किसी के संकट की कहानी सुन लो, यही नजर आयेगा कि इसके तृष्णा उत्पन्न हुई है। धन की तृष्णा, ज्ञान की तृष्णा, इज्जत की तृष्णा। अनेक प्रकार की तृष्णायें हैं उनका ही एक मात्र दु:ख है। यह दु:ख जीवों का किसी उपाय से मिट नहीं पा रहा है। सभी जीव इस ही दु:ख से पीड़ित होकर उस दु:ख से बचने का यत्न कर रहे हैं, पर उसी में और भी विकट फँसते जाते हैं। जैसे मक्खी कफ पर बैठ जाय तो ज्यों-ज्यों वह हाथ पैर फटफटा कर उससे निकलने का यत्न करती है त्यों-त्यों वह और भी उसमें फँसती जाती है अथवा किसी कीचड़ वाली जगह में फँसा हुआ हाथी अथवा भैंसा ज्यों-ज्यों उससे निकलने का उद्यम करता है त्यों-त्यों वह उसमें विकट फँसता जाता है। इसी प्रकार ये संसार के प्राणी तृष्णा कर करके उसमे दु:खी होते जाते हैं और ज्यों-ज्यों उस दु:ख से छूटने का उद्यम करते हैं त्यों-त्यों उसमें और फँसते जाते हैं। दु:ख की वेदना और भी बढ़ती जाती है।

मोह का उत्तरोत्तर फँसाव― खुद पर बीती हुई बातों के लिये अधिक उपदेश की जरूरत नहीं रहती है ये सब बातें जानते हैं। सभी यह सोच सकेंगे कि अब से तो 20 वर्ष पहिले,25 वर्ष पहिले मेरी जो स्थिति थी वह अच्छी थी। । बुद्धि चलती थी, शरीर में बल था, धर्म में चित्त चलता था, विरक्ति भी थी। जितनी चिंताएँ अब सता रही हैं उतनी चिंताएँ तब न थी।हमारी तो पहिले की स्थिति अच्छी थी।तो बात क्या हुई? अरे ज्यों-ज्यों उस दु:ख को मेटने का उद्यम किया त्यों-त्यों और भी उस दु:ख में फँसते गये, दु:ख और भी बढ़ता गया। यह जीव किसी भी उपाय से इस तृष्णा के दु:ख को शमन नहीं कर पा रहा है। तब उस महातृष्णा की शांति के लिये, जगत के प्राणियों के उपकार के लिये विवेकी पुरुषों ने यह निर्णय किया है, सत्य बात का उपदेश दिया, चित्त में बात समाई और इससे जीवों को शांति भी मिली।

ज्ञानपद्धति का प्रभाव― जैसे लोग कहा करते हैं कि भैंस बड़ी की अक्ल, ऐसे ही समझ लो कि यह परिश्रम बड़ा कि ज्ञान। अपने दु:ख की शांति के लिये सांसारिक बल का प्रयोग करके हम आप बहुत बड़ी मेहनत किया करते हैं, पर उस मेहनत से शांति का कारण नहीं बन पाता और ज्ञान बना तो वह ज्ञान शांति का कारण बनता है। ज्ञानपद्धति का ही तो महत्त्व है, किसी प्रकार की वेदना हो, इष्ट का वियोग हो। अब जो गुजर गया वह तो गुजर गया। कितना ही उद्यम करें वह लौटकर नहीं आता, लेकिन उससे मोह अब भी ऐसा रख रहे हैं तभी तो वेदना उत्पन्न हो रही है। यह बात पूर्ण निर्णय से नहीं समा पाती कि जो गुजर गया वह लौटकर नहीं आता। जैसे खुली आँखों से ऐसा स्वप्न देखता है कि अमुक इस गली से रोज आया करता है। हमें ऐसा लगता है कि वह अब आने वाला है। चित्त में कैसी वासना बसी है कि इतनी सी मोटी बात का भी पूरा दृढ़ निर्णय नहीं है। यही तो एक अंधकार है।

मोह में भव की अनित्यता का अनिर्णय― ये मोही प्राणी जैसा दुनिया को मरते हुए देखते हैं वैसा अपने बारे में पूरी तरह से निर्णय नहीं कर पाते कि किसी दिन मुझे भी नियम से मर जानाहै। कह लिया मुँह से और अंदाज कर लिया, मगर जिसे अनुभव कहते हैं, ऐसा होना निश्चित् ही है― इतनी दृढ़तापूर्वक अपने मरण की बात यह जीव नहीं सोच पाता है। सोच ले तो उसकी चर्या में अंतर आ जायेगा। लेकिन अंतर नहीं आ रहा है। वही का वही मोह, वही सब राग बना है। यही इसका सबूत है कि हमें अपने बारे में, अपने मरने तक का भी दृढ़ निश्चय नहीं है, जैसे जब एकदम मरणहार होता है वहाँ यह विदित हो जाता है कि बस एक दो घंटे में ही खत्म होने वाले हैं उस समय जैसा इसका दिल बदल जाता है, भीतर की चर्यायें बदल जाती हैं ऐसी झनक होती नहीं इस जीव को।

वेदना में अंतर करने वाला ज्ञान― यहाँ कहा जा रहा है कि जितने दु:ख होते हैं उन दु:खों की शांति ज्ञान से होती है। जब इष्टवियोग का दु:ख हो, तब ज्ञान जगे, प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है, भिन्न है, जो-जो हैं वे अपने में अपना-अपना परिणमन करते हैं, उनका परिणमन उनमें है, उनका परिणमन उनसे बाहर किसी अन्य में नहीं है― ऐसा स्वतंत्रता का ज्ञान जगे तो इसकी उस वेदना में कमी हो जायेगी। कोई आफत आने लगी, धन लुट गया अथवा कोई नुकसान हो गया तो वह इस साधारण हानि में भी दु:खी होता है और जब इससे भी कई गुना जमीदारी का नुकसान हुआ, कानून बना और जमीदारी सबकी गयी, उस समय कोई दु:खी नहीं हुआ क्योंकि ज्ञान में यह था कि मेरा ही तो नहीं जा रहा है, यह तो सभी का जा रहा है। कुछ धैर्य था। तो अब उसका भी 10-20 गुना नष्ट हो रहा है फिर भी एक प्रकार का ऐसा ज्ञान बना है कि दु:खी नहीं होने देता, और यहाँथोड़ासा भी नष्ट हो जाता तो दु:खी होते हैं। तो मुख्य अंतर ज्ञान का ही रहा। उन वेदनाओं से छूटने का मुख्य उपाय ज्ञान है। इस जाति का ज्ञान बनायें कि यह दु:ख दूर हो, इस ओरअधिक यत्न करना चाहिये। परपदार्थों से संग्रह विग्रह करने की अपेक्षा इस ओर दृष्टि देनी चाहिये।

हितोद्यम― ये जगत प्राणी के इस तृष्णा की वेदना को किसी अन्य उपाय से शांत नहीं कर पाते हैं। इन वेदनाओं की शांति का उपाय केवल एक ज्ञान है। इसका उपयोग सही बातों में समा जाये तो सारे क्लेश दूर हो जायेंगे। ऐसे ग्रंथकर्ता अपने चित्त में विचार कर रहे हैं, देखिये यह भी एक धर्म ध्यान है, इसमें भी सोपकार साथ-साथ चल रहा है। इस रचयिता की भावना में इसका विरोध नहीं हे कि मैं अपना कुछ न करूँ। वह अपना कर रहा है, जगत के प्राणियों के हित की भावना करने में यह अपना भी काम कर रहा है। विषयकषायों के आक्रमण से बचा हुआ है और शुद्धतत्त्व की दृष्टि की पात्रता भी बन रही है। इन आचार्यों ने यही एक प्रतिकार समझा तो पूज्य पुरुष तो प्रतिकार करते हैं और ये मोही प्राणी उस प्रतिकार की भी अवज्ञा करते हैं।

ऋषि संतों का उपकार व हमारा प्रमाद― देखिये ग्रंथ में क्या-क्या रत्न भरे पड़े हैं। कोई एक मर्म विदित हो तो उसकी इतनी प्रसन्नता होती है कि मानों कुछ पा लिया। किसी भी तत्त्व के संबंध में गूढ़ मर्म की सही बात विदित होने की प्रसन्नता हुआ करती है और उसमें बहुत-बहुत विस्तृत मर्म विदित हुआ करता है। कितनी तपस्या के बाद, कितने अनुभव के बाद आचार्यदेव ने हम आप पर करुणा करके इस ग्रंथ की रचना की और हम आप ऐसे प्रमादी बने हैं कि ग्रंथ के मर्म को जानने के लिये इच्छा भी न करें, यत्न भी न करें। उस ज्ञान के लिये यत्न करना सो तो है अपने हित की बात और इस ओरदृष्टि न देकर बाहरी कार्यों में चित्त लगाना यह तो कोई विवेकपूर्ण बात नहीं है। अब आप अपना हिसाब लगा लें कि आप अपने तन, मन, धन, वचन सभी का उपयोग कितना तो अपने हित के लिये करते हैं और कितना खाने, पीने में यश लूटने और परिजनों के खुश रखने में लगाते हैं इसका आप खुद अंदाज कर लो। और ज्ञान की बात सीखें समझें। इसके लिये कितना व्यय करते हैं? आप खुद सोच लो। जबकि सभी का मुख्य काम यह है कि जो मोक्ष का मार्ग है, जो शांति के लिये काम देगा, इसकी ओरआपके तन, मन, वचन, धन का पूर्ण सदुपयोग होना चाहिये।

ऋषि संतों की हितैषिता― ध्यान तो दीजिये, ये जगत के प्राणी आचार्यदेव की इस कृपा का भी अनादर करते हैं। यह है जगत के जंतुवों की स्थिति। फिर भी उद्वेगरहित पूज्य पुरुषों ने इन प्राणियों के लिये मोक्ष के संबंध में उपदेश किया है। जैसे माँ रोगी बच्चे को दवा पिलाना चाहती है। वह बच्चा बार-बार हाथ से मुँह दबा लेता अथवा माँका हाथ पकड़कर ढकेलता अथवा उलट-पुलट कर पेट की जगह सिर कर लेता। अब वह माँ कैसे उसे दवा पिलाये, कभी-कभी वह माँ उसके दो चार हाथ भी मार देती है, लेकिन माँ फिर भी उस बच्चे को दवा पिलाती ही है। ऐसे ही ये आचार्यदेव माँ की तरह कितने कृपालु हैं? ये उपदेश देते हैं, लेकिन लोग इनका अनादर करते हैं और उनकी आस्था नहीं रखते हैं, फिर भी ये आचार्यजन अपने कर्तव्य से नहीं चूकते हैं और बराबर अपना कर्तव्य निभाये जाते हैं।

भूल से कुपथ पर दौड़― आचार्यदेव के इन सब श्रमों का प्रयोजन इतना ही है कि ये जगत के प्राणी विरक्ति और ज्ञान को बनावें। विरक्ति न बनाई रागी के रागी ही बने रहे तो उससे कुछ पूरा नहीं पड़ने का है। अपनी-अपनी बात विचारो। अच्छा करते जाइये खूब राग चित्त भर, अंत में राग के फल में आखिर मिलेगा क्या? शांति तो मिलती नहीं है। जिन पदार्थों का राग किया जा रहा है वे पदार्थ भी रहेंगे नहीं और सदा मेरे अनुकूल वे रहें, यह बात भी नहीं बन सकती। राग में किस ओरसे लाभ लूट लिया जाएगा। कुछ बात तो मालूम पड़े, या यों ही जिसको जैसा देखा वह उसी तरफ को दौड़ने लगा।

भूल की विह्वलता पर एक दृष्टांत― किसी बच्चे को एक आदमी ने कह दिया― आगे एक कौवा उड़ रहा था ऐसा उस बच्चे से कह दिया, देख तेरा कान कौवा ले गया, लो वह रोता है और उस कौवे के पीछे भागता है, दौड़ लगता है। भले आदमी कहते हैं अरे क्यों चिल्लाता है, क्यों भागा जा रहा है? अरे रे रे मत बोलो― मेरा कान कौवा ले गया। अरे कहाँ ले गया, लगे तो हैं कान। अरे मुझे तो ताऊ ने कहा था। अरे ठहर। अपने कान टटोलकर देख तो ले, न मिले अगर तेरे कान तो कहना। ज्यों ही रुककर उसने अपने कान टटोले तो कान कहीं गये ही न थे। उसे कान मिल गये तो निर्णय हो गया, ओह मेरे कान तो कौवा नहीं ले गया।

भूल की विह्वलता― ऐसे ही ये जगत के जीव, यह विषयलोलुपी पुरुषों का समूह अज्ञानी पुरुषों द्वारा बहका दिया गया है, अरे तेरा सुख अमुक परपदार्थ से है। चेतन परिग्रहों में अथवा अचेतन परिग्रहों में तेरा सुख है, तो इन जीवों ने सुख की आशा से आरंभ परिग्रह की ओर दौड़ लगाना शुरू कर दिया है।दौड़ लगा रहे हैं। ज्ञानी संत समझाते हैं, अरे तुम कहाँदौड़ रहे हो? अरे मत बोलो, हमारा सुख घर में है, धन वैभव में है, मैं अपना सुख प्राप्त करने जा रहा हूँ। आचार्य समझाते हैं अरे नहीं है वहाँसुख। कैसे नहीं है सुख? देखो हमारे फलाने रिश्तेदारों ने और लोगों ने इन पड़ौसियों ने प्रेक्टिकल कर करके समझाया है कि सुख इनमें है। अरे ठहर भाई, क्षणिक विश्राम तो कर, अपने आपकी ओर दृष्टि तो दे। पहिले अपने आपको टटोल तो सही सुख स्वरूप क्या है?तू क्या है? तू कितना है? कितना आया था, कितना जायेगा? उस निज सुख स्वरूप को तो देखो। तेरा स्वरूप किन चीजों से बना हुआ है, तेरा लक्षण क्या है? कुछ इस ओर दृष्टि तो दे, कुछ तेरा झुकाव अपने शांतस्वरूप की ओरहो तो तुझे अपने इस शांतस्वरूप का पता पड़ेगा― ओह !मैं सारे जगत से न्यारा केवल निजस्वरूप मात्र हूँ, मैं एक चैतन्यस्वरूप हूँ, मैं आनंद और ज्ञान से भरपूर हूँ। ध्यान में आया अब। व्यर्थ ही जगत के प्राणी आचार्यों की वाणी में अवहेलना करते हैं। यदि वे श्रद्धा करेंगे और यथाशक्ति गुणों अमल करेंगे तो उन्हें संतोष और शांति मिलेगी।

भूल की वेदना की दयनीयता― यह विचार गंथरचयिता के चित्त में उठा था और इसी कारण अंत में कुछ सुगम उपदेश विचार कर हमें इन जगत के प्राणियों को देना चाहिये, ऐसा भाव किया। कोई अपनी ही भूल से दु:खी हो रहा हो तो उसके प्रति कितनी दया लोगों को आती है? कुछ लगाना नहीं, कुछ पराधीनता नहीं। केवल एक दृष्टि विचार बनाने भर की जरूरत है कि सारे दु:ख दूर हो जायेंगे। तो ये जगत के सब प्राणी भी भूल से दु:खी हो रहे हैं। जैसे बंदर किसी घड़े में रखे हुए लड्डू उठाने के लिये दोनों हाथ घड़े में डाल देता है। तृष्णावश दोनों मुठियों में लड्डू भर लेता है तो अब दोनों हाथ तो निकलते नहीं, वह समझता है कि मेरे दोनों हाथों को घड़े ने पकड़ लिया है सो वह उस घड़े को लिये हुए इधर उधर लुढ़काता रहता है। यों ही ये जगत के प्राणी इस दु:ख से निकलना चाहते हैं पर तृष्णा साथ लगी है सो इस ओरख्याल नहीं जाता कि इस दु:ख से छूटने का ढंग यह है और हमें ऐसा-ऐसा करना चाहिये।

संतों के उपदेश का लाभ उठाने का अनुरोध― अहो ! तृष्णा के कारण मोही प्राणी दु:ख भी बहुत-बहुत भोग रहे हैं पर यह ख्याल नहीं जाता कि अपने आप ही अपने विचार परविषयक बनाकर, परोपयोगी बनाकर अपने आपको दु:खी कर रहा हूँ, संत पुरुष ऐसे भूले भटके हुए प्राणियों को केवल एक सच्चा ज्ञान दिखाने के लिये उपदेश का उद्यम करते हैं। सत्पुरुष इस प्रकार विचारकर जीवों के संसार संबंधी दु:ख को दूर करने के लिये ऐसा उपदेश देते हैं अर्थात् शास्त्रों की रचना करते हैं। हमारा कर्तव्य है कि जो निधि बड़ी तपस्या के बाद, बड़े अनुभव के बाद आचार्यों ने ग्रंथों में दिया है, उसकी अधिक से अधिक जानकारी करें और उस उपाय से हम अपने को संसार संकटों से सदा छूटाने के लिये पुरुषार्थ कर लें।


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