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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2067

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क्षुद्रध्यानपरप्रपंचचतुरा रागानलोद्दीपिता:,

मुद्रामंडलयंत्रमंत्रकरणैर।राधयंत्यादृता: ।

कामक्रोधवशीकृतानिह सुरान् संसारसौख्यार्थिनो,

दुष्टाशाभिहताः पतंति नरके भोगार्तिभिर्वंचिता: ।।2067।।

खोंटे आशय से ध्यान करने का दुष्परिणाम―रूपातीत ध्यान के वर्णन से पहिले कुछ आगाहें और की जा रही हैं―जो मनुष्य खोटे ध्यान के बड़े विस्तार के करने में चतुर हैं वे पुरुष अपना अहित करते हैं, अपने को नरक में पतित करते हैं । खोटा ध्यान करना, किसी का बुरा विचारना, बधबंधन आदिक चिंतन करना और अपने स्वार्थ की पूर्ति का उद्देश्य रखकर ध्यान करना, धनवैभव संपदा सांसारिक सुख मिले आदिक भावनाओं से ध्यान करना-ये सब खोटे ध्यान हैं । इन खोटे ध्यानों के विस्तार में जो लोग चतुर हो रहे हैं वे इस लोक में रागरूपी अग्नि से प्रज्ज्वलित होते हैं । राग या द्वेष इन दो की जब तीव्रता होती है तो खोटा ध्यान बनता है । राग की तीव्रता में तो अपने लिए संपन्न होने की चाह करने की बात आती है । द्वेष की तीव्रता में दूसरे के विनाश की बात आती है और मूल में देखो तो जो कोई पुरुष किसी से द्वेष करता है तो किसी राग के वश करता है । इंद्रिय के विषयों में है राग तो उनमें जो बाधक हुए उनसे द्वेष करता है । ऐसा पुरुष मुद्रा, मंडल, यंत्र, मंत्र आदिक साधनों के द्वारा काम क्रोध से वशीभूत होकर कुदेव का आदर से आराधना करता है ।

शाश्वत शुद्ध आनंद पाने के लिये विषयों से उपेक्षा की अनिवार्यता―भैया ! प्रवृत्ति में दो बातें नहीं निभती कि कोई विषयसाधन भी करे और मोक्षमार्ग भी अपना चला ले । जैसे एक सूई दो दिशावों में एक साथ नहीं सी सकती है, एक रास्तागीर दोनों दिशावों में एक साथ नहीं चल सकता, इस ही प्रकार समझिये कि विषयों का भोगना और मोक्ष में जाना ये दो बातें नहीं निभ सकतीं, जिन्होंने अपना उद्देश्य संसार के संकटो से सदा के लिए छुटकारा पाने का बनाया है उनको इतना साहस रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में विषय के साधनों के अर्थ देवों की आराधना न करें, एक विशुद्धि के लिए देव की आराधना होगी । यह भी एक दोष में शामिल है । जो अपने स्वार्थ की साधना के लिए वीतराग मूर्ति की भी उपासना करे, कुदेव की उपासना करे, वह तो महादोष है ही, किंतु स्वार्थपूर्ति के लिए दूसरों के विनाश के लिए इन खोटे उद्देश्यों को लेकर यदि कोई वीतरागदेव की मूर्ति के समक्ष भी उपासना करता है तो भी वह गलती पर है । उसने अपना भीतरी लक्ष्य सही नहीं बना पाया । हम किसलिए अपना जीवन समझे, यह उसका निर्णय ठीक नहीं है । तो ऐसा पुरुष जो खोटी वासनाओं से उपद्रुत है वह पुरुष कुदेव की आदर से आराधना करता है । जो जरासी बीमारी में या अपने किसी की भलाई की बड़ाई में कुदेव की आराधना करता है, चंडी मुंडी आदिक की आराधना करता है, अथवा किन्हीं छोटे लोगों से चांडाल आदिक लोगो से कोई झड़वाना आदिक काम कराता है तो वह अपनी श्रद्धा में सही नहीं है । जिसमें व्यामोहविराधक भी ज्ञान नहीं, साहस नहीं, वह जैन शासन के जो वास्तविक मर्म हैं उनके पालन का पात्र ही क्या बनेगा? ऐसे जन सांसारिक सुखों के चाहने वाले और खोटी आशावों से पीड़ित होकर भोगों की पीड़ा से तपाये गये वे नरकों में पीड़ित होते! हैं, इस कारण आचार्यदेव उन्हें यह शिक्षा देते हैं कि―


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