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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2013

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सप्तधातुविनिर्मुक्तं मोक्षलक्ष्मीकटाक्षितम् ।

अनंतमहिमाधारं सयोगिपरमेश्वरम् ।।2013।।

दिव्यदेहस्थ परमात्मा―कोई ऋषि अपने आपके अंतस्तत्व की उपासना के बल से, उस निर्विकल्प निस्तरंग ज्ञानस्वभाव के अभेद उपासना के बल से जब वीतराग हो जाता है, उसके घातिया कर्मो का क्षय हो जाता है तब यद्यपि शरीर अभी है लेकिन उस परमात्मदशा में यह शरीर सप्तधातुवों से रहित हो जाता है । हड्डी, मांस, मज्जा, खून आदिक अपवित्र सभी चीजें बदलकर परमपवित्र शरीर बन जाता है । आत्मा के निर्मल होने पर निर्दोष आत्मा कैसे शरीर में विराजमान रहे, उनका वह शरीर किस प्रकार परिवर्तित हो जाता है? ऐसी ही आशा रखी जा सकती है कि वह परमपवित्र परमौदारिक शरीर बन जाता है, उसमें सकलपरमात्मा अभी विराजमान रहता है । तीर्थंकरदेव अनेक अतिशयकर संपन्न हैं । उन अतिशयों में एक अतिशय यह भी बताया गया है कि उनका रुधिर दुग्ध के समान श्वेत होता है । हम आप लोगों के भी खून मात्र लाल नहीं होता है । लाल और श्वेत दोनों प्रकार का होता है । लाल खून का काम कोई कीटाणु उत्पन्न करने का है और श्वेत खून का काम उन कीटाणुवों से रक्षा करने का है अर्थात् अलग करने का है, जैसा कि कुछ डाक्टर लोग भी कहते हैं । जब सफेद खून की कमी हो जाती है तब इसके रक्त में विकार होता है । श्वेत खून होना शरीर की वृद्धि में सहायक है । और फिर एक और कल्पना करिये जैसी कि कवि की कल्पना है । एक माँ अपने बच्चे पर ऐसा निष्कपट प्यार करती है कि उस बच्चे पर स्नेह भाव के कारण उसके शरीर में दुग्ध झरने लगता है, तो जो महापुरुष तीर्थंकर समस्त जीवों पर इस प्रकार बच्चे की भाँति एक अनोखा प्यार रखते हैं, सबके कल्याण की भावना रखते हैं ऐसे विशुद्ध पुरुष का खून श्वेत हो जाय तो इसमें क्या आश्चर्य है? यों अनेक अतिशय उन तीर्थंकर देव के होते हैं ।

परमात्मा की परमेश्वरता―जिनका मुक्ति स्वयं वरण करना चाहती है अर्थात् संसार से छूटकर अब मुक्ति पधारने वाले हैं ऐसे सकलपरमात्मा को एक रूपस्थध्यानस्थ यह सम्यग्दृष्टि ज्ञानीपुरुष अपने ध्यान में ले रहा है । वे प्रभु अनंत महिमा के आधार हैं, परम ईश्वर हैं । ईश्वर उसे कहते हैं जो अपने आपके स्वाधीन ऐश्वर्य का अधिपतित्व रखता है । ऐश्वर्य नाम उसका है जहाँ अपना काम करने के लिए पराधीनता न भोगनी पड़े, सभी काम स्वाधीन हों । ऐसे वैभव को कहते हैं ऐश्वर्य । जैसे एक भूमिपति अपनी भूमि से सब कुछ अपने लिए उपयोग में आने वाली चीजों को निकाल सकता है, उसे भी ग्रामपति या ग्रामेश्वर कहो । नमक चाहिए तो वह भी अपने खेत से निकाल सकता है, कपड़ा, अन्न आदि चाहिए तो वह भी निकाल सकता है । उसको बड़ी स्वाधीनता है । यह एक दृष्टांत में बताया है । तो प्रभु के ऐश्वर्य में स्वाधीनता है । उनका ऐश्वर्य है उत्कृष्ट ज्ञान और आनंद का अनुभव करना । क्या वे प्रभु किसी की अपेक्षा किया करते हैं? स्वयं-स्वयं से स्वयं के लिए स्वयं में स्वयं के प्रदेशों में वे उत्कष्ट ज्ञान और आनंद का अनुभवन करते हैं । ऐसे परमेश्वर सकलपरमात्मा का ध्यान करें उसे रूपस्थध्यान कहते हैं । रूप का अर्थ है परमात्मा का स्वरूप । परमात्मा के स्वरूप में जो अपना उपयोग लगाता है ऐसे ज्ञानी को रूपस्थ ध्यानी बताया है ।


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