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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2090

From जैनकोष



प्रसीद शांतिं व्रजसन्निष्टयतां,

दुरंतजंमज्वरजिह्मितं मन: ।

अगाधजन्मार्णवपारवर्त्तिनां,

यदि श्रियं वांछसि विश्वदर्शिनाम् ।।2090।।

विश्वदर्शियों की श्री को जानकर अभिलष्य की जिज्ञासा―त्रिलोकदर्शी पुरुषों का स्मरण करके यदि उन विश्वदर्शियों के जैसे श्रेय की अर्थात् लक्ष्मी की वान्छा हुई है तो तुझे अब क्या करना चाहिए? तीर्थंकरों का ज्ञान अनंत हैं, दर्शन अनंत हैं, आनंद अनंत हैं, शक्ति अनंत है, जो कि संसार के सर्व संकटों से परे हैं । संसार में कितने व्यर्थ के संकट हैं । एक जीव का किसी दूसरे जीव से कुछ संबंध है नहीं, हैं सभी अत्यंत भिन्न, लेकिन उनकी शकल सूरत निरखकर यह पुत्र है, यह पुत्री है, यह रमणी है―ये नाना विकल्प कर के जो एक महान अंधेरा अपने ज्ञान पर बनाये डालते हैं, इसे क्या कम संकट समझ रहे। आँखें मिचीं और सब खतम । जो थोड़े ही दिनों में खतम होगा उसको अंतिम चार मिनट पहिले से भी खतम सा नहीं मान सकते ।एक जुलाहा भी कपड़ा बुनता है तो बुनते-बुनते आखिर अंत में दो चार अंगुल पूर छोड़ ही देता है, पर यह संसारी मनुष्य अपने जीवन के अंतिम दो चार मिनट भी रागद्वेष मोह का पूरा हुआ ताना नहीं छोड़ सकता । यदि प्रभु की श्री को अर्थात् लक्ष्मी को सुनकर, उनका क्या विकास है, सर्वसंकटों से परे कृतकृत्य, अब जिनकी आगे कुछ भी उत्सुकता नहीं है सब कार्य पूरे हो चुके, उन्हें अब कुछ करने को नहीं रहा, निर्विकल्प हैं, निस्तरंग हैं, उनकी लक्ष्मी की बात सुनकर यदि उन जैसी लक्ष्मी को चाहते हो तो क्या करो?

सर्वज्ञश्री की वांछा में आत्मप्रसाद की आवश्यकता―विश्वदर्शियों जैसी श्री पाने के लिये सबसे पहिली बात है कि प्रसन्न होवो । कोई कहे कि हम तो बड़े प्रसन्न हैं, हमें क्या शिक्षा देते, दूकान अच्छी चलती है, घर में बालबच्चे अच्छे हैं, सब ठीक है, अरे यह कोई प्रसन्नता नहीं है । इस प्रसन्नता की बात नहीं कह रहे । इसका नाम प्रसन्नता नहीं । प्रसन्नता का अर्थ है निर्मलता । साहित्य में देखो―जब शरद ऋतु का वर्णन आता है तो वहाँ कवि कहता है उन छोटी-छोटी ताल तलैया व बावड़ियों में निर्मल जल भरे हुए के प्रति कि ये सब प्रसन्न हो रही हैं । यहाँ कोई पूछे कि कहो भाई आप प्रसन्न हो ना, अर्थात् निर्मल हो ना, पर वह उत्तर क्या देता है―हाँ हम बड़े मौज में हैं, खूब बच्चे हैं, सभी हमारी बड़ी खबर लेते हैं, धन भी खूब है, हम बहुत प्रसन्न हैं । अरे पूछी तो थी निर्मलता की बात और उत्तर दे रहे हैं अपनी मलिनता का । यह तो संसार है । पूछो कुछ और उत्तर मिलता है कुछ ।

बहरों का झमेला―एक दृष्टांत है कि एक बहरा मुसाफिर किसी गाँव को जा रहा था तो उसे एक बहरा गडरिया रास्ते में बकरियां चराते मिला । दोपहर का समय था । गडरिया भोजन करने के लिये घर जाना चाहता था । सो उस मुसाफिर को देखकर गडरिया ने कहा―भैया थोड़ी देर को हमारी बकरियाँ देख लेना, मैं खाना खा आऊँ । ....अच्छी बात । चला गया गडरिया खाना खाने । ये सब बातें संकेत के साथ हुई, सो वे दोनों समझ गये थे । जब खाना खाकर 1 घंटे के बाद में लौटा गडरिया, तो सोचा कि इसने मेहनत किया है, इसे कुछ इनाम देना चाहिए । सो उसके पास थी एक तीन टाँग की बकरी, एक टांग उसकी टूट गई थी ।सोचा कि सिर्फ एक घंटा ही तो मेहनत की है, अच्छी बकरी क्यों दूँ, इसी को दे दूँ । जब देने लगा तो वह बहरा मुसाफिर यह समझता है कि यह कह रहा है कि तुमने तो हमारी बकरी की टांग तोड़ दी, सो बोला-हमने तो इतनी मेहनत की और कहते कि हमारी बकरी की टाँग तोड़ दी । वह गडरिया बोला―मैं क्यों अच्छी बकरी दूँ, तुमने एक ही घंटा तो मेहनत की । आखिर दोनों किसी तीसरे व्यक्ति के पास न्याय करवाने चले । रास्ते में एक घुड़सवार मिला, वह भी बहरा था । उन दोनों ने अपनी-अपनी बात रखी । सो वह घुड़सवार समझता है किये कह रहे हैं कि तुम्हारा यह घोड़ा चोरी का है, सो वह कहता है―अरे यह घोड़ा तो हमारे घर की घोड़ी से पैदा हुआ था, चोरी का कैसे है? अब वे तीनों किसी चौथे व्यक्ति के पास न्याय करवाने पहुंचे । सो एक गाँव के एक जमींदार के पास गए । वह किसान भी बहरा था । उसी दिन उसकी घरवाली की उससे लड़ाई हो रही थी । वे तीनों ही उसके पास जाकर अपनी-अपनी बात रखते हैं―एक कहता हैं―मैने 1 घंटा तक मेहनत की और यह कहता है कि तुमने मेरी बकरी की टाँग तोड़ दी । दूसरा कहता है―इसने एक ही घंटा तो मेहनत की, मैं क्यों इसे अपनी चार पैरों वाली अच्छी बकरी दे दूँ? तीसरा कहता है―यह घोड़ा तो हमारे घर की घोड़ी से पैदा हुआ था, ये लोग कहते हैं कि तुम्हारा यह घोड़ा चोरी का है । तो वह बहरा किसान सोचता है कि ये लोग हमारी लड़ाई शांत करा रहे हैं, तो झुंझलाकर कहता है―अरे यह तो हमारी घरेलू लड़ाई है । तुम लोग क्यों बेकार में बीच में पड़ते? आखिर उन तीनों को भगा दिया । तो क्या है? यह तो संसार है, यहाँ पूछो कुछ और उत्तर मिलता है कुछ । तो जिसे अपनी प्रसन्नता कह रहे हो वह प्रसन्नता नहीं है ।

प्रसन्नता का उद्यमन―प्रसन्नता कहते हैं निर्मलता को । यदि इस महाप्रभु की लक्ष्मी को चाहते हो तो सबसे पहिले प्रसन्न होवो । इस निर्मलता का भाव इन तीन बातों में समझ लो―एक तो इस जगत के प्रति भ्रम न रहे, कौन मेरा है, इस देह को देखकर यही मैं हूँ, ऐसा विकल्प न आये, दूसरे―इन पंचेंद्रिय के विषयों में राग न आये और तीसरे--किसी भी प्राणी के प्रति रागद्वेष की दृष्टि न जगे । झट उस जीवस्वरूप की ओर दृष्टि ले जाये कि मेरा ही जैसा स्वरूप इन सभी जीवों का है । कोई अगर अपन से विरोध भी कर रहा है, द्वेष भी कर रहा है तो यही सोच लो कि इसने अज्ञानता की शराब पी रखी है जिससे मदोन्मत्त होकर पागल की नाई चेष्टायें कर रहा है । इस बेचारे का दोष नहीं, दोष तो इस अज्ञानता की शराब का है । जैसे एक घटना है कि एक बार दतिया का राजा अपने हाथी पर बैठा हुआ घूमने जा रहा था, रास्ते में एक कोई शराबी मिला । वह शराबी बोला―ओबे रजुवा अपना हाथी बेचेगा? इस बात को सुनकर राजा बड़ा क्रुद्ध हुआ, पर मंत्री ने कहा―महाराज आप दरबार चलिये―इसका निर्णय वहीं होगा। यहाँ इसे कुछ न कहिये । आखिर दरबार पहुंचकर 5-6 घंटे के बाद में राजा ने उसे बुलवाया । वह बेचारा गरीब आदमी था । वह पहिले से ही डरने लगा कि आखिर हमने क्या अपराध किया जो राजा ने बुलवाया । जब राजा के सामने पहुंचा तो पहिले से ही कांपने लगा । राजा बोला-क्या तू मेरा हाथी खरीदेगा? तो वह बोला―महाराज आप यह क्या बात कह रहे हैं, मैं गरीब आदमी आपका हाथी किस तरह से खरीद सकता हूं? आखिर राजा को मंत्री ने बताया―महाराज, उस समय यह नहीं कह रहा था―ओबे रजुवा अपना हाथी बेचेगा । इसने पीली थी शराब, सो शराब का नशा वह बात कह रहा था, यह तो सिर्फ आपके सामने खड़ा था । तो यों ही जब कोई अपन से विरोध कर रहा हो, अज्ञानता भरी चेष्टायें कर रहा हो तो यही सोचना चाहिए कि इस बेचारे का कोई दोष नहीं, इसने अज्ञानता की शराब पी रखी है सो उस शराब के मद का दोष है । इसका, कोई दोष नहीं । इसका स्वरूप तो मेरा ही जैसा है । मैं इस पर क्या रोष करूँ?

निर्विरोध होकर प्रसन्न (निर्मल) होने का उपदेश―भैया ! जैसे किसी पागल के मुख से कोई गाली भरे शब्द सुन लिए जाते हैं तो क्या उस पर कोई क्रोध करता है? जब वह पागल है तो उसकी क्रियावों पर क्रोध क्या करना, ऐसे ही किसी अज्ञानी की अज्ञानता भरी चेष्टावों को निरख-कर क्रोध क्या करना, समझ लिया कि इसके ऊपर कषायों का बोझ लदा है तो उन कषायों के वश होकर यह अपनी अज्ञानता भरी चेष्टायें कर रहा है । तो किसी भी स्थिति में किसी भी जीव के प्रति बैर विरोध की अंतरंग में भावना न जगनी चाहिए । तो भ्रम न रहे, विषयों में राग न रहे, जीवो से द्वेष न रहे, बस इसी का नाम है प्रसन्नता । कोई अगर पूछे कि क्या आप प्रसन्न हो, तो उसका अर्थ आप लगा लो कि हम से यह पूछा जा रहा है, तो उसका उत्तर दें कि चाहता तो हूँ कि मैं प्रसन्न रहूं, पर रह नहीं पाता क्योंकि ये विकार सता रहे हैं । यदि महापुरुषों के निर्वाण प्राप्त जीवों के वैभव को सुनकर जानकर उसकी इच्छा करते हो तो पहिला काम है कि प्रसन्न होवो ।

शांत होने और मनोनिरोध करने का आदेश―प्रभुश्री की प्राप्ति के लिये अपने में शांति को एकमेक करो अर्थात् शांत होवो, और जो मन जन्म जरा ज्वर से कुटिल बन गया है जिसका अंतिम परिणाम खोटा है ऐसे मन को रोको । कठिन साधना है कि मन में जो आये बात उसे दबा लें, और यहीं बुझा लें, नष्ट कर लें, लेकिन यह कठिन साधना जो महाभाग कर सकता है उसे अपूर्व प्रकाश मिलता है और एकदम उन्नति के पथ पर बढ़ जाता है । बड़े पुरुष का यही लक्षण है कि क्षमाशील रहे, नम्र रहे । इन सब स्थितियों में मन का निरोध कर देना यह एक बहुत बड़ा गुण है । यों तीन बातें कहीं हैं । जिसको प्रभुसम परम आनंद की चाह है, उसके लिए ये तीन उपदेश दिए हैं । और अधिक नहीं तो एक ही उपदेश को हम अपने आपमें घटा लें तो भला है । क्या? प्रसन्न रहें । प्रसन्न रहने में कुछ बुरासा लगता है क्या? क्या प्रसन्न रहना नहीं चाहते? तो प्रसन्न में जो भाव भरा हुआ है उस भाव में अपने को जुटा लें, इसमें कौनसी कठिनाई है? यदि भीतर में एक उजेला बना लें, भ्रम मिटा लें तो इसको कौनसी बाधा है?

यथार्थस्वरूप के विपरीत हठ न करने में यथार्थ प्रसन्नता―यह जगत, ये अणु-अणु ये सब जीव अपना-अपना चतुष्टय लिए हुए हैं । उनका सुख उनमें है, मेरा सुख मुझ में है । किसी से कुछ भी संबंध नहीं । यह बात अगर झूठ हो तो मत मानो । झूठ बात मनाने का जैनशासन में जरा भी संकेत नहीं है । निरीक्षण कर लो, बात सत्य उतरे तो सत्य जंचने पर भी उसे स्वीकार न करे, तो यह तो एक ऐसी बुरी हठ है कि जैसे कोई देहाती कह बैठे सभा में कि 40 और 40, 60 होते हैं, दूसरे लोग कहें―40 और 40 तो 80 होते है । पर उसने 60 की ही हठ पकड़ ली, और उसने यह भी कह दिया कि अगर 40 और 40 मिलकर 60 न होते हों तो हमारे घर जो 5 भैंसें हैं उन्हें दे देंगे । जब वह घर जाता है तो उसकी स्त्री दुःखी होकर कहती है कि अब न जाने क्या होगा, क्या बच्चे खायेंगे, कैसे बच्चों का पालनपोषण होगा? तो वह आदमी बोला, क्यों?....अरे तुमने तो सभा में कह पिया है कि 40 और 40 मिलकर 60 होते हैं, अगर 60 न होते हों तो अपनी घर की पाँचों भैंसें दे देंगे । सो कल तो ये सारी भैंसें चली जावेगी । तो वह पुरुष बोला―अरी बावली, तू तो बड़ी नादान है, अरे जब हम अपने मुख से इस बात को कहेंगे कि 40 और 40 मिलकर 80 होते हैं, तभी तो ये भैंसें वे पंच लोग ले सकेंगे, नहीं तो है क्या किसी में ऐसी हिम्मत है जो हम से भैंसे ले सके? ये रखा है डंडा । तो इसी तरह की हठ ये संसारी जीव बनाये हैं । चित्त में यह बात ठीक-ठीक जंच जाने पर भी कि दुनिया में एक तिनका भी अपना नहीं है, फिर भी यह हठ किए बैठे हैं किं जब हम यह मान लें कि ये चीज मेरी नहीं है तभी तो यह चीज मेरे पास से जायगी । अरे इस हठ से तो इस जीव की बरबादी है । सत्य बात मान लें और फिर विषयों का राग छोड़ दे और जीव के स्वरूप को निरखकर उनसे अंतरंग में द्वेष की भावना न रखे, लो प्रसन्न हो गए और सारा मार्ग मिल गया ।


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