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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2083

From जैनकोष



सर्वावयवसंपूर्णं सर्वलक्षणलक्षितम् ।

विशुद्धादर्शसंक्रांतप्रतिबिंबसम प्रभम् ।।2083।।

ज्ञानी का वैभव सर्वस्व―समस्त अवयवों से परिपूर्ण उन समस्त लक्षणों से लक्षित ऐसे निर्मल दर्पण में जो प्रतिबिंब पड़ रहा हो उसके समान प्रभा वाला यह परमात्मतत्व है उसका चिंतन करें । जैसे निर्मल दर्पण में जिस पुरुष का प्रतिबिंब पड़ा है उसके समस्त अवयव और लक्षण दिखाई देते हैं इसी प्रकार परमात्मा के प्रदेश शरीर के अवयवरूप से परिणमते हैं और वहाँ समस्त लक्षणों की तरह समस्त गुण रहते हैं । क्या हो गया? शरीर का खेल मिट गया और विशुद्ध निर्विकल्प निष्तरंग जो था सो रह गया । ऐसी कैवल्य परिणति जब होती है तो भक्तजन उनके गुणगान में उनके सम्मान में अपने जी भर समस्त वैभव लगाकर आनंद मानता है । सब एक दृष्टि का फेर है, जिसको धर्म रुचा है उसका ऐसे प्रसंगों में ही तन, मन, धन और वचन है । अपने आप में धर्म की दृष्टि न जगे, उनके लिए ये परिवारजन जिन में प्रीति हो, राग हो, जिसके कारण कुछ स्वार्थ अधिक सिद्ध हो, विषयसाधन हों, मन की वृत्ति हो उसे बस वह ही सर्वस्व है, और कदाचित् उनका वियोग हो जाय तो यह मानता है कि मेरी तो दुनिया लुट गई और कितने ही लोग तो उस समय अपने ही प्राण खो देते हैं, धीरज समाप्त कर देते हैं । है क्या? ये तो सब उन्मत्त चेष्टायें हैं ।

सिद्ध परमात्मा की उपासना में ही शरण का लाभ―इस विशाल लोक में यह परिचित क्षेत्र कितना-सा क्षेत्र है? यह समस्त लोक का असंख्यातवां भाग है, करोड़वां भी भाग नहीं, अरबवां भी भाग नहीं । इससे भी परे संख्यातवां भी भाग नहीं, यह तो असंख्यातवां भाग है । इतनी सी जगह में मोह ममता कर के क्यों अपने को बरबाद किया जा रहा है? इनको छोड़कर इस सर्वलोक पर दृष्टि दे, सर्व जीवों पर दृष्टि दें और सर्व समयों पर दृष्टि दें तो आत्मीय ज्ञाननेत्र जगेगा और फिर अंतर में यह मोहांधकार न रहेगा । जिन्होंने ऐसी उदार विशाल दृष्टि की है वे भव्य आत्मा इन बंधनों को तोड़कर सदा के लिए आनंदमग्न हो गए । उनका ध्यान न करें तो किसके ध्यान में लगें? कौन है जगत में ऐसा पुरुष अथवा अन्य कोई भी जीव जो हमारे लिए शरण बन सके? एकमात्र यह निर्दोष परमात्मा ही ध्यान के योग्य है । तो ज्ञानी पुरुष की बस एक लक्ष्य पूर्वक एक इस ही निर्दोष तत्व पर दृष्टि जाती है, वह किसी के बहकाये बहकता नहीं है ।

देवता से स्वार्थसाधना की प्रार्थना का व्यर्थ विकल्प―घर में कोई बच्चा बीमार हो जाय और कोई कह दे कि अमुक देवस्थान पर इसे ले जावो, उसका पूजा पाठ करो तुम्हारा लड़का ठीक हो जायगा, तो इस प्रकार की बातें मानकर खोटे देवी देवताओं की आराधना करना योग्य नहीं है । एक ग्वाला के पास 100 भैंसें थीं । तो एक बार भैंसों पर चेचक की बीमारी आयीं । तो उस बीमारी में उसकी मैं से मरने लगीं । तो वह ग्वाला किसी चेचक देवी की मूर्ति के पास जाकर उसकी बहुत आराधना करे अपनी भैंसों को बचाने के लिए । इतना करने पर भी उसकी रोज-रोज बहुतसी भैंसें मरती गईं । यहाँ तक कि जितना अधिक वह उस चेचक देवी से भैंसों के बचने की प्रार्थना करे उतना ही अधिक उसकी भैंसें मरती जावें । (यह सही घटना सुना रहे हैं) तो 90 भैंसे मर गयीं । जब 10 भैंसें बची तो एक दिन वह उस चेचक देवी से कहता है कि ऐ देवी ! ले ले तू मेरी इन 10 भैंसों को भी । मैं अब तेरी आराधना नहीं करता, और ले तुझे मैं फोड़ फाड़कर इस नदी में फैंके देता हूँ । आखिर फैंक ही दिया । उसी दिन से सुयोग की बात है कि भैंसों का मरना रुक गया । वे दसों भैस उस बीमारी से बच गईं । तो केवल एक कल्पना भर है कि कोई देवी देवता बचा लेता है । यह सब एक चल रहा है नियोग । संसार जन्ममरण, निमित्तनैमित्तिक भाव एक चक्र है यह । यहाँ के पाये हुए समागमों में जो अनुरक्त रहेगा वह दुःखी होगा और जो इनमें विरक्त रहेगा वह इन समागमों में जने के काल में भी दुःखी न होगा ।

फंसाव का कारण स्नेह―भैया ! इन समागमों से जो बोले, जो राग करे बस वही फंस जाता है । एक राजा को किसी जंगल में एक साधु मिल गया । साधु ने उस पर प्रसन्न होकर कहा कि राजन् ! तुम्हें क्या चाहिए? तो राजा बोला महाराज मैं एक पुत्र चाहता हूँ । तो साधु ने कहा―अच्छा हो जायगा । कई माह गुजर गए । साधु ने सोचा कि अब तो रानी के गर्भ का समय है पर इस समय कोई जीव मर नहीं रहा, किसे इस रानी के गर्भ में भेजूँ । सो स्वयं ही मरण कर के रानी के गर्भ में पहुंचा । वहाँ बड़े-बड़े दुःख सहने पड़े । तो पेट के अंदर ही प्रतिज्ञा की कि जब मैं पैदा हो जाऊँगा तो कभी बोलूंगा नहीं । आखिर पैदा हो गया । राजघराने में बड़ी खुशी छा गई । पर जब 7-8 वर्ष तक कुछ बोले ही नहीं तो राजा को बड़ा दुःख हुआ । और अपने राज्य में यह डंका बजवा दिया कि मेरे पुत्र को जो बोलता बता देगा उसे बहुतसा पुरस्कार दूंगा । बहुत से लोगों ने उसे बोलता बताने का प्रयत्न किया, पर कोई भी उस काम को कर सकने में समर्थ न हो सका । एक दिन वह राजपुत्र वाटिका में शाम के समय खेलने गया । देखा कि एक चिड़ीमार जाल बिछाये चिड़िया पकड़ना चाहता है, किंतु कोई चिड़िया न दिखी । थोड़ी देर में ही जाल लपेटकर चलने लगा, इतने में ही एक डाल पर बैठी हुई चिड़िया च्याऊँ च्याऊँ कर बोल उठी । चिड़ीमार फिर लौट आया, जाल बिछाया, चिड़िया फंस गई । उस समय उससे न रहा गया, सो वह राजकुमार बोल उठा―जो बोले सो फंसे । इतने शब्द चिड़ीमार ने सुन लिए तो झट जाल को फेंककर राजदरबार में पहुंचा और राजा से कहा―महाराज ! आपका पुत्र बोलता है । ....बोलता है? हाँ बोलता है । ....अच्छा मैंने तुम्हें 10 गांवों की जायदाद पुरस्कार में दी । जब राजपुत्र घर आया तो बहुत बुलवाने पर भी न बोले । तो राजा को चिड़ीमार पर गुस्सा आ गया कि चिड़ीमार भी हम से मजाक करता है । हमारा पुत्र बोलता नहीं और यह कहता है कि बोलता है? राजा ने उस चिड़ीमार को फांसी का हुक्म दे दिया । राजा ने कहा कि ऐ चिड़ीमार तू जो खाना पीना चाहता हो सो खा पी ले या जिससे मिलना चाहता हो सो मिल ले, तुझे फांसी दी जायगी । तो चिड़ीमार ने कहा―महाराज ! मुझे खाना पीना कुछ नहीं है, मुझे तो सिर्फ 1 मिनट के लिए राजपुत्र से मिला दीजिए । मिला दिया । तो चिड़ीमार कहता है राजपुत्र से कि हे राजपुत्र ! मुझे मरने का गम नहीं, गम इस बात का है कि दुनिया यही कहेगी कि चिड़ीमार ने राजा से झूठ बोला था इसलिए उसे फांसी दी गई थी । सो कृपा करके आप उतने ही शब्द बोल दीजिए जो वाटिका में बोले थे । फिर क्या था राजपुत्र ने सारा वृत्तांत सुनाया । देखो―मैं पहिले साधु था । राजा से बोल दिया तो मैं फंस गया, फिर चिड़िया ने डाली पर बोल दिया तो वह फंसी, अगर न बोलती तो क्यों फंसती? चिड़ीमार तो वहाँ से चला ही जा रहा था । और देखो―चिड़ीमार ने राजा से बोल दिया तो इसे भी फांसी का हुक्म मिला । सो जो बोले सो फंसे । जो स्नेह करेगा किसी भी जीव से वह बँधता है ही । तो यह तत्त्ववेदी पुरुष किससे अनुराग करे? ये सब बंध की चीजें हैं । वह तत्त्ववेदी पुरुष तो एक इस विशुद्ध परमात्मतत्त्व में पहुंचता है । तो यह रूपातीत ध्यान निर्दोष सर्वगुणसंपन्न परमात्मा का ध्यान कर रहा है ।


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