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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2047

From जैनकोष



तदालंब्य परं ज्योतिस्तद्गुणग्रामरंजित: ।

अविाक्षिप्तमना योगी तत्स्वरूपमुपाश्नुते । ।2047।।

अविशेष परं ज्योति के आलंबन से परमात्व की उपलब्धि―ध्यानी पुरुष सर्वज्ञ की उस परमज्योति का आलंबन कर के उनके गुणस्वरूप में रंजायमान होकर, अपने आप में विशेषतावों को छोड़कर प्रभु स्वरूप को प्राप्त करते हैं । जो अपने आप में विशेषतायें लगा रखी हैं―मैं अमुक हूँ, ऐसी पोजीशन का हूँ, अमुक नाम का हूँ आदिक ये सब विशेषतायें प्रभु दर्शन में बाधक हैं, और जब अपने को एक ज्ञानमात्र मानकर प्रभु के ज्ञानस्वरूप का निर्णय कर के इस उपयोग को विस्तृत करते हैं, सर्व जीव एक ज्ञानस्वरूपमात्र हैं और वही परमार्थ है, वास्तविक स्वरूप है, उस वास्तविक स्वरूप की ओर से मुझ में और समस्त जीवों में प्रभु में कहीं कुछ भेद नजर नहीं आता । सर्व ज्ञानस्वरूप हैं, यों निहारकर अपनी विशेषताओं को छोड़कर एक साधारणरूप में जब एक ज्ञानज्योति में हम आते हैं तब हम अविशेष बनते हैं और उस समय स्थिरचित्त होकर हम उस स्वरूप में लीन होते हैं और उस ही को प्राप्त कर लेते हैं । हमारा कर्तव्य है कि उन सब सांसारिक समागमों में ये मायारूप हैं, भिन्न हैं, इनसे मुझ में कुछ भी नहीं आती, ऐसा निर्णय बनाकर अपने आपको दयारूप यत्न करें, हमारी दया है प्रभुस्वरूप का भजन व आत्मस्वरूप का स्मरण । दो ही तो काम करना है―एक तो प्रभुभजन और दूसरा अपने आत्मस्वरूप का चिंतन । इन्हीं दो कार्यों को करके हम सदा के लिए संसार के संकटो से बचने का अपना उपाय बना ले । अपना एक यही निर्णय बनायें और निश्चय रखें कि हमारे लिए शरण एक तो है प्रभुभजन और एक है आत्मस्वरूप का स्मरण । चाहे करना कुछ पड़ रहा हो, मगर श्रद्धा तो इसी भांति होनी चाहिए ।


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