• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2022

From जैनकोष



अत: सम्यक्स विज्ञेय: परित्यज्यान्यशासनम ।

युक्त्यागमविभागेन ध्यातुकामैर्मनीषिभ: ।।2022।।

विशुद्धध्यानार्थी की देव, शास्त्र, गुरु व तत्त्व के निर्णय की प्रथम आवश्यकता―जो मुक्ति की अभिलाषा रखता है, जो परमध्यान की कामना रखता है, जो उत्कृष्ट तत्व है, शरणभूत है उसकी उपासना की इच्छा रखता है उस पुरुष को तो मोहियों के शासन को छोड़कर, मोहियों की उस रागवर्द्धक प्रणाली को तजकर वीतराग मार्ग अंगीकार करके शुद्ध बनना चाहिए । वे वीतराग सर्वज्ञ प्रभु ही हम आपके आदर्श हैं । देव, शास्त्र, गुरु―इन तीनों का आलंबन लिए बिना हमारी प्रगति नहीं हो सकती । हम अपना देव किसे माने, यह तो निर्णय करें? जो रागद्वेष जन्म मरण आदिक विडंबनाओं से मुक्त हुए हैं वे हमारे देव हैं, स्वयं ज्ञानानंद हो, केवल रह जाय तो बस जो केवल हो, जो निरंतर ज्ञानानंद में लीन हो वह हमारा आदर्श है । वहीं दृष्टि दे कि मुझे यह बनना है, वह तो है देव, और ऐसा बनने की जो प्रेरणा देते हैं ऐसे सद्वचन, वे हैं शास्त्र । इस प्रकार बनने में जो लग रहे हैं वीतराग होने की जो अपनी साधना बना रहे हैं ऐसे निर्ग्रंथ तपस्वी ज्ञानध्यानरत महापुरुष वे हमारे गुरु हैं । तो सच्चे देव, शास्त्र, गुरू का निर्णय करिये आत्मा के नाते । अपने आपको किसी मजहब वाला मत मानो । आत्महित के नाते ही सारा निर्णय किया जाय तो उस पथ का हमें दर्शन होगा और हम वहाँ अपना निभाव कर सकेंगे । इस आत्महित की इच्छा रखने वाले भव्य जन अपने आदर्श का सही निर्णय करें कि हमें क्या बनना है? वीतराग सर्वज्ञ सकलपरमात्मा जैसे हुए हैं उस मार्ग से चले । उस ज्ञानानंदस्वरूप का ध्यान करें तो हम में भी शुद्धि होगी, और यह शुद्धि बढ़-बढकर उतनी ही वीतराग अवस्था बन सकेगी जो वीतराग सिद्ध प्रभु की है । जैसे सर्व संकटो से छुटकारा सिद्ध प्रभु का है वैसे ही सर्व संकटों से छूटकारा हम आप भी प्राप्त कर सकेंगे ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_2022&oldid=83801"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki