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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2094

From जैनकोष



चलत्येवाल्पसत्त्वानां क्रियमाणमपि स्थिरम् ।

चेत: शरीरिणां शश्वद्विषयैर्व्याकुलीकृतम् ।।2094।।

अल्पशक्तिक पुरुषों के चित्त की अस्थिरता एवं ज्ञानबल से मनोबल की वृद्धि―जो अल्पशक्ति वाले मनुष्य हैं वे ध्यान को कितना ही बनाये पर स्थिर नहीं हो पाते हैं, चलित हो जाते हैं, क्यों उनको यह शक्ति मिलना कठिन है? यों कि उनका मन निरंतर व्याकुल रहता है ।आत्मा का बल ज्ञान है और आत्मा की कमजोरी विषयों की आशा है । जो विषयों से व्याकुल न हो और शुद्ध स्वरूप का ज्ञान रखता हो उसको घबड़ाहट भी नहीं और उसका आत्मबल भी बढ़ा हुआ है । शरीर के अनेक रोग ज्ञानबल के अभाव से, नाना कल्पनाओं के करने से हो जाते हैं ।पूर्वकाल की अपेक्षा आजकल मानसिक वेदना, दिल का रोग लोगों के बहुत होता है, ब्लडप्रेसर की बीमारी भी आजकल बहुत होती है, पहिले तो लोग समझते ही न थे कि अब खून मंदगति से चल रहा या अब तीव्र गति से चल रहा, बस थोड़ा थक गए तो आराम कर लिया, फिर काम में जुट गए । उसकी परवाह न करते थे । आज तो मानसिक वेदनाएँ बहुत प्रविष्ट हो गई हैं, आत्मबल घट गया है । दिल की धड़कन किसी समय तेज हो जाय तो लोग बड़े व्याकुल हो जाते हैं । अरे इस काल्पनिक वेदना से, मानसिक वेदना से कुछ बिगाड़ न होगा, सिर्फ उन गढ़ी हुई कल्पनाओं को हटा लो, चित्त को और जगह ले जावो प्रभु के गुणानुराग में, अपने स्वरूप के चिंतन में, मैं तो इस देह से भी निराला एक शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ, इसमें बिगाड़ क्या? बस इस आत्मतत्त्व में अपने उपयोग को लगा देने से ऐसा बल प्रकट हो जाता है कि वह मान-सिक वेदनाओं वाला व्यक्ति उन वेदनाओं से बच जाता है ।

ज्ञानबल का प्रभाव―ज्ञानबल बहुत बड़ा बल है । ज्ञानबल वाला व्यक्ति चाहे गरीब घराने का हो, पर वह उस बुद्धिहीन की अपेक्षा अच्छा है जो कि धनिक परिवार में है । लोग ऐसा कहते भी हैं । वास्तव में अपना असली वैभव है बुद्धि का ठीक रहना । जिन पुरुषों की बुद्धि व्यवस्थित है वे अपने उपयोग को आत्मचिंतन में रत कर देते हैं और सर्व मानसिक क्लेशों से बच जाते हैं, पर जिनका चित्त व्यवस्थित नहीं, जिनका चित्त विषयों से व्याकुल है उनके शक्ति कम होती है और उनका ध्यान में चित्त स्थिर नहीं रह पाता है ।


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