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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2056

From जैनकोष



अयमात्मा स्वसामर्थ्याद्विशुद्धति न केवलम् ।

चालयत्यपि संक्रुद्धो भुवनानि चतुर्दंश ।।2056।।

आत्मसामर्थ्य का अनुपात―देखिये-आत्मा में अनंत सामर्थ्य है, विलक्षण शक्ति है । यदि कोई आत्मा अपने आत्मा के विशुद्धस्वरूप का अनुभव कर के उसमें रम करके सर्वसकटों से, परभावों से, बंधनों से छूटकर निर्वाण को प्राप्त करता है तो इसको आप उसके अनंत अद्भुत सामर्थ्य का चमत्कार कहेंगे या नहीं कहेंगे? और यह जीव जिस किसी भी प्रकार से अपने आत्मस्वभाव की सुधि रखकर जो निगोद अन्य स्थावर या कीड़े मकोड़े कितनी ही तरह के पशु पक्षी मनुष्य इनमें जन्म लेता है तो ऐसा आकार बना लेता है, कितनी तरह के परिणमन करता है, इसे भी आप जीव की सामर्थ्य का एक चमत्कार कहेंगे या नहीं? सामर्थ्य का यहाँ भी उपयोग है और सामर्थ्य का निर्वाण के लिए भी उपयोग है । तो जब यह जीव अपनी सामर्थ्य से विशुद्धि को प्राप्त होता है तो यह निर्वाण को प्राप्त कर लेता है और अगर आत्मा की सामर्थ्य का उपयोग जब यह क्रुद्ध हो जाय तब करे तो चौदह भुवनों को भी चलित कर देता है।

चौदह भुवनों को चलित कर देने का भाव―चौदह भुवनों को चलित कर देने के संबंध में एक यह घटना भी ले सकते हो कि जब यह जीव अपने आप पर क्रोधी बन जाता है, अपने स्वरूप की दृष्टि नहीं रखता, जब अपने आप पर इतनी क्रूरता का बरताव करता है तब यह सर्वलोकों में जन्म धारण करता है । दूसरी बात सामर्थ्य में बतायी गई है कि सामर्थ्य इतनी है कि वह समस्त भुवनों को भी चलित कर दे । इंद्र का सामर्थ्य बताते ही हैं―और आगम में भी कहा है कि इंद्र में इतनी सामर्थ्य है कि जंबूद्वीप को पलट दे । होता नहीं है ऐसा और न आगे होगा भी ऐसा, पर एक सामर्थ्य का अनुमान कराने के लिए कहा है । इस ही ढंग से यह भी दूसरा अर्थ ले सकते हैं कि जब यह जीव सब सक्रुद्ध हो जाता है तो यह चौदह भुवनों को भी चलित कर सकता है । चौदह भुवन कौन हैं? इसे कोई लोग किसी तरह कहते हैं पर एक स्थान विशेष की पद्धति से चौदह भवन लगा लीजिए- 7 नरक, 8 वाँ भवनवासियों का लोक, 9 वाँ मध्यलोक, 10 वाँ ज्योतिषलोक, 11 वां स्वर्गलोक, 12 वाँ नवग्रैवेयक, 13 वां नव अनुदिश और 14 वां पंचानुत्तर ऐसे चौदह भवन कहे जा सकते हैं ।

जीव की संसारदशा में सामर्थ्य की विचित्रता―जीव की सामर्थ्य इस ढंग से भी देखें कि जब यह जीव अपने ज्ञानस्वरूप का आलंबन करता है तो निर्वाण प्राप्त करता है और जब पर की ओर दृष्टि करता है तो कैसे-कैसे विचित्र भव धारण करता है, परिणमन करता है । लो एक तरह से देखो और प्रभु की सामर्थ्य तो एक ही किस्म का काम करती है, पर इन संसारी सुभटों की सामर्थ्य तो नाना प्रकार के कार्य करने की है । कहो, प्रभु तुम कर सकते हम संसारी सुभटों जैसे काम? प्रभु नहीं कर सकते, पर ये संसारी सुभट देखो तो कितनी तरह के कार्य कर रहे हैं, जन्म धारण कर रहे हैं, लेकिन ये सब विडंबनायें हैं, अशांति हैं, उपद्रव हैं, मलिनता हैं, इस सामर्थ्य के उपयोग में क्या रखा है? वास्तविक सामर्थ्य, वास्तविक पुरुषार्थ तो वही है जहाँ अनंत ज्ञान का विकास है और अनंत आनंद का अनुभव है ।


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