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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2050

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साक्षान्निर्विषयं कृत्वा साक्षं चेत: सुसंयमी ।

नियोजयत्यविश्रांतं तस्मिन्नेव जगद्गुरौ ।।2050।।

मन को निर्विषय करके प्रभु में मन को नियोजित करने का अनुरोध―यद्यपि अल्पज्ञान के धारी पुरुष सर्वज्ञदेव का स्वरूप यथार्थ नहीं उपयोग में ले सकते हैं अर्थात् उनकी जो अनंत महिमा है उस अनंत महिमारूप उनका स्वरूप ऐसे छद्मस्थ ज्ञानों के अगोचर है । तो भी इंद्रिय और मन को विषयों से हटाकर संयमी मुनि साक्षात् उसी भगवान के स्वरूप में अपने मन को लगाते हैं । क्या करें सो बतावो । कहां रहे, कहा जायें, कितना समागम जोड़ें, कितनों का स्नेह बनायें, ममता करें कि यह ठीक गुजारा हो जाय, शांत जीवन बन जाय? कुछ उपाय तो बतावो । सिवाय प्रभुनाम स्मरण और आत्मस्वरूप मनन के और क्या किया जाय? कोई पुरुष वास्तविक धोखे से रहित अपनी साधना को बना ले तो यह योगी यद्यपि प्रभुस्वरूप के उस अनंत विकास को अपने ज्ञान में नहीं ले सकते, फिर भी कुछ निर्णय तो किया ही है । सो प्रभु में वे अपना चित्त बसाया करते हैं । मेरा शरण बाहर में यथार्थ कौन है? तो अंगुली उठायें प्रभु की ओर, और परमार्थ से अपना आत्मस्वरूप ही शरण है । जब हम प्रभु की उपासना कर रहे हैं उस समय भी प्रभु की उपासनारूप जो हमारा गुणस्मरण है वही हमारा शरण बन रहा है । वास्तव में खुद ही खुद के जिम्मेदार हैं । अपनी जिम्मेदारी न समझें तो संसार में हमें रुलना पड़ेगा और अपनी जिम्मेदारी समझ सकें तो संसार से मुक्त होने का उपाय बनाया जा सकता है । देख लो यहाँ के इस लगाव में कुछ भला नहीं होने का । यह भी है मनुष्य-जीवन का एक अंग ।

जीवों में शरणमान्यता की प्रकृति―गृहस्थावस्था में भी कोई शरण है तो अपने आपमें विराजमान प्रभुस्वरूप का स्मरण है । तो योगीजन चाहे उसका पार न पा सकें तो भी वे प्रभुस्वरूप में ही अपना मन लगाया करते हैं । देखिये किसी को आदर्श मानने का, अपना देवता मानने का सबके अभ्यास पड़ा हुआ है । प्रत्येक मनुष्य के चित्त में कोई खास एक विशिष्ट जीव समाया हुआ होगा । किसी के चित्त में प्रभु समाया है तो वह उनका देव बन गया । मोहियो के चित्त में कोई पुत्र समाया है, स्त्री समाई है, नेतागिरी समाई है, उनके लिए वे ही देव बन बैठे । उन्हें इससे आगे कुछ पता ही नहीं है । कुवें में जो मेंढक होता है उसे तो इतना ही पता है कि इतनी ही बड़ी दुनिया है, इससे आगे उसे पता ही नहीं चलता । एक बार कोई हंस उस कुवें पर आया तो मेंढक पूछता है कहो भाई हंस तुम कहा से आये? तो हंस बोला―मानसरोवर से ।...मानसरोवर कितना बड़ा है ? बहुत बड़ा । तो मेढक एक पैर फैलाकर कहता है―क्या इतना बड़ा?.... अरे इससे भी बड़ा ? फिर दूसरा पैर भी फैलाकर कहता है―तो क्या इतना बड़ा?....अरे इससे भी बहुत बड़ा । तो मेंढक एक जगह से दूसरी जगह उछल कर कहता है―तो क्या इतना बड़ा मानसरोवर है?....अरे अभी तो इससे भी बहुत बड़ा मानसरोवर है ? ....तब मेंढक कहता कि इससे बड़ी तो दुनिया भी नहीं । तो भैया ! क्या कहे मेंढक? उस मेढक का तो केवल उस कुवे के अंदर की थोड़ीसी जगह का ही परिचय है ऐसे ही इन मोही जीवों को जो भी समागम प्राप्त हुआ है बस उतने को ही अपनी दुनिया समझते हैं । बस ये ही तो मेरे सब कुछ हैं, यह ही तो सब करने का मेरा काम है आदि । उन्हें इसके आगे और कुछ पता ही नहीं ।

चित्तवृति के अनुसार बाहिर अवलोकन―जो जैसे चित्त का होता है उसे वही बाहर सूझता है । क्या करे, ज्ञान ही तो जाननहार है । जैसा ज्ञान है वैसा जानेगा । एक नाई था, जो काफी मजे में था, घर में घी दूध वगैरह भी खूब रहता था । एक दिन वह बादशाह की हजामत बनाने गया । सो बादशाह ने पूछा―कहो खवास जी हमारी प्रजा में कैसा सुख है? तो खवास बोला―महाराज आपकी प्रजा में बड़ा सुख है । खूब धी दूध की नदियां बह रही हैं । बादशाह समझ गया कि यह खूब सुखी है इसलिए सारी प्रजा को सुर्खी समझ रहा है । सो क्या किया कि किसी दीवान को बुलाकर कहा कि इस खवास पर कोई झूठा आरोप लगाकर 10-15 दिन के लिए इसके जानवरों को मंगाकर कांजीहौज में बंद कर दो । दीवान ने वैसा ही किया । जो भी 10-15 गाय भैंस उसके घर थी सब मंगवाकर कांजीहौज में बंद करवा दिया । जब एक हफ्ते बाद फिर वह खवास बादशाह की हजामत बनाने गया तो बादशाह ने पूछा―खवास जी हमारी प्रजा का क्या हाल है? तो खवास बोला―महाराज आपकी प्रजा बड़ी दुखी है, घी दूध के तो किसी को दर्शन ही नहीं होते । तो सभी जगह यही बात दिखती है कि जिसके चित्त में जो समाया हुआ है उसे ही वह सही निरखता है । जो योगी जन हैं, जिन्हें निरंतर अपने ज्ञानस्वरूप के अवलोकन की ही रुचि है, सबसे वैराग्य है, बाहर में कुछ सुहाता नहीं है ऐसे ज्ञानी पुरुष अपने आत्मा को उस प्रभुस्वरूप के स्मरण में ही लगाए करते हैं ।


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