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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2059

From जैनकोष



मंत्रमंडलमुद्रादिप्रयोगैर्ध्यातुमुद्यत: ।

सुरासुरनरव्रातं क्षोभयत्यखिलं क्षणात् ।।2059।।

ध्यान की महिमा बतायी है कि मंत्र, मंडल, मुद्रा आदिक प्रयोगों से जो ध्यान में उद्यत होता है वह पुरुष क्षणभर में समस्त सुर असुर नर समूहों को क्षोभित कर सकता है । ध्यान का इतना प्रताप है, इतना बल है । एक कथा सुनते हैं―विष्णुकुमार मुनिराज ने उस जमाने में जब अकंपनाचार्य आदि के मुनियों पर उपद्रव हो रहा था, कैसा चमत्कार दिखाया, वहाँ विष्णु ऋषिराज ने अपना शरीर इतना बढ़ाया कि एक टांग बीच में रखी और एक टांग घुमा दी तो सारे मनुष्य लोक को नाप दिया । और यह तो क्या, ध्यान की इतनी महिमा है कि सुर असुर नर समूह को भी वह ध्यानी पुरुष क्षुब्ध कर सकता है । उस ध्यान की विधि बतलाते- हैं कि मंत्र हो, मंडल हो, मुद्रा हो, संबंध है चित्त का ध्यान के साथ, संबंध है चित्त का शरीर के साथ । इसका कोई प्रयोग कर के भी देख सकता है―पद्मासन से बैठकर देह को बिल्कुल सीधा रखकर यदि तत्व भी ध्यान करने में न आये और शरीर के अंत: अवयव का ही ध्यान करने लगे तो ध्यान की एकाग्रता की बात कह रहे हैं, जैसा कि सिद्धांत बताता है कि―शरीर में कमल की रचना है और कहीं कल्पना करके भी कमल माना है । इस तरह से शरीर में 6 जगह कमल की रचना मानी जा सकती है । अन्य सिद्धांतों ने तो नाभि से बहुत नीचे एक कमलरचना मानी है और उस जगह उस कमलरचना से सटा हुआ ऐसा स्थान है जिसे कुंडलिनी कहा है । उस कुंडलिनी को भावों से जलाया जाय तो सारे शरीर में रोमांच होता है और वहाँ से वायु चलकर सीधी एक ध्रुव स्थान पर नेत्रों के बीच और मध्य में उसके ऊपर चलती है, तो क्या किया है उस योगाभ्यासी ने? एक ध्यान किया है, वह है प्रथम चक्र । इसी प्रकार 5 जगह और चक्र की रचनायें कल्पना में माना, वहाँ उसने चित्त को रोकने का स्थान बताया है । यदि ऐसे ध्यान के योग का भी कोई अभ्यास करे तो इतना फल तो उसे तत्काल मिल गया कि परिवार की, वैभव की, परिग्रह की खबर न रही, इतनी बात तो वहाँ समा ही जा सकती है, और फिर चित्त प्रसन्न हो, ऐसी स्थिति में जो तत्त्व है वह ध्यान में आये, वह सुगम बात होती है । इससे यहाँ बताया है कि मंत्र मंडल मुद्रा आदिक प्रयोगों के द्वारा ध्यान में जो उद्यत पुरुष हैं उनमें इतनी सामर्थ्य बन जाती है कि वह सुर असुर नर समूह को भी क्षोभित कर सकता है ।

रूपातीत ध्यान का प्रसंग लाने से पहिले जो उपयोगी बातें हैं भूमिकारूप, वे बताई जा रही हैं । राग का आलंबन करने से हित नहीं है, वीतरागता का आश्रय करने से हित है, यह पहिली बात कहकर दूसरी बात बतायी है कि उस वीतरागता का ध्यान ही विधिपूर्वक करे तो उस ध्यान में इतनी सामर्थ्य है कि सुर असुर नर आदिक के समूह को क्षुब्ध कर सकता है । रागद्वेष आदिक शत्रुवों को, दुष्टों को, विकारों को इन सबको दूर कर सकता है । कोई बात किसी ढंग से भी कही जाती है तो उसका उद्देश्य और उसमें भलेपन की बात भी छिपी रहा करती है । सामर्थ्य ही तो विषय है, पर ध्यानी पुरुष अपनी सामर्थ्य का इस जगह उपयोग तो नहीं करता । उस सामर्थ्य का उपयोग उन रागादिक बैरियों के विनाश करने में होता है ।

(रूपातीतध्यानवर्णन प्रकरण 40)

आज जो प्रचलित नाम हैं देवी देवतावों के जैसे काली, मुंडी, भद्रकाली, चंडी, मुंडी आदिक ये सब वास्तव में आत्मानुभूति के नाम हैं, एक नाम दुर्गा भी है । दुर्गा का अर्थ है―जो बड़ी मुश्किल से प्राप्त हो । ऐसी कौनसी चीज लोक में है जो बड़ी मुश्किल से प्राप्त होती है? वह चीज है शुद्ध आत्मा की अनुभूति । शुद्ध आत्मानुभूति को दुर्गा शब्द यदि कह दिया जाय तो शब्दार्थ से ठीक बैठेगा । अब इसे भूल जायें और बाह्य में अपना रक्षक कोई और देवता है, ऐसी कल्पना कर के कोई लोग माने तो यह उनकी अलग बात है । काली किसका नाम है? जो रागादिक दुश्मनों को खा डाले उसे काली कहते हैं । इस ही शुद्ध आत्मा की अनुभूति को जरा इस काली के रूप में तकिये । यह अनुभूति इन रागादिक शत्रुवों को चबा डालती है । भद्रकाली―भव्यों को जो कल्याण में प्रेरित करे वह भद्रकाली । कौन है वही शुद्ध आत्म की अनुभूति, जो कि भव्य जीवों को कल्याण में प्रेरित करती है । इसी प्रकार चंडी मुंडी आदिक शब्द भी उस शुद्ध आत्मा की अनुभूति की तारीफ कर रहे हैं । जो रागादिक शत्रुवों का खंडन मंडन कर दे सो चंडी मुंडी आदिक हैं । एक नाम है चंद्रघंटा―जो आनंदरूपी अमृत को झराने में चंद्रमा से भी ईर्ष्या करे उसे चंद्रघंटा कहते हैं । चंद्र क्या अमृत झरायेगा, अमृत तो शुद्ध आत्मानुभूति से झरता है । तो ध्यान करने में वह सामर्थ्य है कि जो रागादिक विकार आत्मा के दुःख के कारण हैं वे सब दूर हो जाते हैं । इससे एक निर्णय रखो कि मुझे वीतराग तत्व का ध्यान ही शरण है, अन्य कोई शरण नहीं है ।

देखो भैया ! श्रद्धा तो निर्मल रखे रहिये । रही करने की बात, सो जितनी योग्यता है जितनी शक्ति है उस माफिक बात चल सकेगी, पर श्रद्धा तो सही ही होना चाहिए । शाम के समय देहातों में जब गायें घर आती हैं घास चरकर तो जंगल से ही दौड़ती हुई घर पर आती हैं । सो जिन गायों की पूँछ पूरी है वे अपनी पूरी पूँछ उठाकर अपने बच्चे के स्नेहवश दौड़ती हुई आती हैं और जो बांड़ी गाय होती है वह अपनी आधी ही पूँछ हिलाती हुई डगमग करती हुई अपने बच्चे के स्नेह में दौड़ती हुई आती है । तो इन दोनों तरह की गायों के भीतरी भाव को देखो वह तो एकसा ही है, दोनों ही उसी प्रयोजन से दौड़ती हैं । तो अपनी श्रद्धा पूर्ण निर्मल रखनी चाहिए स्थिति चाहे कैसी ही हो । अंतर है चारित्र का । तो यहाँ इतनी श्रद्धा एक निर्णय के रूप में बनाये कि हमारे लिए सार और शरण है तो अंतरंग तत्व की उपासना ही है और कुछ हमारे लिए सार और शरण नहीं है । जिन कार्यों में हम लग रहे हैं उनमें कुछ भी सार नहीं है, यह श्रद्धा अवश्य दृढ़ रहनी चाहिये अन्यथा धर्म की नींव न बन सकेगी । जिसे ऐसी श्रद्धा नहीं है वह धर्म का कोई भी काम किस भाव से करता है उसे क्या बतावें? लोक लाजवश समझ लो, या घर की किसी आकुलता के कारण समझ लो―अरे चलो वहीं मंदिर में ही बैठे, ऐसे भी कुछ भाव हो सकते हैं, पर श्रद्धा हो तो एक ही भाव होगा । तो श्रद्धा यथार्थ करने का यत्न रखियेगा और जो श्रद्धा हुई है उसे यथावत् बनाये रहें कि मेरे लिए सारभूत चीज तो मुझ में ही विराजमान अनादि अनंत अंत: प्रकाशमान जो केवल स्वरूप है उसका आलंबन शरण है और यह शरण जिसने प्राप्त कर लिया है ऐसे प्रभु की उपासना करो ।


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