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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2016

From जैनकोष



दित्यरूपधरं धीरं विशुद्धज्ञानलोचनम् ।

अपि त्रिदशयोगींद्रै: कल्पनातीतवैभवम् ।।2016।।

प्रभु की दिव्यरूपधरता व धीरता―आत्महित का अभिलाषी पुरुष जिन्हें परमहित प्राप्त हो गया है ऐसे प्रभु का ध्यान कर रहा है । परमात्मा दिव्यरूप का धारण करने वाला है । जिस देह में स्थित वीतराग सर्वज्ञ प्रभु हुए, जिनके क्षुधा, तृषा, जन्म, मरण, अरति, खेद, रोग, शोक, डर, निंदा, क्षोभ आदिक कोई दोष नहीं रहे, ऐसे प्रभु जिस देह में विराजमान हुए वह देह भी साधारण नहीं रहता, दिव्य हो जाता है, तो प्रभु दिव्यरूप के धारण करने वाले हैं । कोई साधु वृद्ध हो और हड्डियां निकल आयी हों, अत्यंत दुर्बल हो गया हो वह भी जब आत्मा का विशुद्ध ध्यान रखता है और शुक्लध्यान उत्पन्न होता है तो वह भी परमात्मस्वरूप बन जाता है और परमात्मस्वरूप बनते ही उसका वह शरीर जो वृद्ध था, हड्डियां निकली थीं वह शरीर दिव्यरूप वाला हो जाता है स्वयं ही? यह उनका एक अतिशय है । साधुजन तो कैसे ही शरीर वाले होते हैं, किसी के खाज हो, फोड़ा फुंसी हो और-और भी अनेक प्रकार के चर्मरोग हों, पर वे प्रभु उत्कृष्ट ध्यान के प्रताप से उन रोगों को नष्ट कर देते हैं, वीतराग पद को प्राप्त करते हैं और सर्वज्ञ होते हैं, परमात्मा बनते हैं तो उनका शरीर अब उस प्रकार का नहीं रहता, दिव्य हो जाता है, एक रूप हो जाता है । ऐसे दिव्यरूप के धारण करने वाले परमात्मा का ध्यान करना चाहिए । वे प्रभु धीर हैं―धीम् बुद्धिम् राति ददाति इति धीर:, जो बुद्धि को दे अर्थात् बुद्धि ठिकाने करे उसे धीर कहते हैं । तो धीर शब्द का अर्थ अथवा धैर्य का अर्थ क्या है? आशय में रागद्वेषरहित होकर अथवा पक्ष में न पड़कर निष्पक्ष हृदय की वृत्ति रखने को धैर्य कहते हैं । वे प्रभु जो चारघातिया कर्मों से रहित हो गए हैं सो वे परमधीर हैं ।

प्रभु की विशुद्धज्ञाननेत्रता―परमात्मा के विशुद्ध ज्ञानरूपी नेत्र हैं । कुछ पहिले समय में अलंकारों के रूप में बात चलती थी और लोग समझते थे कि इस अलंकार का यह भाव है । पश्चात् लोग अलंकार के भाव को तो छोड़ने लगे और अलंकार को ही सीधा यथार्थरूप मानने लगे । हाँ तो पहिले एक अलंकार में उस प्रभु को त्रिनेत्र कहा जाता था, महादेव कहा जाता था । महादेव त्रिलोकी हैं, तीन नेत्र वाले हैं, और तीन नेत्र वाले भी नहीं, एक नेत्र वाले हैं । दो नेत्र वाले हैं इस वर्णन में कुछ अतिशय नहीं है । या तो एक नेत्र वाला कहो या तीन नेत्र वाला कहो । प्रभु के दिव्य देह में दो नेत्र तो अब भी लगे हुए हैं । यद्यपि उन नेत्रों से वे ज्ञान नहीं करते, उनके क्षायिक ज्ञान है, पर शरीर है ना साथ तो शरीर के सब अंग भी लगे हैं, पर प्रभु के तीसरा नेत्र प्रकट हुआ है, महादेव के अर्थात् अरहंत परमात्मा के तीसरा नेत्र प्रकट हुआ है, वह तीसरा नेत्र है केवलज्ञान अर्थात् विशुद्ध ज्ञान । इन चर्मचक्षुवों से तो सामने की चीज होगी वह जान जायेंगे और वह भी पूरे रूप से नहीं जानेंगे । जो भाग दिख रहा है वही तो ज्ञात है, भीतर क्या है, पीछे क्या है, इसको ये आँखें क्या जानें? और जो सामने यश दिख रहा है वह भी कल्पना में जितना आ पाता है, जितना यह समझ में ला पाता है उतना ही दिखता है, किंतु केवलज्ञान में कोई प्रतिबंध नहीं है । वह तो समंतात् सर्व को जानता है । जो आत्मा निरावरण हो गया है उसके लिए तो सब समान है । अभिमुखता के कारण यह केवल ज्ञान नहीं जानता किंतु कुछ भी सत् हो पदार्थ तो उसे जानता है । तो केवलज्ञान इतना विशाल ज्ञान है कि सत् था पर्यायरूप में, सत् है, सत् होगा उस सबको जानता है, ऐसा विज्ञान, ज्ञान लोचन जिनसे प्रकट हुआ है ऐसे प्रभु का ध्यान रूपस्थध्यानी ज्ञानी पुरुष कर रहा है ।

प्रभु की कल्पनातीतवैभवता―वे ध्येय प्रभु कैसे हैं कि देवेंद्रों के द्वारा, योगींद्रों के भी द्वारा इनका वैभव कल्पना में भी नहीं आता । अहो ! कितना अनुपम वैभव है प्रभु का । जो वैभव कभी विघट नहीं सकता, ज्ञान और आनंद का वैभव । बाहरी वैभव को लोग अपने आनंद के लिए जोड़ते हैं, पर वहाँ एक निकृष्ट कल्पित मौज भी होता है, कल्पना का आश्रय कर के । केवल हुए जो महापुराण पुरुष हैं, अरहंत देव हैं उनके उस ज्ञान और आनंद के वैभव को कौन कल्पना में ला सकता है? यदि कल्पना में लाये तो इसका अर्थ है कि उस ज्ञान और आनंद की बात हममें भी आ गई । आप किस चीज की कल्पना करते हैं? जो बात आप में समाई हुई हो वही कल्पना में आ सकती है । तो त्रिदशेंद्र और योगीश्वरों के द्वारा भगवान का वैभव कल्पना में नहीं आता, लेकिन यह भी नहीं है कि उनके ज्ञानानंद वैभव का हम कुछ भी ज्ञान न कर सकें । यदि हम कुछ किसी भी अंश में उनके ज्ञानानंद वैभव का ज्ञान नहीं कर सकते तो भक्ति नहीं उमड़ सकती हे । प्रभु में भक्ति उमड़ने का कारण यह है कि प्रभु का जो ज्ञानानंद वैभव है उसका हम आपको किसी न किसी अंश में ज्ञान हो रहा है, अनुभव हो रहा है तभी तो यह गद्गद् होकर उनके गुणों का अनुरागी होकर अपनी बाहरी सुध को भी भूल जाता है और प्रभु के गुणों में अनुरक्त होता है । केवल ऊपरी बात हो भक्ति की तो उससे प्रभुभक्ति की लीनता नहीं बन सकती है । जिस अनंत ज्ञान और अनंत आनंद को वे भोग रहे हैं, उस ज्ञान और आनंद को लक्ष्य में लिये बिना उस ज्ञानानंद की जाति का परिचय हुए बिना महत्ता कौन जानेगा, और प्रभु के उस वैभव का महत्व जाने बिना प्रभु में भक्ति उत्कृष्ट हम क्या कर सकेंगे? ज्ञानी पुरुषों को उनके ज्ञानानंद के परम वैभव की जाति का बोध रहता है । वह समस्त कितना वैभव है, यह योगीश्वरों के भी और देवेंद्रों की भी कल्पना में नहीं आ सकता । ऐसे कल्पनातीत वैभव वाले प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।


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