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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2096

From जैनकोष



छिन्ने भिन्ने हते दग्धे देहे स्वमिव दूरगम् ।

प्रपश्यन् वर्षवातादिदु:खैरति न कंपते ।।2096।।

वज्रांगबली के उपसर्ग में भी विविक्त तत्त्व के ध्यान की विशेषता―वज्रर्षभनाराचसंहनन का धारी महायोगी के शरीर छेदा जाय, भेदा जाय, मारा जाय, जलाया जाय तिस पर भी अपने आत्मा को अपने शरीर से भिन्न निरखने का सामर्थ्य रहता है सो वह महापुरुष ध्यान से चलायमान नहीं होता । शरीर बलिष्ठ है, प्रथम संहनन है तो ऐसे शरीर वाला शुक्लध्यान पा ही ले यह तो नियमन नहीं हैं । प्रथम संहनन वाला अच्छे परिणाम कर के मोक्ष भी जा सकता है और खोटे परिणाम करे तो 7 वें नरक में भी जा सकता है । नियम तो नहीं है, पर ऐसे संहनन वालों में यह योग्यता है कि ध्यान से विचलित नहीं होता । शरीर छेदा जाय, मारा जाय, जलाया जाय, तिस पर भी उसकी आत्मा में इतना साहस रहता है कि वह शरीर से भिन्न अपने आत्मतत्त्व की उपासना रख सकता है ।

उपसर्ग विजय का उदाहरण―गजकुमार मुनि जिनका एक दो दिन पहिले ही विवाह हुआ था, फिर कुछ छोड़ छाड़कर मुनि बन गए तो उनके स्वसुर साहब ने क्रोधवश उनके सिर पर मिट्टी की बाढ़ बनाई, कोयला भरा मौर आग लगा दी । सिर जलने लगा, लेकिन उत्तम संहनन के धारी ज्ञानबल से बलिष्ठ गजकुमार मुनि ने उसको या तो उपयोग में न लिया और जानने में आया तो जैसे परद्रव्य की परिणति जानने में आती है, परद्रव्य तो है ही, उसकी ही परिणति जानने में आ रही है, विचलित नहीं हुए । कितने ही मुनि कोल्हू में पेले गए, उनमें से अनेक मुनियों ने मुक्ति भी प्राप्त किया है । कितने ही मुनियों को समुद्र में फेंका, अग्नि में जलाया, अनेक कष्ट दिये, कितनी ही पीड़ायें दुष्ट जनों ने साधुवों की दीं, पर जो मुनि वज्रवृषभनाराचसंहनन के धारक हैं ऐसे मुनि अपने ध्यान से विचलित नहीं होते ।

अंतस्तत्त्व की लगन बिना परिजनसंपर्क से बचाव की कठिनता―लगन की बात है, जहाँ केवल एक यही दिख रहा है कि इस लोक में सारभूत वस्तु कुछ नहीं है, वहाँ कहां लगाव रखा जाय, कहाँ चिपका जाय, धन से, वैभव से, परिजन से अथवा मित्रजन से? अरे बाह्य में मेरे लिए कुछ सारभूत है ही नहीं । यह दुनिया जुवे का स्थान है । जैसे कोई जुवारी कभी हार भी जाय, थोड़ा बहुत जो कुछ बचा हो उसको लेकर जाने लगे तो खेलने वाले ऐसी बात कहेंगे (बस इतना ही दम था, हो चुका खेल, आदि) कि वह वहाँ से उठ नहीं सकता, और वह अगर कुछ जीत जाय और सोचे कि चलो कुछ तो मिल गया; अब कहीं ऐसा न हो कि हार जाये, सो चल दे, तो खेलने वाले लोग कहेंगे―( बस खेल चुके, इतने खुदगर्ज निकले, जीत लिया बस चल दिया) यों अनेक ऐसी बातें कहेंगे कि वह खेल से उठ नहीं सकता । इसी तरह इस संसार की फड़ भी बड़ी कठिन है । कोई थोड़ा विवेक पाकर विरक्त होना चाहता है तो परिवार के लोग ऐसी बातें कहेंगे कि वह यहाँ से जा न सके । और बड़े गुरुवों से जितने भी प्रयत्न हो सकते हैं उतने यत्न करते हैं कि वह वहाँ से भाग न सके । यहाँ ही बना रहे, और जब हार गया है तो उसके यह बुद्धि ही नहीं उत्पन्न होती कि हम इस भीड़ से जा सके । तो पुण्यपाप का जहाँ हार जीत का काम चल रहा है ऐसा यह संसार एक जुवे जैसा स्थान है, यहाँ से निकलना कठिन है । किंतु जिसकी धुनि बन गई है, कुछ सुहाता ही नहीं है, एक सहज विशुद्ध आत्मस्वभाव की उपासना ही कल्याण का उपाय है, यही मेरा धन है, मेरा सर्वस्व है, इससे आगे मेरा कहीं कुछ है ही नहीं । यों ध्यान रखने वाला, अपनी धुनि रखने वाला तत्वाश्रय से च्युत नहीं होता ।

गालियों में मोहियों की प्रशंसा कल्पना―यहाँ तो थोड़ासा धन पाकर, थोडासा यश पाकर खुश हो जाते हैं । एक बात और ध्यान में लावो कि यहाँ प्रशंसा करता भी कौन है? लोग तो सोचते हैं कि इसने मेरी प्रशंसा की है पर वास्तव में वह प्रशंसा करने वाला उसे गाली दे रहा है । इस मर्म को खूब ध्यान से समझ लो । कोई क्या कहेगा प्रशंसा में, इसके दो चार उदाहरण तो बतलावो । किसी ने कह दिया कि साहब आप इनको जानते हैं? इनके चार लड़के हैं, एक लड़का कलेक्टर है, एक मिनिस्टर है, एक डाक्टर है, और एक डायरेक्टर है, बस हो गई प्रशंसा? इस बात को सुनकर वह सुनने वाला बड़ा खुश होता है कि मेरी प्रशंसा की जा रही है, पर बात वहाँ क्या है कि कहने वाले ने उसे गाली दी । अरे इनके लड़के तो इतने योग्य हैं पर यह कोरे बुद्धू हैं । किसी ने कहा कि इनका मकान बहुत बढ़िया है, चार खंड का है, और सामने की दीवार तो बहुत ही सुंदर है, द्वार पर तो बढ़िया नक्कासी खुदी है ।बस हो गई प्रशंसा । इस बात को सुनकर वह बड़ा खुश होता है, पर उस प्रशंसा करने वाले ने तो गाली दी । अरे इन पत्थरों में तो इतनी कला है, इतनी सुंदरता है पर इन सेठ जी में तो कुछ भी कला नहीं है । और भी देखो―बहुत से व्याख्यानदाता ऐसे होते हैं कि बोलते चले जाते हैं पर उनका व्याख्यान किसी को रुचता नहीं, सो सुनने वाले तो परस्पर में बातें भी कुछ करते हैं, कभी-कभी बीच-बीच में ताली भी बजा देते हैं, और चाहते हैं कि यह व्याख्यानदाता अपना व्याख्यान बंद कर दे, पर वह बेवकूफ व्याख्यानदाता कल्पनायें कर के ऐसा सोचता हैकि ये लोग मेरे व्याख्यान को सुनकर बड़े खुश हो रहे हैं । बे सुनने वाले दे तो रहे हैं गाली, पर वह कल्पनायें करके समझता है कि ये लोग मेरी प्रशंसा कर रहे हैं । तो ऐसी है यहाँ के यश की बात । लोग किसी के धन का वर्णन करेंगे, शरीर का वर्णन करेंगे, पर्याय का वर्णन करगे, इनको सुनकर अज्ञानी जन समझते हैं कि ये लोग मेरी प्रशंसा कर रहे हैं, पर दे रहे हैं वास्तवमें गाली ।

स्वरूप की धुनि वाले वज्रांगबली के विशुद्ध परम ध्यान की पात्रता―अरे कोई उस शुद्ध चैतन्यस्वरूप का भी गुणगान करता है क्या? उसकी तो कोई प्रशंसा करता नहीं । उसे तो कोई जानता ही नहीं । कोई स्वरूप की प्रशंसा करे तो उसमें मैं व्यक्ति तो न आया स्वरूप तो सबका एकरूप है । ज्ञानी जन यहाँ की प्रशंसावों में अपना चित्त नहीं देते रीझते नहीं । वे तो इन सर्व चीजों से विरक्त रहते हैं । ऐसे ही पुरुष तो अपनी धुन बना सकते हैं, और ऐसी ही धुन बनाने वाले, उत्तम संहनन वाले महापुरुष अनेक प्रकार के शीत उष्ण आदिक की वेदनाओं को समता से सहन करते हुए अपने आत्मस्वरूप के ध्यान में रत होते हैं । इस कारण शारीरिक मजबूती भी एक अपना बड़ा महत्व रखती है यदि ध्यान उत्तम हो तो । इसी विषय में आगे के प्रकरण में बतावेंगे कि शुक्लध्यान में पुरुष किस प्रकार की स्थिति में आता है कि एक शांत अमृत का झरना उसमें झरता ही रहता है ।


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